साढ़े चौदह हजार साल पुरानी रोटियों के रसायनशास्त्र से इतिहासकार परेशान और वैज्ञानिक सम्मोहित

धरोहर , , बृहस्पतिवार , 19-07-2018


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चंद्रभूषण

साढ़े चौदह हजार साल पहले पकी कुछ रोटियों की खुशबू ने अभी इतिहासकारों से ज्यादा वैज्ञानिकों को सम्मोहित कर रखा है। कारण यह कि इतिहासकारों के लिए अभी इस बात को जेहन में अंटाना ही मुश्किल हो रहा है। कारण यह कि दुनिया में कहीं भी खेती होने के जो भी प्रमाण मिले हैं, उनका समय साढ़े नौ हजार पहले से ज्यादा का नहीं है। इसे एक हजार साल पहले खींच कर ले जाएं तो भी ये रोटियां खेती शुरू होने से कम से कम चार हजार साल पहले पकी थीं। यह भला कैसे संभव हुआ, और अगर हुआ भी तो बिना खेती के रोटियां आखिर बनीं किस चीज से।

संसार की सबसे पुरानी सभ्यता तुर्की, सीरिया, जॉर्डन और इजराइल के अर्धचंद्राकार इलाके में दर्ज की गई है, जहां सबसे पहले खेती होने के प्रमाण पाए गए। जिस चूल्हे में इन साढ़े चौदह हजार साल (इंसानी पीढ़ियों में बात करें तो लगभग सात सौ पीढ़ी) पुरानी जली हुई रोटियों के 24 अवशेष पाए गए हैं, वह जॉर्डन की शुबैका-1 साइट में स्थित है। यह जमीन में खुदा हुआ एक पाषाणकालीन चूल्हा है, जिसमें रोटियां पकाते हुए लोग किसी इंसानी हमले, प्राकृतिक आपदा या जानवर के डर से इन्हें अधबीच में ही छोड़कर भाग खड़े हुए होंगे। इनकी उम्र कार्बन डेटिंग के जरिये निकाली गई है।

लेकिन ये अवशेष रोटियों के ही हैं, भुने हुए दानों के नहीं, इसका पता कैसे चला होगा? दरअसल, भुने हुए दानों और रोटियां का रसायनशास्त्र बिल्कुल अलग होता है। रोटियां, यानी पिसे हुए दानों और पानी के गुलगुले मिश्रण का सीधे आग में या भाप में या बीच में तवे जैसा कोई माध्यम रख कर पकाया जाना। इस लिहाज से इस चूल्हे को तंदूर से मिलती-जुलती चीज माना जा सकता है। एक्स-रे परावर्तन के जरिये ज्ञात हुई केमिस्ट्री चूल्हे में मौजूद अवरशेषों को रोटियों जैसी ही किसी चीज से जोड़ पा रही है। इसमें काम आए दाने बाजरा, जई या किसी अति प्राचीन गेहूं के हो सकते हैं। कुछ अवशेष शकरकंदी जैसे किसी कंद वनस्पति के भी हो सकते हैं।

यह इलाका नटूफियन सभ्यता से जोड़कर देखा जाता है, जिसका समय साढ़े बारह हजार साल पहले से लेकर साढ़े नौ हजार साल पहले के बीच का माना जाता रहा है। मानव सभ्यता के उस घुमंतू दौर में इसी जाति ने एक जगह जमकर रहना शुरू किया और यहीं संसार का सबसे पुराना शहर जेरिको बसाया। लेकिन जिस पाषाणकालीन चूल्हे में जली रोटियों के अवशेष पाए गए हैं, वह अगर किसी और अधिक पुरानी सभ्यता से नहीं जुड़ा है तो नटूफियन सभ्यता को निर्धारित आयु से दो हजार साल और पीछे ले जाने का श्रेय उसी को जाएगा।

इन रोटियों के लिए जहां-तहां से जुटाए गए अनाज को पीसकर आटा बनाया गया होगा, इसकी उम्मीद कम है। एक जगह और समय में अनाज की बहुत कम उपलब्धता को देखते हुए चक्की जैसी कोई चीज उस दौर के लिए सुदूर भविष्य की टेक्नॉलजी ही जान पड़ती है। तो क्या कभी रोटियां गीले या नम अनाज को सीधे पत्थरों से कूटकर भी बनाई और पकाई जाती रही होंगी? अपने जीवन के एक ठीक-ठाक हिस्से में मैंने घर के पिसे आटे की रोटियां ही खाई हैं। बिजली या डीजल से चलने वाली चक्की शुरू होने के बाद महज पांच-दस सालों में उस दौर को याद करना भी कठिन हो गया। कितनी अच्छी बात है कि एडवांस टेक्नॉलजी के बल पर आज हम साढ़े चौदह हजार साल पुरानी तकनीक से पकी रोटी को भी याद कर पा रहे हैं!

                                 (वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण के फेसबुक वॉल से साभार)








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