स्टीफन हाॅकिंग्स् ने दी जीवन और विज्ञान के रिश्तों को नई ऊंचाई

स्मृतिशेष , , सोमवार , 09-04-2018


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संदीप जोशी

नई दिल्ली। ब्रह्मांड विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग्स् कुछ समय पहले ब्रह्म में लीन हो गए। हजारों लोग उनके आॉक्सफोर्ड विद्यालय वाले घर भावभीनी विदाई देने पहुंचे। स्टीफन हाॅकिंग्स् को अल्बर्ट आइंस्टाईन और आइसाक न्यूटन की शैली में महान विज्ञानी माना गया। शारीरिक अक्षमता के बावजूद,दुनिया के लिए वे विराट आत्मीय क्षमता के विज्ञानी थे। जिंदादिली को कोरा ज्ञान न मानते हुए जीवन को विज्ञान के सहारे समझने की उम्रभर उनकी कोशिश रही। हाॅकिंग्स् का जीवन और विज्ञान के विकास के लिए उनके विचार वैज्ञानिकों की जिज्ञासा बने रहेंगे। वे मन की उड़ान के दिमागी परिंदे थे।

एक फिल्मी किस्सा याद आता है। घर की छत पर दादा-पोती शाम के आकाश को निहार रहे थे। आठ साल की पोती ने दादा से कठिन सवाल किया। पूछा,आकाश का रंग क्या है? दादा ने बिना ताव देते हुए जवाब दिया ‘आकाश का रंग पीला है’। आकाश की ओर देखते हुए पोती ने हंसी का ठहाका लगाया। आपको इतना भी नहीं मालूम? पोती ने फिर सवाल किया। दादा ने पोती के ठहाके का आनंद लेते हुए कहा ‘आकाश का रंग पीला हो या नीला, इससे ज्यादा जरूरी है तुम्हारा आनंद में हंसना’। ज्ञान और विज्ञान से परे भी जीवन है। अपनी अज्ञानता को जानना भी ज्ञान ही है। ब्रह्मांड विज्ञानी स्टीफन हाॅकिंग्स् अपनी अज्ञानता को जानने वाले ब्रह्मज्ञानी भी थे। हाॅकिंग्स् ने आसमान को शरीर की आंखों के बजाए मन की आंखों से देखा। यही उनकी लोकलुभावनी लोकप्रियता का कारण रहा।

‘समय का संक्षेप इतिहास’ लिखने वाले स्टीफन हाॅकिंग्स् ने यह भी कहा था ‘अतीत ने कभी भविष्य को विश्वसनीय दिशा नहीं दी ..... हम जो निश्चित तौर पर संसार के बारे में कह सकतें हैं वह यह कि आने वाला कल अलग होगा। कुछ हद तक यह मुझे भयभीत भी करता है - लेकिन सभी की तरह मैं भी इसे देखने के लिए सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हूं’। उन्होंने यह भी माना था कि ‘हमारी तकनीकी योग्यताओं ने हमारी विवेकीय शक्ति को हताहत किया है’। आज तकनीक के कारण रोज खड़ी होती समस्याओं से अपन जूझ ही रहे हैं। इसलिए स्टीफन हाॅकिंग्स् एक लोकप्रिय वैज्ञानिक ही नहीं, एक ऊंचे दर्जे के सामाजिक दार्शनिक भी थे।

भौतिक वैज्ञानिकों के एक भोज के दौरान घोषणा हुई की हॉकिंग्स् कुछ कहने वाले हैं। विज्ञानियों का उत्सुकतावश उनकी ओर ध्यान गया। अपने मन की बात जब उन्होंने कंप्यूटर के द्वारा कही तो भोजनकाल उनकी भक्तिकाल में बदल गया। भौतिक विज्ञानी इंतजार कर रहे थे किसी भौतिक रहस्य का। लेकिन हाॅकिंग्स् के कंप्यूटर ने जब कहा ‘और सूप लीजिए’ तो रहस्यमय माहौल राहत भरे आनंद में बदल गया। इसे एक भौतिक विज्ञानी का भावनात्मक ज्ञान भी कह सकते हैं। हाॅकिंग्स् के लिए भौतिकी का विज्ञान भावना के ज्ञान से ज्यादा नहीं था।

कुछ दिनों पहले छोटी सार्थक फिल्में बनाने वाली संस्था ‘फ्यूचर शार्टस्’ ने एक फिल्म बनायी थी ‘द ब्लैक होल’। उसमें एक आदमी के असीम लालच को दर्शाया गया था। एक सुस्ताता आदमी फोटो कॉपी मशीन पर काम कर रहा है। अचानक सफेद कागज पर काला बड़ा गोला छप कर निकल आता है। उस काले गोले में से उसका हाथ आर-पार निकल सकता था। उस कागज को किसी भी बंद चीज के आगे लगाने से उसका हाथ अंदर जा सकता था। पहले वो बंद मशीन से चाॅकलेट निकालता है और फिर उसकी नजर दफ्तर की तिजोरी पर पड़ती है। तिजोरी के आगे काले गोले को लगाता है तो उसका हाथ अंदर चला जाता है। वह रुपए निकालता है। लेकिन तिजोरी साफ करने के लालच के कारण वो तिजोरी में पूरा घुस जाता है। लेकिन तभी चिपका हुआ काले गोले वाला कागज तिजोरी के दरवाजे से गिर जाता है। उस लालची आदमी के तिजोरी से बाहर आने का रास्ता ही बंद हो जाता है। ‘ब्लैक होल’ के आकार विकार को जानना उतना ही कठिन है जितना अपने लालच पर लगाम लगाना।

अपना सौभाग्य ही था जो जनवरी 2001 में स्टीफन हाॅकिंग्स् का ‘अल्बर्ट आइंस्टाईन लेक्चर’ सुनने का मौका मिला। दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में हुआ व्याख्यान ‘एस्ट्रोलौजी से ब्लैक होल तक’ यादगार रहा। वह केवल विज्ञानी व्याख्यान नहीं था बल्कि मानवीय आशावाद आौर आत्मीय साहस से भरा साक्षात्कार था। उसमें उन्होंने कहा था ‘बुद्धिमता वह योग्यता है जिससे बदलाव को स्वीकार करने की क्षमता मिले’। उनका मानना था की दिमाग कंप्यूटर है और पुर्जे खराब होने पर काम करना बंद कर देता है। मृत कंप्यूटर का कोई स्वर्ग या पुनर्जीवन नहीं होता, और अंधकार से डरने वालों की यही कहानी है। वे हर-कुछ और सब-कुछ के सिद्धांत को मानने वाले विज्ञानी थे। उनका मानना था की कुछ भी हर समय के लिए नहीं रहता।

स्टीफन हाॅकिंग्स् ने अंतरिक्ष की खगोलिक भौतिकी और पृथ्वी की मानवीय भावना को समृद्ध किया। और बताया की जीवन समस्या नहीं है जिसे हल करने में ही लगा जाए। जरूरी है रहस्यमय जीवन को जीना। रहस्यमय जीवन के साहसी योद्धा को प्रणाम।

         (समाज, राजनीति और खेल पर लगातार लिखने वाले संदीप जोशी रणजी क्रिकेटर रहे हैं।)








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