प्रतिरोध की कविता : अख़लाक़ से जुनैद तक…

मेरे नाम पर नहीं , , शुक्रवार , 30-06-2017


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(साम्प्रदायिक और उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं पर सड़क से लेकर साहित्य तक प्रतिवाद का कड़ा स्वर सुनाई दे रहा है। पिछले दिनों ऐसा ही प्रतिरोध और एकजुटता हमें अंधविश्वास उन्मूलन के लिए काम कर रहे तर्कवादी नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्याओं के समय देखने को मिली थी। यही कोशिशें हमें ज़ुल्म से लड़ने का हौसला देती हैं और उम्मीद जगाती हैं कि अभी सबकुछ ख़त्म नहीं हुआ है। -मॉडरेटर)

वरिष्ठ हिन्दी कवि मदन कश्यप।

क्योंकि वह जुनैद था

चलती ट्रेन के खचाखच भरे डिब्बे में

चाकुओं से गोद-गोद कर मार दिया गया

क्योंकि वह जुनैद था

 

झगड़ा भले ही हुआ बैठने की जगह के लिए

लेकिन वह मारा गया

क्योंकि वह जुनैद था

 

न उसके पास कोई गाय थी

न ही फ़्रिज में माँस का कोई टुकड़ा

फिर भी मारा गया  क्योंकि वह जुनैद था

 

सारे तमाशबीन डरे हुए नहीं थे

लेकिन चुप सब थे  क्योंकि वह जुनैद था

 

डेढ़ करोड़ लोगों की रोजी छिन गयी थी

पर लोग नौकरी नहीं  जुनैद को तलाश रहे थे

 

जितने नये नोट छापने पर खर्च हुए

उतने का भी काला धन नहीं आया था

पर लोग गुम हो गये पैसे नहीं  

जुनैद को खोज रहे थे

 

सबको समझा दिया गया था

बस तुम जुनैद को मारो

 

नौकरी नहीं मिली  जुनैद को मारो

खाना नहीं खाया  जुनैद को मारो

वायदा झूठा निकला  जुनैद को मारो

माल्या भाग गया  जुनैद को मारो

अडाणी ने शांतिग्राम बसाया जुनैद को मारो

                         जुनैद को मारो

                         जुनैद को मारो

 

सारी समस्याओं का रामबान समाधान था

                         जुनैद को मारो

ज्ञान के सारे दरवाजों को बंद करने पर भी

जब मनुष्य का विवेक नहीं मरा

तो उन्होंने उन्माद के दरवाजे को और चौड़ा किया                                                                                 जुनैद को मारो!!

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ईद की ख़रीदारी कर हँसी-ख़ुशी घर लौट रहा

पंद्रह साल का एक बच्चा 

कितना आसान शिकार था

चाकुओं से गोद-गोद कर धीरे-धीरे मारा गया

शायद हत्यारों को भी गुमान न था

कि वे ही पहुँचाएंगे मिशन को अंजाम तक

कि इतनी आसानी से मारा जाएगा जुनैद

 

चाकू मारने के हार्डवर्क से पराजित हो गया

अंततः मनुष्यता का हावर्ड

वह मारा गया क्योंकि वह जुनैद था!

- मदन कश्यप

दादरी में भीड़ द्वारा मारे गए अख़लाक़ की तस्वीर। साभार : गूगल

दादरी का अख़लाक़

हर हत्या के बाद
ख़ामोश हो जाते हैं हत्यारे
और उनके मित्रगण.

उनके दाँतों के बीच फँसे रहते हैं
ताज़ा माँस के गुलाबी रेशे,
रक्त की कुछ बूँदें भी चिपकी होती हैं
होंठों के आसपास,
पर आँखें भावशून्य हो जाती हैं
जैसे चकित सी होती हों

धरती पर निश्चल पड़ी
कुचली-नुची मृत मानव देह को देखकर
हत्या के बाद हत्यारे भूल जाते हैं हिंस्र होना
कुछ समय के लिए
वो चुपचाप सह लेते हैं आलोचनाएँ,
हत्या के विरोध में लिखी गई कविताएँ
सुन लेते हैं बिना कुछ कहे
यहाँ तक कि वो होंठ पोंछकर
दाँतों में फँसे माँस के रेशे को
खोदकर, थूककर
तैयार हो जाते हैं हिंसा की व्यर्थता पर
आयोजित सेमीनारों में हिस्सेदारी को भी
हर हत्या के बाद उदारवादी हो जाते हैं हत्यारे
कुछ समय के लिए

जब तलक अख़बार उबल कर शांत न हो जाएँ
जब तलक पश्चिम परस्त, पढ़े लिखे नागरिक
जी भरकर न कोस लें हत्यारों को
हमारे प्राचीन समावेशी समाज की इस स्थिति पर
जब तलक अफ़सोस जताना बंद न कर दें सर्वोदयी कार्यकर्ता

और जब तलक राइटविंग के उत्थान पर
छककर न बोल लें कम्युनिस्ट टाइप प्रोफ़ेसर
एनजीओ चलाने वाली सुघड़ महिलाएँ

जब तलक ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल
अपनी फैक्ट फ़ाइंडिंग पूरी न कर लें.

जब तलक हत्या के विरोध में सैकड़ों कवि
लिख न डालें अपनी अपनी छंद-मुक्त कविताएँ
तब तलक दयनीय बने रहते हैं हत्यारे.

देखो सब उन्हें ही घेर रहे हैं.
बुद्धिजीवी, मास्टर, पत्रकार, कवि और मानवाधिकार वाले
सभी हत्यारों को ही दोषी क्यों ठहरा रहे हैं?
यह कहाँ का न्याय है?
आख़िर जो मारा गया उसका भी तो दोष रहा ही होगा?”

कोई भरी मासूमियत से सवाल करता है कहीं साइबर-स्पेस में
दूसरी आवाज़ एक माननीय सांसद की होती है:
आख़िर शांति-व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी
हत्यारों की ही क्यों होनी चाहिए?

फिर एक टेलीविज़न का एंकर
एत्तेहादुल मुसलमीन के नेता से पूछता है सवाल:
अब मुसलमानों को भी सोचना ही पड़ेगा
कि बार बार वो ही निशाना क्यों बनते हैं?

क्या आप नहीं मानते कि सिमी राष्ट्र-विरोधी है?
फिर आते है बाहर निकलकर हत्यारों के सिद्धांतकार
ले आते हैं आँकड़े निकाल कर पिछले बरसों के
कितने ख़ुदकुश हमलावर मुसलमान थे और कितने थे दूसरे.
चेचन्या से लेकर यमन और सोमालिया और नाइजीरिया तक
गज़ा पट्टी से लेकर सीरिया, इराक़ और ईरान तक
कश्मीर से लेकर हेलमंद तक
कहीं पर भी तो चैन नहीं है इन लोगों को.

और फिर एक सहनशील समाज
कब तक बना रह सकता है सहनशील?
एक जागरूक समाज में खुलकर चलती है
हत्या के कारण और निवारण पर स्वस्थ बहस
बहुत से तर्क तैयार हैं कि
हत्या हमेशा नाजायज़ नहीं होती
बहुत से लोग सोचने लगते हैं
अरे, ये तो हमने सोचा ही नहीं.

वकील अदालत में पेश करते हैं मेडिकल रिपोर्ट
मीलार्ड, हत्यारा धीरे धीरे अंधा हो रहा है,
उसके पेट में गंभीर कैंसर पैदा हो गया है,
उसकी माँ मर गई है अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं.
मीलार्ड, हत्यारे को ज़मानत दी ही जानी चाहिए.
मुस्लिम्स हैव मूव्ड आन, मीलार्ड.
हत्यारा भी तो आख़िर इंसान है.

वैसे भी हत्या को अब बहुत वक़्त हो चुका है.
अब कब तक गड़े मुरदे उखाड़े जाएँ.
अब कब तक चलता रहेगा ब्लेम-गेम?
समाज में समरसता कैसे आएगी अगर
सब मिलजुलकर नहीं चलेंगे, मीलार्ड?

समझदार न्यायमूर्ति सहमति में हिलाते हैं सिर
वो कम्युनिस्टों के प्रोपेगण्डा से, हह, भला प्रभावित होंगे?
न्याय सबके लिए समान है
और सबको मिलना ही चाहिए चाहे वो हत्यारा ही क्यों न हो.

फ़ैसला आ गया है, हत्यारो !!!
सब नियम ख़त्म हुए,
सब किताबें हुईं बंद,
सभी आलोचनाएँ भी ख़त्म हुईं,
ख़त्म हुई टीवी की बहसें,
ख़त्म सब आलेख और बयान
ख़त्म हुआ कविता लेखन भी.

जब सब ख़त्म हो रहा होता है,
तब फिर से तुम्हारी तरफ़ देखता है ये उदार समाज
हमारी प्राचीनता और हमारी शुद्धता के रक्षकों,
ओ हत्यारो !

वरिष्ठ हिन्दी कवि राजेश जोशी।

जुनेद को मार दो

बहाना कुछ भी करो

और जुनेद को मार डालो।

बहाना कुछ भी हो, जगह कोई भी

चलती ट्रेन हो, बस, सड़क, शौचालय या घर

नाम कुछ भी हो अख़लाक़, कॉमरेड जफ़र हुसैन या जुनेद

क्या फर्क पड़ता है

मकसद तो एक है

कि जुनेद को मार डालो!

ज़रुरी नहीं कि हर बार तुम ही जुनेद को मारो

तुम सिर्फ एक उन्माद पैदा करो, एक पागलपन

हत्यारे उनमें से अपने आप पैदा हो जायेंगे

और फिर, वो एक जुनेद तो क्याहर जुनेद को

मार डालेंगे।

भीड़ हजारों की हो या लाखों की क्या फर्क पड़ता है

अंधे बहरों की भीड़ गवाही नहीं देती

हकला हकला कर उनमें से कोई कहेगा

कि हादिसा बारह बजकर उन्नीस मिनिट पर हुआ

पर वो तो उस दिन ग्यारह बजकर अट्ठावन मिनट पर

घर चला गया था, उसने कुछ नहीं देखा

ये डरे हुए लोगों की भीड़ है

जानते हैं कि अगर निशानदेही करेंगे

तो वो भी मार दिये जायेंगे

जुनेद को मारना उनका मकसद नहीं

पर क्या करें तानाशाही की सड़क

बिना लाशों के नहीं बनती !

राजेश जोशी

 

 










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