ताली और गाली का राजनीतिक सौंदर्य शास्त्र

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 11-08-2018


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बसन्त रावत

ताली और गाली का अपना एक अद्वितीय राजनीतिक सौंदर्य शास्त्र है। अद्वैत कह सकते हो। ये दो नहीं बल्कि एक ही हैं। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बड़ा प्रगाढ़ अटूट  नाता है दोनों में। जिसे ताली की मधुर कर्णप्रिय गड़गड़ाहट सुनने को मिलती है, उसे कभी-कभी गाली के अलौकिक आनंद की चुस्कियां भी लेनी पड़ती हैं। फूलाहार ताली का मूर्त रूप  है और जूता, स्याशी गाली का उग्र, बाचाल  तरल रूप। जिसने पाया, जिसे मिला वही अनुभवी खुशनसीब जानता है गाली और ताली का  मर्म। अब तक मानव सभ्यता में इज़ाद की गयी सबसे अनोखी चीज़। जिसने भी इसको इज़ाद किया, धन्य है वो। कितना बड़ा काम आसान कर दिया। हमें भाषा की दरिद्रता  से बचा दिया। जो बात शब्दो में नहीं कही जा सकती, ताली और गाली की ऊंटपटांग शब्दावली से काम चल जाता है। बरना जरा सोचो आज के दौर के राजनैतिक भक्तजन और ट्रॉल्स बेचारे क्या करते ! उनका काम बेहद आसान करने के लिए धन्यवाद शब्द बहुत बौना,नाकाफी सा लगता है।

ताली और गाली इस दौर की दो अदभुत चीजें  हैं जो इस ज़माने को डिफाइन करती है। जीवन अधूरा है। ताली और गाली के बिना सब सूना-सूना है। ताली बजाने वाला ही गाली देता है। यानी ताली है तो गाली है। गाली नहीं तो ताली भी नहीं। जुड़वा कह सकते हैं इन्हें। तो अब ठोको ताली। इतनी ताली बजाओ की ताली ही गाली बन जाय। तालीमय गाली जिसकी गूंज इस वक्त पूरे ब्रह्मांड में गूंज जाय।

ताली और गाली जितना चाहो ले लो बिना राशनकार्ड के। फ्री में ले लो। किसी टोले में शामिल हो जाओ, भक्त बन जाओ, जयकारा लगाना सीख जाओ। किसी राष्ट्रवादी नेता की ट्रोल आर्मी में शामिल होकर कुछ पैसा  भी मिल  जायेगा और गालियों का विष्णुसहर्ष नाम भी जुबानी याद हो जाएगा। और लगे हाथ कई जन्म के पाप मिट जाएंगे।और जेब भी टनाटन रहेगी। अपनी आने वाली पीढ़ियों को गर्व से बता पाओगे अपने पराक्रम के बारे में। सोशल मीडिया में कितनी गंदगी फैलाई, कितनों को गाली देना सिखाया, कितनों को रोगी बनाया। कितने अंध भक्त पैदा किये और बंद  दिमाग  के बेहूदा भक्तों की फसल उगायी। गाली और ताली में राजनैतिक और आध्यात्मिक समानता और भेद है। 

इसको समझने के लिए गालियों का  नया पाठ्यक्रम तैयार किया जाना वक्त की माग है। इस से पता चलेगा कि हमने कुल कितने तालीबाज़- गालीवीर पैदा कर इस देश का नाम रोशन किया। क्या किसी खास गाली को लेकर कभी कॉपीराइट के लिए  किसी ने  गाली  खाई या गाली  परोशी गयी किसी धन्यभागी को? 

अब वक्त आ गया है। हमारे गाली प्रेमी राजनेता गाली और ताली को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दे दे। गालियों का एक वर्ल्ड क्लास विश्वकोष तैयार कराये। और साथ ही तालियो की अंनुगूंज का मनोवैज्ञानिक अध्ययन कराये। ताकि पता चले तालियों का हमारे मन और मस्तिष्क पर क्या-क्या सकारात्मक असर पड़ता है। इससे कौन सी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। अगर अध्ययन से फायदे दिखते हैं तो पूरे देश में ताली बजाने के लिए नए क्लब  खोले जा सकते हैं। राजनैतिक दलों की ट्रोल आर्मी को इस महान ऐतिहासिक दायित्व के लिये आउटसोर्स किया जा सकता है। NCRT को ताली और गाली को लेकर नया पाठ्यक्रम तैयार करने के लिये कहा जा सकता है। अगर चाहे तो कला और संस्कृति विभाग इस दायित्व को किसी दरबारी कलाकार को भी सौंप सकता है।

इसके लिए तत्काल राष्ट्रीय अवार्ड्स का ऐलान कर ताली और गाली की कला और संस्कृति को एक नया आयाम मिल सकता है। अब देखना ये है कि हमारी राष्ट्रवादी ताली-गाली प्रेमी सरकार इस कला को प्रमोट करने के लिये लाल किले से  क्या नया ऐलान करती है। हमें भी इंतज़ार रहेगा उन तमाम गालीबाज तालीबाज़ कला प्रेमियों की तरह जो ताली और गाली को कला का दर्जा देकर देश को सांस्कृतिक रूप से सम्पन्न बनाना चाहते हैं। देश को जगतगुरु बनाना चाहते हैं। ऐसे देशप्रेमियों के लिये ठोको ताली। ताली जिसकी गूंज यूनाइटेड नेशन से लेकर व्हाइट हाउस तक जाय। आफ्टर आल एव्री बॉडी हट्स गाली एंड लव्स ताली। ठोको ताली।

                                      (बसंत रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

 




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