सरकारी खरीद के अभाव में 30 किमी पैदल चलकर उपजें बेचने के लिए मजबूर हैं बस्तर के आदिवासी

विशेष , बस्तर,रायपुर, सोमवार , 23-04-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर (बस्तर)। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में प्रकृति ने आदिवासियों को इतना प्राकृतिक संपदा दिया है जिसका उचित मूल्य ही अगर सरकार दे दे तो आदिवासियों का आर्थिक आधार मजबूत हो जाएगा। खास बात ये है कि इसमें न तो लागत है और न ही प्रकृति के साथ कोई खिलवाड़ । कड़ी मेहनत कर जंगल से वनोपजों के संग्रहण के जरिये अपना जीवन चलाने वाले आदिवासियों के पास आवागमन का साधन नहीं होने के चलते सेठ-व्यापारी उसे औने-पौने दाम में लूट रहे हैं। आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ प्रदेश में आदिवासियों का आर्थिक आधार जंगल में मिलने वाले वनोपज पर निर्भर है।

लेकिन मौजूदा सरकार उनके वनोपज का सही दाम तक नहीं देती है। आदिवासियों की प्राकृतिक संपदा जो जंगलों में है अगर सरकार उनके उचित मूल्य ही उन्हें दे दे तो आदिवासियों का आर्थिक आधार मजबूत हो जाएगा। स्थिति आज ऐसी है कि आदिवासियों को अपने वनोपज के बदले चावल, नमक, साबुन लेना पड़ता है । सरकारी वन समितियां तो बनी हैं लेकिन समितियां एक या दो किलो के हिसाब से वनोपज नहीं ख़िरीदती हैं अपने दैनिक जीवन की जरूरतों के लिए आदिवासी वनोउपज को बिचौलिए बड़े व्यपारियों के हाथों में बेच देते हैं। और उनके बदले दैनिक समान ले लेते हैं। 

वनोपज नीति का अभाव

देश में वन सम्पदा आदिवासी क्षेत्रों में ही सीमित रह गई है। इन वनों में ही वन्य जीव व वन शेष हैं जबकि सरकार नए वन क्षेत्र विकसित करने हेतु कैम्पा नामक योजना भी संचालित करती है। इस कैम्पा फण्ड के दुरुपयोग करने की बात भी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सामने आई। जिसमें कहा गया है कि कई राज्य सरकारें इस मद के तहत होने वाले नए वनों के विस्तार के कार्यक्रम पर ध्यान नहीं दे रही हैं। और उसे अन्य कार्यों में लगा रहे हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराज़गी जाहिर किया है। वनोपज और आदिवासी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। परंतु खेद का विषय है कि आदिवासियों को वनोपज का वास्तविक मूल्य बाजार प्रसंस्करण उपलब्ध नहीं हो रहा है उसका लाभ बिचौलिए उठा रहे हैं। 

वनोउपज के बदले अनाज लेता एक आदिवासी।

वनोपज के लाभ के लिए पंचायती राज अधिनियम का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम 1996 (पेसा) कानून के तहत प्रयास किया गया। लेकिन राज्य सरकारें ईमानदारी से अमल नहीं कर रही हैं जिसके कारण वनोपज औने-पौने दाम पर बिचौलिए खरीद कर आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। पेसा कानून में वनोपज का मूल्य निर्धारण करने का प्रावधान है। लेकिन जमीन पर ऐसा कहीं कुछ नहीं हो रहा है। क्योंकि राज्य सरकारें जिला वनोपज सहकारी समितियों का गठन कर उनमें राजनीतिक दलों के समर्थकों को पदाधिकारियों के तौर पर बैठा दी हैं।

जिन्हें पेसा कानून की जानकारी ही नहीं होती है। उसका नतीजा ये होता है कि संचालन सिफर रह जाता है। जबकि होना यह चाहिए कि जिला यूनियन समिति को उस जिले की सभी ग्रामसभाओं से राय मशविरा कर उनका संग्रहण, प्रसंस्करण, मूल्य निर्धारण करना चाहिए ताकि आदिवासियों को गाँव में ही रोजगार की व्यवस्था के साथ मूल्य का लाभ मिल सके जो कि हो नहीं रहा है। 

अनुसूचित क्षेत्रों में वनोपज तथा परंपरागत कृषि उत्पाद से सम्बंधित प्रसंस्करण उद्योगों की अपार संभावनाएं

पेसा कानून की मुख्य अवधारणा मावा नाटे मावा राज है यह फलीभूत नहीं हो रहा है। कारण पेसा कानून के प्रावधानों का अमल प्रशासन द्वारा नहीं किया जाना है। अनुसूचित क्षेत्रों में वनोपज तथा परंपरागत कृषि उत्पाद से सम्बंधित प्रसंस्करण उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं जबकि इन क्षेत्रों की सम्भावनाओं पर अब तक ईमानदारी से अध्ययन व कार्ययोजना तैयार नहीं हुई। अभी तक सिर्फ जिला यूनियनों के द्वारा तेंदूपत्ता की खरीद की जाती है लेकिन अन्य बहुतायत वनोपज कोसा, चार, हर्रा, बेहड़ा, महुआ, टोरा, साल बीज, साल गोंद, इमारती लकड़ी, वनोषधि व अन्य उत्पादों के साथ ही परंपरागत कृषि उत्पाद रागी, मड़िया, कोदो, कुटकी, झिरा, धान की देशी नस्ल जो कि कई बीमारियों में हाई प्रोटीनेटेड व अन्य गुणात्मक धान्य हैं के बारे में कोई अध्ययन व कार्ययोजना नहीं है। इनका परंपरागत उपयोग आदिवासी हजारों साल से आज भी करते आ रहे हैं।

वनोपज का आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान है जैसे कि बस्तर संभाग से ही एक साल में कोसा का 30 से 40 करोड़ का व्यापार बिचौलियों द्वारा किया जाता है जबकि कोसा उत्पाद के लिए प्रशासन द्वारा लघु प्रशिक्षण प्रदान कर प्रत्येक गांव में आदिवासियों को देकर कोसा कीड़ों का वितरण करने की व्यवस्था की जाए तो यह 40 करोड़ का व्यवसाय 400 करोड़ तक होने की संभावना है।

महिला बच्चे के साथ अनाज ले जाते हुए।

वह भी बगैर ज्यादा लागत के तथा पर्यावरण को क्षति पहुंचाए। इस तरह के बहुत सारे वनोपज में अपार संभावनाएं हैं। पर्यावरण को बगैर क्षति पहुंचाए दुनिया में ऐसे कम ही व्यवसाय हैं। ऊपर से इसमें लागत का कम होना सोने में सुहागे सरीखा है। जबकि सरकार इन क्षेत्रों में पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले उद्योग की स्थापना पर जोर दे रही है। ऐसे उद्योगों के लिए अनुसूचित क्षेत्र में जमीन उपलब्ध नहीं है तथा प्रशिक्षित उम्मीदवारों की कमी है। ऐसे में आदिवासियों को ऐसे उद्योगों से लाभ कम ही होता है जिसके कारण सरकार के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। राज्य सरकारों को अनुसूचित क्षेत्र की वास्तविक विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए वहां के निवासियों के अनुरूप ही उद्योगों का विकास करना चाहिए।

सड़कें नहीं इसी लिए यातायात के साधन नहीं  

आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में ज्यादातर आवगमन के साधन नहीं होते हैं , क्योंकि इन क्षेत्रों में सरकार अब तक सड़कें नहीं पहुंचा पाई है और सड़कें हैं भी तो परिवहन के साधन नहीं है। आदिवासी ग्रामीण वनोपज बेचने के लिए पैदल सफर करते हैं । छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के पंडरिया ब्लाक की बात करें तो सराहापथरा, तेलियापानी, लेदरा पंचायत के आदिवासी ग्रामीण कुइकुकदूर 30 किमी पैदल सफर कर वनोपज बेचने आते हैं। कांदावानी, बिरहुलडीही पंचायत के अन्तर्गत 18 गांव आते हैं जो 20 किमी सफर कर नेऊर वनोपज बेचने आते हैं ।

जहां व्यापारी वनोपज महुवा के बदले चावल या कनकी देते हैं जैसे एक किलो महुवा का एक किलो चवाल। वही देखा जाए तो सरकार महुवा पर 22 रुपए प्रति किलो समर्थन मूल्य निर्धारित की है। और दूसरी ओर चावल 2 रुपए किलो में मिलता है । मतलब ग्रामीण 44 किलो चावल खरीद सकता है। यही नहीं शासन की महत्वपूर्ण योजना सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले चावल लेने के लिए भी आदिवासी अपना बहुमूल्य वनोपज लैम्प्स प्रबंधकों को देकर चावल लेने को मजबूर है।

 

वनोपज को बेचने के लिए जाती महिलाएं।

तेलियापानी गांव की आदिवासी महिला दशमी बाई कहती हैं कि सरकार द्वारा बनायी गयी वन समिति में वो अपने जंगल से इकट्ठा किया हुआ वनोपज नहीं बेचती हैं क्योंकि सरकार खरीदने के बाद तत्काल पैसा नहीं देती है, सरकार चेक के माध्यम से पैसा देती है जिसके लिए मिलों दूर सफर कर बैंक के चक्कर काटना पड़ता है और उन्हें दैनिक जरूरतों के लिए तत्काल पैसों की जरूरत होती है आगे वह कहती हैं दैनिक जीवन-यापन के लिए वह व्यपारियों को वनोपज बेच देती हैं या वनोपज के बदले दैनिक उपयोगी समान अदला-बदली करा लेती हैं।

सरकार ने दो तरह के वनोपज संग्रहण अथवा खरीदने पर मूल्य निर्धारित किया है पहला राष्ट्रीकृत जिसे सिर्फ सरकार ही खरीद सकती है जिसके अन्तर्गत कुल्लुगोंद अथवा तेंदूपत्ता आता है वहीं गैरराष्ट्रीकृत जिसे सरकार अथवा व्यापारी दोनों खरीद सकते हैं जो लघु वनोपज के तहत आते हैं जिसमें चार, टोरा, इमली, साल बीज, लाख इत्यादि आते हैं। आदिवासी जिनका संग्रहण करते हैं । जो उनकी प्राकृतिक संपदा है जिसके वो मालिक हैं। 

उत्तर बस्तर कांकेर के आदिवासी ग्रामीण नोहर मांडवी कहते हैं कि मेरे पास पुश्तैनी चार महुवा पेड़, तीन इमली पेड़ हैं इसके अलावा और भी प्राकृतिक वन श्रोत हैं अगर इनके उचित दाम सरकार देती है तो उनका परिवार का आर्थिक आधार मजबूत हो जाएगा लेकिन अभी वाह बिचौलिए व्यापारियों को कम दाम में उसे बेचना पड़ता है। 

(तामेश्वर सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्टों के लिए जाने जाते हैं।)

 




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लेकिन मौजूदा सरकार उनके वनोपज का सही दाम तक नहीं देती है। आदिवासियों की प्राकृतिक संपदा जो जंगलों में है अगर सरकार उनके उचित मूल्य ही उन्हें दे दे तो आदिवासियों का आर्थिक आधार मजबूत हो जाएगा। स्थिति आज ऐसी है कि आदिवासियों को अपने वनोपज के बदले चावल, नमक, साबुन लेना पड़ता है । सरकारी वन समितियां तो बनी हैं लेकिन समितियां एक या दो किलो के हिसाब से वनोपज नहीं ख़िरीदती हैं अपने दैनिक जीवन की जरूरतों के लिए आदिवासी वनोउपज को बिचौलिए बड़े व्यपारियों के हाथों में बेच देते हैं। और उनके बदले दैनिक समान ले लेते हैं।

????? ???? ????? :: - 04-23-2018
मैं भी एक किसान हूँ, और मुझे लगता है कि सरकार को किसानों की उपज या वनोपज को उनके लोकेशन से ही कलेक्ट करना चाहिए।