जज साहेबान ! बस इतना बता दीजिए बेला एक्का अब कहां लौटेंगी?

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 23-02-2019


adivashi-jharkhand-chhattishgarh-supreemecourt-belaekka-dikku-forest

वीना

आदिवासियों-मूलनिवासियों को उनके गांव, घर-ज़मीन से बेदख़ल करने के सुप्रीम कोर्ट के हैरान-परेशान करने वाले फ़ैसले से बरबस ही मुझे दिवंगत प्रसिद्ध साहित्यकार अरुण प्रकाश की चर्चित कहानी – “बेला एक्का  लौट रही है” याद आ गई।

बेला एक्का झारखण्ड के गांव की एक ग़रीब आदिवासी लड़की है। पढ़ने में होशियार बेला रांची आदिवासी हॉस्टल में रह कर जैसे-तैसे बीए और फिर टीचर ट्रेनिंग कर लेती है। आदिवासी कोटे से अध्यापिका की नौकरी के लिए बिहार के बेगूसराय ज़िले जाती है। यहां स्कूल का कल्याण अधिकारी बेला का यौन शोषण करने पर उतारू है। क्योंकि बेला की नौकरी पक्की करने वाली फ़ाइल उसके टेबल से गुज़रकर जानी है।

बेला को बताया जाता है कि कल्याण अधिकारी के शोषण से तंग आकर एक आदिवासी लड़की पहले भी आत्महत्या कर चुकी है। पर बेला ख़ुद को ख़त्म करने की बजाय अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ाई का चुनाव करती है। वो उच्च अधिकारी से कल्याण अधिकारी की शिकायत करती है। पर बेला सा साहस सबके पास नहीं।

हालांकि कल्याण अधिकारी से सब परेशान थे। फिर भी उसके रुतबे और गुंडा टोली के डर से किसी ने उसके ख़िलाफ़ गवाही नहीं दी। नतीजतन बेला झूठी करार दी जाती है। और कल्याण अधिकारी के जाल में छटपटाने को अकेली छोड़ दी जाती है।

ग़रीब आदिवासी मां-बाप की बेटी बेला के पिता ने उधार लेकर 500 रूपये जुटाए थे। बेला को नौकरी की जगह पहुंचने और तनख़ाह मिलने तक खर्च के लिए। नौकरी कर मां-बाप को बेहतर ज़िन्दगी देने की तमन्ना रखने वाली बेला ग़रीबी में गुज़ारा कर लेगी। पर अपने जिस्म का सौदा नहीं करेगी।आख़िरकार नौकरी से इस्तीफ़ा देकर बेला अपने जंगल-गांव-घर लौट जाती है।

20 फरवरी 2019  को देश की सर्वोच्च अदालत ने फ़रमान सुनाया है कि देश भर में बेला एक्का और उसके जैसे लाखों परिवारों (क़रीब एक करोड़ आदिवासियों) को उनके जल-जंगल-ज़मीन, गांव-खेत से बेदख़ल कर दिया जाए।

कोई बेला एक्का, कभी किसी कल्याण अधिकारी की यौन कुंठा का शिकार होने से बचने के लिए अपने घर-माटी की सुरक्षा न पा सके। क्या यही इरादा है वातानुकूलित कमरों में ऊंचे, मख़मली, सिंहासनों पर बैठे जज-जजनी साहेबान आपका?

क्या आपको पता है साहेबान! जिन्हें आप जंगलों से, उनके घरों से जंगल बचाने के नाम पर भगा रहे हैं। उन्हीं की वजह से जंगल अब तक बचे हुए हैं। ये जंगल-पेड़ उनके परिवार का हिस्सा होते हैं। कोई काटने आए तो ये पेड़ों से अपनी औलाद की तरह चिपक जाते हैं।

क्या आपको पता है? जिस क़ीमती लकड़ी की शानदार कुर्सी पर आप सब हुज़ूर-ए-वाली तशरीफ़ फरमा हैं इन्हें जंगल से चुराकर, या ज़ोर-ज़बरदस्ती से कौन यहां तक लाता है? मुनाफ़े और सिर्फ़ मुनाफ़े के लालच में। जंगल के दावेदार कहते हैं कि जो जंगल बचाने की गुहार लेकर आपके पास आए हैं वो और उनके पालनहार आका।

क्या आप जानते हैं? तेन्दु पत्ता, महुआ, साल बीज, इमली, आमला, चिरोंजी, चिरैता, वन तुलसी, आदि पेड़-पौधे हैं। प्रकृति के पूरक हैं। जिन्हें आप जंगल के गुनहगार करार दे रहे हैं उनकी जिंदगी के हिस्से हैं। और सरकार को होने वाली कमाई में भागीदार भी हैं।

अगर आपको ये नहीं पता कि आपके रुतबे, गाड़ी-बंगले, नौकरों-अर्दलियों के लिए खर्च होने वाले धन में इनकी ख़ून-पसीने की कमाई भी शामिल है। तो फिर आप, आपका ज्ञान किस काम के? आप न सिर्फ़ इन्हें बेघर-बेरोजगार कर रहे हैं बल्कि इनके पाले-पोसे जंगलों को भी अनाथ कर रहे हैं।

ये जंगल के दावेदार हैं तो ये क़ायनात सुरक्षित है। वरना आपकी गलीच शहरी बस्तियों में रखा क्या है? ज़रा नज़र उठाकर देखिएगा, आपकी महफ़िलों में जाम टकराती कितनी ही सफ़ेद पोशाकों पर मासूम आदिवासी बच्चियों के कौमार्य भंग के सुर्ख़ दाग़ चस्पा हैं।

नहीं भूलती मुझे सालों पहले झारखण्ड के अख़बार में पढ़ी वो बेशर्म-खौफ़नाक हक़ीक़त। एक नाबालिक आदिवासी लड़की संदूक के साथ जब अपने घर लौटती है। और छोटे भाई-बहन उत्सुकतावश जब बड़ी बहन का सन्दूक खोलते हैं तो चंद फटे-पुराने चीथड़ों के बीच पाते हैं उसकी कोख़ से निकला मालिक की हवस का सबूत। एक मरा हुआ बालक!

तो बताएं साहेबान! ये संदूक अब किस पते पर पहुंचा करेंगे?

क्या इन पर आदिवासियों को भगाकर जंगल हड़पने में प्रथम स्थान पाने को आतुर मुकेश अंबानी के कुख्यात महल एंटीलिया का पता चस्पा किया जाएगा? या प्रधानमंत्री निवास? याकि फिर मुख्यमंत्री निवासों में इंतज़ाम होगा?

बेला एक्का अगर इस सन्दूक षड्यंत्र को अपनी बलि देने से इंकार करें तो अब कहां लौटेंगी?

क्या अम्बानी-अडानी, टाटा-बिड़ला, मित्तल-जिंदल, वेदांता आदि-आदि कुछ ठौर-ठिकाने  मुहैया करवाएंगे? आख़िर कहां? कहां होंगे इनके दरिद्र ठिकाने?

क्या आपके पास पहुंचने वाले इन तथाकथित जंगल बचाओ “रसूख़दार” ठेकेदारों ने इंसानों को बचाने के लिए अपने महलों-कोठियों के पते लिखवाए हैं?

अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है जनाब तो जल्दी आदेश दें। वरना दिकू (बाहर वाले, शोषणकर्ता) दलालों को जंगल के दावेदार इण्डिजिनस ललकारा चुके हैं।

कहानी ‘बेला एक्का  लौट रही हैं’ में अरुण प्रकाश ने लि‍खा है – “छोटे लोगों के सपने बड़े लोगों के जूते की नोक पर टि‍के रहते हैं। जरा मस्ती में पैर ही झटक दि‍या, सपनों का शि‍राजा बि‍खर जाता है।”?

लाखों के लिबास और ठोकरमार जूतों में सजे प्रधानमंत्री मोदी सुना है दक्षिण कोरिया में महात्मा गांधी की प्रतिमा का उद्घाटन करते हुए कह रहे थे –“गांधीजी ने इतना सादा जीवन जिया कि पर्यावरण को बिल्कुल प्रदूषित नहीं किया।”

आप जो इंसाफ़ के नाम पर ज़ुल्म करने पर आमादा हैं साहब,अब ये अदा बेमानी है!

“याद रहे -ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है।”

एक कश्मीरी बच्ची की नसीहत है।

जंगल के दावेदार, भारत के पहले आदिविद्रोही  तिलका मांझी उर्फ़ जबरा पहाड़िया, संथाल हूल (विद्रोह) के सिधु-कान्हू, चांद-भैरो भाइयों, फूलो-झानो जुड़वा बहनों और बिरसा मुंडा के वंशज अब ज़ुल्म नहीं सहने वाले।

   (वीना फिल्मकार, व्यंग्यकार और पत्रकार हैं।)











Leave your comment











dr.amit satanker :: - 02-24-2019
Govt.has been called dalit and tribe anti govt.when they fought for their existence when dalit struggle for there right they call Ambedkarite and when tribe struggle for right called as Naxalites and maosist I think govt work for capitalist jal jangal jamin has been taken from rhem

Ankit dhruv :: - 02-23-2019
Inhe birsa ka vidroh dikhana hai