हमारा समाज अपने बच्चों को अपनी जायदाद समझता है-अरुणा ब्रूटा

सम-सामयिक , , बुधवार , 14-02-2018


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लोकमित्र गौतम

वैलेंटाइन डे पर विशेष 

भारत सिर्फ राजनीति के मामले में ही विचित्रताओं का मेला नहीं है। हर मामले में हमारा समाज बहुत विचित्र और पाखंडी हैं। भले हम हर साल 30 लाख ग्रेजुएट पैदा करते हों। भले हम अब दुनिया की 6 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो। भले हमें सदियों से बहुधर्मी और बहुमान्यताओं के बीच जीने का अनुभव हो। भले कहने के लिए हम दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र हों लेकिन खानपान, शादी-ब्याह और प्यार मोहब्बत के मामले में हकीकत इसके बिलकुल उलट है।इस मामले में हम कट्टर मुस्लिम देशों की ही जमात में आते हैं।अगर ऐसा न होता तो हर साल हमारे यहां 200 से ज्याद मासूम नौजवान ऑनर किलिंग का शिकार न होते। उनका कुसूर सिर्फ इतना होता है कि उन्होंने अपने दिल की आवाज पर किसी से प्यार किया होता है। आखिर इस बर्बरता की वजह क्या है?आखिर भारतीय मां-बाप को अपने बच्चे प्यार करते अच्छे क्यों नहीं लगते? इन तमाम सवालों पर देश की जानी मानी मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा से वरिष्ठ पत्रकार लोकमित्र गौतम की विस्तृत बातचीत का महत्वपूर्ण अंश -

लोकमित्र- अरुणा जी अपने बच्चों के लिये ही जीने-मरने का दावा करने वाले भारतीय मां-बाप आखिरकार अपने बच्चों के प्यार करने और उनके द्वारा अपने मन की शादी करने के नाम पर ही क्यों बर्बर हो जाते हैं? आखिर ये कौन सा मनोविज्ञान है जिसके चलते आज भी भारतीय मां-बाप अपने बच्चों के प्यार को,उनकी चाहत को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं? 

अरुणा ब्रूटा- दरअसल इस कट्टरता की बुनियाद उस दिन ही पड़ जाती है, जब कोई बच्चा पैदा होता है। मां-बाप समझते हैं हमने बच्चा पैदा किया है। यह हमारी चीज है। यह हमारी प्रॉपर्टी है। यह हमारी कठपुतली है। हम इसकी जैसे जैसे डोर खींचें,जैसे हम इसे नचाना चाहें,यह वैसे ही नाचे। लेकिन जब यही कठपुतली किसी दिन यह जाहिर करती है कि वह किसी से प्यार करती है या किसी दिन यह कठपुतली बच्चा अपने लिए जीवनसाथी खुद ही चुनने की हिमाकत करता है। यह बात मां-बाप के इगो को तार-तार कर देती है। इससे उन्हें चोट पहुंचती है। उन्हें लगता है उनकी डोर के इशारे को,उनकी ही कठपुतली ने मानने से इंकार कर दिया है। यह बात उन्हें बहुत नागवार गुजरती है। क्योंकि उनके बच्चे ने उनकी अब तक की सोच को,उनके पाले गए सपनी को एक झटके में ही खारिज कर दिया होता है।यह किसी भी तरह मां-बाप को बर्दाश्त नहीं होता। इसी बर्दाश्तहीनता से उनमें दबा हुआ जंगलीपन,उनमें वर्षों का दबा हुआ आक्रोश उभरने लगता है और फिर किसी दिन उनका कोई ऐसा रूप सामने आता है, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है। गोकि वह हमेशा उनमें,उनके साथ ही होता है।

 लोकमित्र-आखिरकार उनमें अपने प्यारे बच्चों के लिए अचानक इतना गुस्सा इतनी बर्बरता कहां  से आ जाती है ?

अरुणा ब्रूटा –दरअसल यह उनमें होती तो हमेशा है बस अच्छेपन के अभिनय और इस अभिनय के सतत अभ्यास से दबी भर रहती है। लेकिन अब यहां एक सवाल यह उठता है कि प्यार के मामले में ही बच्चों का निजी डिसीजन मां-बाप को क्यों इस कदर नागवार गुजरता है? बच्चा अपने आप कोई नौकरी ढूंढ ले तब मां-बाप इस कदर नाराज क्यों नहीं होते ? वह चोरी छिपे किसी खेल में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ले,तब मां-बाप उस पर क्रोधित क्यों नहीं होते ? तब तो उलटे रोमांचित होते हैं कि देखो हमारा बच्चा कितना जीनियस है। इसने हमारी बिना मदद के ही इतनी बड़ी सफलता अपने आप हासिल कर ली। दरअसल हम इस सरलीकृत ढंग से सोचते हुए एक बड़ी बात की अनदेखी करते हैं कि ये तमाम बातें,बच्चों के मां-बाप के साथ सम्बन्ध जितनी महत्पूर्ण नहीं होती हैं,बच्चे का मां-बाप के साथ सम्बन्ध उससे भी कहीं बड़ी बात होती है। बच्चों के सम्बन्ध के जरिये मां-बाप समाज के बीच कुछ दूसरी ही छवि पेश करना चाहते हैं। मसलन वह लोगों के बीच यह कहते हुए अपनी धाक जमाना चाहते हैं कि देखो हमारा बच्चा बड़ा ही आज्ञाकारी है। वह उनकी इच्छा और अनुमति के बिना जिंदगी का इतना बड़ा फैसला नहीं करता। लेकिन जब बच्चा ऐसा कर लेता है तो उन्हें लगता है कि उसने उनकी नाक कटा दी। समाज में उन्हें नीचा दिखा दिया। इसलिए वह तिलमिला जाते हैं ।

लोकमित्र-क्या यह सब अचानक होता है ? 

अरुणा ब्रूटा-नहीं अचानक नहीं होता। मां-बाप बच्चों से भले अच्छी अच्छी बातें करते रहते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनका यह रूप भी उनकी सच्चाई है ,जिससे शायद उनके बच्चे परिचित नहीं होते और कई बार तो इर्द-गिर्द का समाज भी उस सबसे परिचित नहीं होता। जब बच्चे मां-बाप कि अनदेखी करके अपना जीवन साथी चुनने की कोशिश करते हैं तो उनके अन्दर कि अभी तक की ढंकी इच्छाएं बाहर आ जाती है और वह अपनी इच्छा की कसौटी में बच्चों के फैसले को कसने लगते हैं। दरअसल भले मां-बाप कभी इस बात को उजागर न करते हों या बिना कुछ कहे झूठमूठ की प्रगतिशीलता दर्शाते हों।

लोकमित्र-आखिर दिल के तहखाने में दबी इस बर्बरता की वजह क्या होती है ?

अरुणा ब्रूटा- दरअसल ज्यादातर हिन्दुस्तानी मां -बाप अपने बच्चों के लिए ऐसा रिश्ता चाहते होते हों ,जो उनकी जाति बिरादर से हो (..और इसके लिए उनके पास तमाम वैज्ञानिक कहे जाने वाले तर्क भी होते हैं ),जो उनके स्टैण्डर्ड का हो यानी फाईनेंसली उनसे मैच करता हो,जो उनकी भाषा बोलता या बोलती हो। वह उनकी माइथोलोजी शेयर करता हो,जिसके लिए आजकल बढ़िया शब्द है कि वह उनके बिलीफ शेयर करता हो । वह ऐसा हो कि उसके जिक्र से उनका,उनके खानदान का रुतबा अगर बढ़ता न हो तो घटता तो कतई न हो। ये तमाम चीजें हैं जो यकायक उन्हें परेशान करने लगती हैं जैसे ही किसी मां बाप को यह पता चलता है कि उसका बच्चा उनकी नहीं बल्कि अपनी मर्जी की शादी करना चाहता है। यही वजह है कि मां-बाप बच्चों के निर्णयों को सब मामलों में तो प्रोत्साहित करते हैं,लेकिन प्यार या शादी  के मामले में इसे कतई बर्दाश्त नहीं करते।

                                                 


 










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