बलराज साहनी: सिनेमा का एक दीवाना लड़का, जिसने रंगमंच को दी एक नई पहचान

जयंती पर विशेष , , बुधवार , 01-05-2019


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आलोक शुक्ला

देश स्वतंत्र होने के लगभग तीन दशक पूर्व भारतीय सिनेमा में किसी चमत्कार के रूप में दादा साहेब फाल्के की भारतीय सिनेमा की सबसे पहली मूक फिल्म राजा हरिशचंद्र 3 मई 1913 को 'कोरोनेशन सिनेमेटोग्राफ' में प्रदर्शित हुई। इसके 2 रोज़ पहले एक चमत्कार की तरह श्रमिक दिवस यानी 1 मई, 1913 को रावलपिंडी के एक आर्यसमाजी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। जो आगे चल कर न सिर्फ भारतीय सिनेमा को बल्कि भारतीय रंगमंच को भी एक नई दिशा प्रदान की और ये बालक... और कोई नहीं बलराज साहनी थे। बलराज साहनी ने ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘लाजवंती’, ‘कठपुतली’, ‘सीमा’, ‘काबुलीवाला’,’गर्म हवा’, ‘हकीकत’, ‘संघर्ष’, ‘पवित्र पापी’ या ‘वक्त’ जैसी फिल्मों में अपने उत्कृष्ट और नैसर्गिक अभिनय के लिए जाने जाते हैं। लेकिन शायद यह कम ही लोग जानते हैं कि वे रंगमंच की अग्रणी संस्था इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) के संस्थापक भी थे। उन्होंने इस संस्था में बतौर लेखक, निर्देशक और अभिनेता के रूप में सेवाएं प्रदान की। इप्टा की स्थापना और उनके जीवन में रंगमंच की इंट्री की कहानी का विस्तार जानने के लिए सारांश में हम उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को स्पर्श करते और अलग-अलग शहरों को देखते चलेंगे। क्योंकि बलराज साहनी का जीवन काफी कुछ शहर दर शहर आगे बढ़ा है।

रावलपिंडी- सिनेमा का एक दीवाना लड़का

बलराज साहनी, बालपन में सिनेमा का एक दीवाना लड़का भर था जो किसी भी हालत में कैसे भी फिल्में देखने का आशिक था और वो भी सेक्स से भरी विलायती फ़िल्में...(अपनी आत्मकथा में इस बात को उन्होंने खुद स्वीकारा है।)

पहली मूक फिल्म के निर्माण के 8 साल बाद 1920 में भी सिनेमा को गंदी नज़र से देखा जाता था। तब महज 8 साल के बलराज को संयोग से सबसे पहली बार एक विलायती सिनेमा देखने का मौका मिला। रावलपिंडी में एक मैदान में बड़ा सा शामियाना लगा कर हो रहे ‘बाईस्कोप शो’ में एक मूक फिल्म दिखाई जा रही थी। और एक व्यक्ति क्रिकेट मैच की तरह फिल्म के सीन्स की कमेंट्री कर रहा था लेकिन ये फिल्म सेक्स सीन से भरी थी, जिसने बालक बलराज को अचरज से भर दिया।

इसके कुछेक सालों बाद जब बलराज 10 वीं कक्षा में पहुंचे तब उन्हें अंग्रेजी भाषा के पाठ्यक्रम में रूपर्ट ऑफ़ हेंटज़ौ नामक एक उपन्यास पढ़ाया जाया था और एक दिन इसी उपन्यास पर बनी फिल्म का प्रदर्शन रावलपिंडी के पहले सिनेमा घर, गुलाब सिनेमा के उद्घाटन के जश्न के रूप में हो रहा था और बलराज के हेडमास्टर सभी लड़कों को इसमें ले जा रहे थे।

बलराज के आर्यसमाजी पिता सिनेमा के एकदम खिलाफ थे लेकिन जब हेडमास्टर ने पाठ्यक्रम की पुस्तक पर बनी फिल्म का हवाला दिया तो वे राज़ी हो गए। हालांकि यह भी एक अमेरकी फिल्म थी और सेक्स सीन से भरी थी। इससे हेडमास्टर साब भी काफी शर्मिंदा हुए लेकिन बलराज के किशोर मन को ऐसी फिल्मों का चस्का लग गया और पिता से बहाना बना कर उन्होंने ऐसी फिल्में देखना जारी रखा। उनकी इस आदत में थोडा सुधार तब हुआ जबकि उन्हें हीर रांझा और अनारकली जैसी क्लासिक फिल्में देखने को मिली।

इन फिल्मों ने बलराज को न सिर्फ खूब प्रभावित किया बल्कि लिखने-पढने के प्रति उनका रुझान भी बढ़ा। हालांकि पहले अमेरकी और बाद में रुसी फ़िल्में उनकी पसंदीदा बनी रही। दोस्त उन्हें अभिनेता गिल्बर्ट के जैसा कहने लगे और बलराज भी रुसी टोपी लगाकर आईने के सामने घंटों खड़े हो कर अपने को घंटों निहारते रहते।

लाहौर-रंगमंच का आगाज़

1931 में भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म ‘आलामआरा’ आई तभी बलराज के जीवन में रावलपिंडी के बाद लाहौर आया और इस शहर में गवर्मेंट कालेज में उनका बीए में प्रवेश हुआ। नए शहर में भी उनका फ़िल्मी चस्का बरकरार रहा। हालांकि कवियों और साहित्यकारों को उन्होंने लगातार पढ़ा था, इस कारण उन्हें कॉलेज में एक प्रतिभाशाली लेखक और वक्ता के रूप में प्रसिद्ध किया। एमए में  आते- आते उनका जुड़ाव रंगमच से हुआ और कॉलेज की ड्रामा सोसायटी द्वारा आयोजित नाटकों में उन्होंने अभिनय करना शुरू कर दिया था, जिसके अध्यक्ष प्रोफेसर बुखारी थे और उनके सहयोगियों में थे जीडी सोंधी, ईश्वरचंद्र नंदा और इम्तियाज अली ताज।

गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर और विशेष रूप से इसकी ड्रामा सोसायटी ने बलराज को अभिनय कला की अवधारणाओं को सिखाया और उन्हें नाटकों से परिचित कराया। सच कहें तो प्रोफेसर बुखारी और उनके सहयोगियों ने सही मायनों में सिनेमा के इस दीवाने लड़के को निर्देशित किया था और इसके लिए हम सब को आभारी होना चाहिए क्योंकि उन्होंने बलराज को वो आकार दिया जिसके लिए वे बने थे, बलराज खुद अपनी आत्मकथा में इन सभी गुरुओं को सलाम करते हुए, आत्मिक आभार व्यक्त करते हैं।

हालांकि इस दौरान उनका फिल्में देखने का शौक कम नहीं हुआ पर ये ज़रूर हुआ कि अच्छा सिनेमा और साहित्य भी उनकी जिंदगी में आ गया, ‘पूरन भगत’ फिल्म से वे इतने प्रभावित हुए कि इसे उन्होंने करीब 6 बार देखा और 1936 आते-आते उन्हें लगा कि वे अपने पिता के कपड़ों के व्यवसाय से ज्यादा जुड़ने की बजाय फिल्मों में कोशिश करें तो ज्यादा कामयाब होंगे। वे अपने पिता के लेखक मित्र पंडित सुदर्शन से सलाह लेने कलकत्ता पहुंच गए लेकिन उन्हें इसका कोई फायदा नहीं हुआ ये  ज़रूर हुआ कि लौटने पर उनकी शादी दमयंती जी कर दी गई। 

कोलकाता – शांतिनिकेतन और नाटक  

एक साल बाद ही बलराज साहनी अपनी पत्नी दमयंती के साथ पंडित सुदर्शन से फिर मिले। लेकिन यह एक पारिवारिक मिलन था और बलराज किसी भी प्रकार से नहीं चाहते थे कि कोई उनकी फ़िल्मी जूनून की चर्चा करे इसलिए बलराज यही बातते रहे कि वो अपने पिता जी का व्यवसाय संभाल रहे हैं। हालांकि उनकी ये चाहत नहीं थी.. पर कहते हैं न कि जहां चाह वहां राह और आखिरकार, उन्होंने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में महज 50 रु महीने की नौकरी हासिल कर ली। जहां अंजनी जी और हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की बैठकें हुआ करती थी। लेकिन साहित्य और राजनीति पर ... फिल्मों पर नहीं.. इस नौकरी ने उन्हें बहुत जरूरी आत्मविश्वास दिया और सम्मान भी। चूंकि गुरुदेव बेहद सम्मानित व्यक्ति थे…

बलराज यहां पढ़ाने के साथ दमयंती के साथ अतिरिक्त कला गतिविधियों में व्यस्त रहने लगे, यह बलराज के लिए बेहद प्रेरक बात थी कि दमयंती भी कला रसिक थी और ये बात बलराज जी की कला यात्रा के लिए बेहद सहायक रही। यहां एक बार उन्होंने प्रसिद्ध रंगमंच कलाकार नन्दलाल बोस को मुख्य भूमिका में देखा और बेहद प्रभावित हुए और तभी शान्तिनिकेतन के छात्रों ने बर्नार्ड शॉ के नाटक ‘आर्म एंड द मैंन’ का हिंदी अनुवाद किया। इसका अनुवाद बलराज को बेहद पसंद आया। उनके मन में भी नाटक का प्रोडक्डशन करने का विचार आया। हालांकि आज की ही तरह उस वक्त भी रंगममंच आसान नहीं था पर यह बात बलराज को बाद में समझ आई।

उन्होंने प्रोडक्डशन की बारीकियों के बारे में बिना जाने-बूझे नाटक की रिहर्सल शुरू कर दी, अब जब शो की बात आई तो सहयोगियों ने बलराज को कॉस्टयूम और प्रोपर्टी की सूची दी जिसके लिए 100 रूपये की ज़रूरत आन पड़ी। जबकि उनकी तनख्वाह मात्र 50 रूपये महीने थी और उनके पास नाटक के लिए महज़ दस रुपये ही थे, वे बेहद परेशान हुए। भाग्य से उसी समय टीकमगढ़ के महाराजा शांतिनिकेतन में अतिथि के रूप में रह रहे थे। बलराज ने उनसे अनुरोध किया और महाराजा ने इस निमित्त सौ रुपये दे दिए। लेकिन यह शांतिनिकेतन के नियमों के खिलाफ था। इस सिलिसिले में उनकी रेक्टर से बहस भी हुई पर आखिर में बलराज को पैसे वापस करने को कह कर फटकार लगाई गई। बलराज बेहद आहत हुए और सहयोगियों ने नाटक रद्द करने की सलाह दी। ऐसे में एक दिन 'मास्टर मोशॉय' यानी नंदलाल बोस उनसे मिलने आये और

नाटक के रद्द करने की बात पर वे उन्हें कला भवन ले गए और उनसे बोला, जो प्रॉपर्टी या कॉस्टयूम चाहिए ले लो। बाद में बोस ने खुद लगातार दो दिन लग कर प्ले के हिसाब से सर्बियाई सोल्जर्स के कॉस्टयूम को तैयार करवाया, आख़िरकार नाटक हुआ। प्रथम पंक्ति में खुद गुरुदेव बैठे थे और खूब सराहना मिली।

नन्दलाल बोस का बलराज ने खूब आभार व्यक्त किया तब बलराज को अपने पास बुलाकर नन्दलाल ने कहा कि 'एक बात याद रखों कि यदि हजार रुपये खर्च करने को हो, तो कोई मूर्ख भी नाटक कर सकता है। लेकिन एक सच्चा कलाकार ही केवल 10 रूपये खर्च करके भी नाटक का मंचन कर सकता हैं’ ये  सीख  हर सच्चे रंगकर्मी के लिए गांठ बांध रखने की बात थी न सिर्फ उस समय बलराज  के लिए बल्कि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।  

ऐसे ही एक दफा, शान्तिनिकेतन में काम करते हुए उन्होंने पृथ्वीराज कपूर को फ़ोन किया जो उनकी पत्नी दमयन्ती के बड़े भाई के मित्र थे। उन्होंने खूब स्वागत किया, तब राजकपूर महज 12 वर्ष के प्यारे से बच्चे थे। पृथ्वीराज और जगदीश भापा ने उन्हें न्यू थिएटर स्टूडियो  घुमाया।  यहां सहगल और लीला देसाई की फिल्म की शूटिंग हो रही थी जिसे नितिन बोस निर्देशित कर रहे थे।

(बाद के सालों में दमयंती ने पृथ्वीराज के नाटक ‘दीवार’ में मुख्य रोल किया तो बलराज ने पृथ्वी राज द्वारा किये जा रहे नाटक ‘काबुलीवाला’ पर नितिन बोस ने फिल्म बनाई और उसमें बलराज को पठान का यादगार रोल दिया और फिर कठपुतली फिल्म में भी उन्हें लिया)

कोलकाता – सर्वोदय  और महात्मा गांधी

समय के साथ बलराज साहनी को शार्ट-स्टोरी  लेखक के रूप में पहचान मिलने लगी और शान्तिनिकेतन के बाद गांधी जी के सेवाग्राम में काम करने लगे। उस समय दुनिया युद्ध के कगार पर थी, हिटलर और मुसोलिनी की सेनाएं पूरे यूरोप को बर्बाद कर रही थीं।

गांधीजी ने सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था। लोग इससे असहज हो गए थे।  लेकिन यहां बलराज साहनी को जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, जाकिर हुसेन आदि शीर्ष नेताओं  को करीब से देखने का अवसर ज़रूर प्राप्त हुआ। ऐसे माहौल में स्वाभाविक रूप से वे नाटक और फिल्मों से दूर हो गए, इधर युद्ध के कारण यूरोप टूट चूका था जिसके पश्चात बलराज को बीबीसी में कार्यक्रम उद्घोषक के रूप में लंदन में काम करने का मौका मिल गया। 

लंदन, यूनिटी थिएटर और इन्डियन 'पीपुल्स थियेटर' की प्रेरणा

बीबीसी में बतौर कार्यक्रम उद्घोषक काम करते हुए लंदन ने उन पर एक अविस्मरणीय छाप छोड़ी, हालांकि वे यहां प्रारंभिक तौर पर अमेरकी फिल्मों के मोह में फिर फंस गए लेकिन धीरे धीरे अमेरिकी फिल्मों से भ्रमित बलराज की रूचि रुसी फिल्मों में बढ़ी, अलेक्जेंडर नोव्सकी, बैटलशिप,मदर,गोर्की लाइफ, वोल्गा-वोल्गा आदि कृतियां उनकी -प्रेरणा का स्रोत बनीं और मानवता में उनका विश्वास मजबूत हुआ! मार्क्सवाद और लेनिनवाद की ओर उनका झुकाव हुआ।  आइंसस्टीन और पुडोवकिन अब उनके लिए परिचित नाम थे। वे यूनिटी थिएटर के सदस्य बने और यहां उन्होंने अभिनय और कला की अच्छी समझ हासिल की।  

इधर उनकी पत्नी दमयन्ती भी बीबीसी स्टाफ में थी और कंधे से कन्धा मिला कर बखूबी काम कर रही थी। इस समय यूरोप और अमेरिका के प्रसिद्ध फिल्म और थिएटर कलाकार बीबीसी में आते थे स्टूडियो में नाटकों और स्कीट्स की रिहर्सल करते हुए  बॉब होप, लॉरेंस ओलिवियर, माइकल रेडग्रेव, बेबे डैनियल आदि हस्तिओं को करीब से देखना किसी सीख से कम नहीं था। विदेशी कलाकारों के काम के  करने तरीकों को देखने के बाद बलराज ने जाना कि अभिनय केवल ईश्वर द्वारा प्रदत्त उपहार नहीं बल्कि यह कुछ और ही है जो सतत अभ्यास, धैर्य और दृढ़ता से ही हासिल किया जा सकता है। उन्होंने यह भी सीखा कि एक कलाकार को अपनी आवाज़ बनावटी बनाने की कतई ज़रूरत नही होती। 

मुंबई, सिनेमा और रंगमंच

आख़िरकार 1943 मुम्बई में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की स्थापना का पहला महासम्मेलन हुआ। कहते हैं ये नाम वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा के सुझाव को मानकर डाला गया था। जो उन दिनों मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थे लेकिन इस बात से न मालूम क्यों परहेज़ किया जाता है कि मुख्यतः ये चाइना के ‘पीपुल्स थिएटर’ से प्रेरित था जिसे बलराज बखूबी अपनी आत्मकथा में बयान करते हैं। बहरहाल इसके पहले महासचिव श्रीलंका के कलाकार अनिल डी सिल्वा और पहले अध्यक्ष ट्रेड यूनियन नेता एन.एम. जोशी बने।   

यहां ये सब हो रहा था और लंदन में बठे बलराज और उनकी पत्नी भारत वापस आने की जुगत में लगे थे और 1944 की शुरूआत में युद्ध में जर्मनी के पराभव की संभावना के साथ इंग्लेंड और भारत के बीच समुद्री रास्ता बहाल होते ही बलराज दमयंती के साथ मार्च में मुम्बई पहुंच गए। बलराज दम्पति के शुरूआती दिन ऐसे ही भारत की आबोहवा को महूसस करते हुए फक्कड़ी में गुजर गये, उस दौरान रेडियो में जॉब भी ऑफर हुई लेकिन उन्होंने मना कर दिया क्योकि वे अपनी स्वतंत्रता को अनुभव करना चाहते थे।

मुम्बई आते ही फ़िल्में उन्हें खूब लुभाने लगी, उन्होंने सबसे पहले वी शांताराम की शकुंतला देखी लेकिन यह उन्हें कतई पसंद नहीं आयी वे इसे शांताराम जी को बताना चाहते थे जिनसे वे अपने कलकत्ता वाले दिनों में उनसे मिले चुके थे .... वे यहां अपने लेखक मित्र कृष्ण चन्द्र और चेतन आनंद से भी मिले। 

इधर वे कुछ दिन के लिए श्रीनगर गए और तभी चेतन आनंद उनके पास कालजयी फिल्म नीचा नगर का प्रस्ताव लेकर आये जिसमें 20 हज़ार रूपये मेहताना मिलना था। यह बहुत बड़ी राशि थी लेकिन बावजूद इसके उन्हें इस फिल्म ने बहुत अधिक प्रभावित नहीं किया और उन्होंने वापस शांतिनिकेतन आने हेतु हिंदी विभाग के अध्यक्ष हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को मदद के लिए पत्र भी लिखा जिसका उन्होंने सकारात्मक जवाब दिया। हालांकि उनके पिता इसके खिलाफ़ थे और वे उन्हें वापस रेडियों में देखना चाहते थे। 

पत्नी दमयंती का जाना, बलराज का टूटना और नया नाटक

कुछ समय बाद दमयंती, बलराज का साथ छोड़कर अनंत में विलीन हो गई और बलराज को लगा उनकी दुनियां उजड़ गई, वे बच्चों के साथ वापस रावलपिंडी चले गये पर विभाजन की संभावनाओं के मद्देनज़र कम्युनिस्ट और अन्य दल पीस मार्च का आयोजन कर रहे थे।

चारों ओर दुःख तकलीफ को देखकर बलराज अपना दुःख भूलकर उस पीस मार्च में शामिल हो गए। कुछ समय बाद ही वे वहां से कश्मीर गये तो लेखक मित्र अमृतलाल नागर का फोन आया की वीरेंद्र देसाई उनकी एक शार्ट स्टोरी पर फिल्म गुंजन बनाना चाहते हैं और मेन रोल में उन्हें ही लेना चाहते हैं। ये नलनी जयवंत की पहली फिल्म थी वे वापस मुंबई आ गए लेकिन वे मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं थे, दमयंती के जाने के दुःख के साथ ही वे अंग्रेजी दासता से मुक्त हो रहे देश के विभाजन के दर्द से भी बेहद दुखी थे।

वे अपने अभिनय में बिलकुल ध्यान नहीं दे पाए। कैमरे के सामने उन्हें अपना सारा ज्ञान अधूरा लग रहा था हालांकि समय–समय पर अभिनेता डेविड और अभिनेत्री दुर्गा खोटे उन्हें कैमरे के सामने अभिनय के बारे में समझाते रहे जिसका उन्होंने अपनी आत्मकथा में आभार भी व्यक्त किया .... खैर ये फिल्म बिलकुल नहीं चली और अब बलराज हर संभव रास्ते पर दस्तक दे रहे थे पर उनके लिए सबसे अच्छी बात ये थी कि बलराज, अपनी फ़िल्मी विफलताओं से अधिक इप्टा के संगठन में कहीं मजबूती से खड़े थे।  

नाटक, पार्टी और जेल 

साल 1949 में बलराज साहनी बलवंत गार्गी के नाटक सिग्नलमैन दुली की रिहर्सल कर रहे थे रिहर्सल के मध्य में ही एक सन्देश आया कि बैठक में दोनों बलराज और उनकी पत्नी तोश, दोनों की आवश्यकता थी, एक जुलूस में भाग लेना हैं, जो कम्युनिस्ट पार्टी निकाल रही थी अपने परेल कार्यालय से। वे तुरंत पहुंचे,जुलुस के साथ पुलिसकर्मियों की काफी संख्या, लेकिन इस बात को उन्होंने नजरअंदाज कर दिया लेकिन मुश्किल से सबने कुछ कदम ही उठाए होंगे कि पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया, जुलुस में नारे चिल्लाने के आरोप में बलराज को गिरफ्तार कर लिया गया, तब शुरुआती दो महीने उन्होंने बरेली की जेल में बिताए थे जबकि उसके बाद VIP ट्रीटमेंट करते हुए उन्हें बॉम्बे जेल भेज दिया गया। यह समय काफी मुश्किल था क्योंकि अभी कुछ महीने पहले ही उनकी दूसरी शादी तोश से  हुई  थी।  

 जेल के बाद..

जेल से लौटने के बाद बलराज जी की ज़िन्दगी थोड़ी मुश्किल फंस गई, इप्टा में भी न मालूम क्यों उन्हें इग्नोर करने लगे और फिल्म में भी काम मिलना मुश्किल हो गया था, ऐसे में 1951 में उन्हें दिलीप कुमार के भाई  की सिफारिश पर के. आसिफ की फिल्म हलचल मिली, इस समय उनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी  और उनके दोनों बच्चे परीक्षित और शबनम ये सब महसूस भी कर रहे थे। हालांकि असमय ही शबनम की मौत हो गयी,और इस बात से बलराज बहुत आहत हुए।

बलराज जी के फ़िल्मी दुनिया में दिए योगदान से कहीं ज्यादा भारत का रंगकर्म उनका ऋणी है कि जिस दौर में पारसी थिएटर और तमाशे का कोलाहल था उस दौर में जन से जुड़े इप्टा के अभियान को न सिर्फ गति दी बल्कि रंगकर्म को एक जन आन्दोलन की शक्ल दी। बलराज साहनी जी की कला यात्रा महज 60 साल की थी और वे 13 अप्रैल 1973 में अपने अनंत में विलीन हो गए। इस दौरान उन्होंने दर्जनों नाटक किये और 100 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया उन्हें पद्म श्री के साथ अनेक अवार्ड मिले और भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया। 

(आलोक शुक्ला वरिष्ठ रंगकर्मी, लेखक, निर्देशक एवं पत्रकार हैं।)

 








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