धरती बचाने का संघर्ष कर रहे हैं आदिवासी

सम-सामयिक , रायपुर , रविवार , 06-08-2017


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राजू पाण्डेय

रायपुर। विगत 100 वर्षों में विकास की सबसे ज्यादा कीमत किसी ने चुकाई है तो वे आदिवासी हैं। किसी को उसके घर से विस्थापित कर दिया जाए, उसकी आजीविका के साधन छीन लिए जाएं और उसकी पहचान बदल कर इस धर्म या उस धर्म की बना दी जाए तो उससे दुर्भाग्यशाली भला और कौन होगा? आदिवासी ऐसे ही दुर्भाग्यशाली हैं। उनका सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह रहा कि जिस वनभूमि पर उनका आवास है वह अपने गर्भ में कोयला, लोहा, बॉक्साइट, हीरा, यूरेनियम आदि बहुमूल्य खनिजों को धारण किए हुए है और बिना इन वनों के विनाश के इस सम्पदा का उपयोग करने वाले स्टील,पावर और रत्न आदि उद्योगों की स्थापना संभव नहीं है। आदिवासियों का शत्रु उनकी सरलता,निष्कपटता और भोलापन है।  आधुनिक सभ्य समाज के व्यवहार को अंगीकार करने में उन्हें शायद सदियां लग जाएंगी। कभी उनकी वनोपजों और वन से संग्रहित उत्पादों को नमक के मोल पर खरीदा जाता था और कभी समाप्त न होने वाले ऋणों के बदले में उनसे बंधुआ मजदूरी कराई जाती थी तथा उनकी स्त्रियों का शोषण किया जाता था। कभी धोखे से उनकी जमीन हड़प कर ली जाती थी। आज भी बतौर वोटबैंक उनकी उपयोगिता की स्वीकृति के बावजूद आदिवासियों की दशा में आने वाला परिवर्तन सकारात्मक नहीं है।

आदिवासियों का स्वाधीनता संग्राम में योगदान

आदिवासी भोले जरूर हैं-उन्हें छला जा सकता है किंतु वे कायर नहीं हैं, उन्हें दबाया नहीं जा सकता। भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक अचर्चित पाठ आदिवासियों के प्रखर संघर्ष का पाठ है। संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में चले दामिन विद्रोह के 13 वर्ष (1771- 1784) लोमहर्षक और लोकप्रिय वीरगाथाओं के स्रोत रहे हैं। बुधु भगत के लरका आंदोलन (1828-1832) का विवरण हैरान कर देने वाला है। सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू का विद्रोह (1855) झारखंड के साहसी और क्रांतिकारी आदिवासी सेनानियों के संघर्ष की उस परंपरा की एक कड़ी है जिसका शिखर बिरसा मुंडा और उनके उलगुलान (1894-1900) में देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में वीर नारायण सिंह की शहादत(1857) और मध्य प्रदेश के निमाड़ के सघन वनों में रहने वाले टांटया भील का बलिदान(1889) आदिवासियों के स्वाधीनता के प्रति उस दुर्दमनीय आकर्षण को दर्शाते हैं जो हमेशा कायम रहेगा। स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं जो एक नए विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं। इन सारे आदिवासी स्वाधीनता आंदोलनों के नायकों की एक ही नियति रही -अल्पायु में आत्म बलिदान।   आदिवासी समुदाय में इनका पराक्रम दंतकथा बन गया और लोक गीतों एवं लोक साहित्य में ये आज भी जीवित हैं। इन आंदोलनों के पीछे निहित कारण, शोषण और दमन के अलावा आदिवासियों की उन्मुक्त एवं स्वतंत्र जीवन शैली में हस्तक्षेप को भी माना जा सकता है। आदिवासियों के प्रति नजरिया बदलने की आवश्यकता तब भी थी और अब भी है।

आदिवासियों के हितों की रक्षा के प्रावधान

आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों में पांचवीं और छठी अनुसूची सर्वप्रमुख रही हैं। पांचवी अनुसूची में देश के दस राज्यों के वे क्षेत्र सम्मिलित हैं जहां आदिवासियों की जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। इन क्षेत्रों में आदिवासी जीवन शैली और जीवन दर्शन की रक्षा करते हुए आदिवासियों की रूढ़ियों,परम्पराओं और मान्यताओं के अनुरूप शासन चलाने एवं विकास योजनाओं का निर्माण तथा संचालन करने का प्रावधान है। छठी अनुसूची में उत्तर पूर्व के वे राज्य रखे गए हैं जहां आदिवासियों की जनसंख्या 80 प्रतिशत तक है। इन क्षेत्रों में आदिवासियों की पारंपरिक कानून व्यवस्था लागू है और भूमि का क्रय विक्रय प्रतिबंधित है। पांचवी और छठी अनुसूचियां राज्यपालों को विशेष शक्तियां और अधिकार देती हैं। किन्तु इन प्रावधानों का कितना पालन हो रहा है यह जगविदित है। पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया कानून अर्थात पेसा 1996 में पारित किया गया जो आदिवासियों की भूमि के अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की अनुमति को आवश्यक बनाता है। दिसंबर 2006 में संसद द्वारा पारित एवं सरकार द्वारा 1 जनवरी 2008 से अधिसूचित वन अधिकार कानून, 13 दिसंबर 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को वनों में निवास करने और इनसे आजीविका अर्जित करने का अधिकार देता है। लगभग 120 वर्ष पुराने ब्रिटिशकालीन भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेने वाला 2013 का नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम जमीन के उचित मुआवजे,पुर्नवास और पुर्नस्थापन का दावा करता है। बिना किसानों की सहमति के निजी उद्योगपतियों द्वारा उनकी भूमि के अधिग्रहण पर रोक लगाता है एवं सामाजिक प्रभाव के आकलन को अनिवार्य बनाता है। इन कानूनी प्रावधानों के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के उपरांत लगभग 5 करोड़ एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है या उसके उपयोग में परिवर्तन किया जा चुका है जो कि कुल भूमि का 6 प्रतिशत है।सर्वाधिक दुर्भाग्य का विषय यह है कि इस अधिग्रहण से प्रभावित करीबन 5 करोड़ लोगों में अधिकांश आदिवासी हैं। 

आदिवासी क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियान

आदिवासी क्षेत्रों में विकास बजट का हुआ दुरुपयोग

स्वाधीनता के बाद आदिवासी विकास के नाम पर जितनी राशि सरकारों द्वारा खर्च की गई है उसका योग कर यदि आदिवासियों के मध्य बांटा जाए तो आज प्रत्येक आदिवासी विपुल संपत्ति का मालिक बन जाए। लेकिन आदिवासियों की स्थिति विकास के हर पैरामीटर शिक्षा,स्वास्थ्य,आयु,आय, रोजगार,शिशु मृत्यु दर,मातृ सुरक्षा में वे राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। व्यापक भ्रष्टाचार ने आदिवासी विकास के लिए जारी की गई विपुल धनराशि की जमकर बंदरबांट को सुनिश्चित किया। विकास के अभाव में उग्रवाद और नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमाई हैं। हाल के वर्षों में पलायन आदिवासियों की सर्वप्रमुख समस्या रहा है। कृषि ही जब मुनाफे का धंधा न रही हो तब परंपरागत कृषि के लाभप्रद होने की आशा ही व्यर्थ है और इसी पारंपरिक कृषि और वनोपजों के संग्रहण पर आदिवासियों की अर्थव्यवस्था आधारित रही है। आदिवासी अर्थव्यवस्था सूदखोरों और वन माफियाओं के द्वारा आक्रांत रही है। तमाम कागजी कानूनों और जमीनी जन प्रतिरोधों के बावजूद पिछले डेढ़ दशक में कोयला और खनिज उत्खनन की मात्रा तथा इन पर आधारित पावर एवं स्टील उद्योगों की संख्या बढ़ी है। आदिवासियों को अपर्याप्त अथवा समुचित मुआवजा देकर उनकी जमीन से बेदखल किया गया है। मालिक से नौकर बने आदिवासियों को या तो अपनी जमीन पर बने कारखानों में अकुशल श्रमिक बनना पड़ता है या रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है।

आदिवासी महिलाओं का सांस्कृतिक कार्यक्रम

आदिवासी संस्कृति की रक्षा ही अंतिम समाधान 

आदिवासियों की अधिकांश समस्याओं का समाधान ऐसी उपयुक्त शिक्षा है जो मातृ भाषा में दी जाए और जिसका पाठ्य क्रम कृषि,वानिकी,वनौषधि, लोकगीत, संगीत, नृत्य, खेल, युद्ध कौशल आदि को स्वयं में समाविष्ट करता हो किन्तु प्रचलित शिक्षा का माध्यम और पाठ्यक्रम दोनों आदिवासियों की सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा पर आधारित हैं। इससे एक तो आदिवासी शिक्षा से जुड़ नहीं पाते और यदि वे इसमें दीक्षित हो कोई उच्च शासकीय पद प्राप्त भी कर लेते हैं तो उनके मन में अपनी सभ्यता,संस्कृति और अतीत के प्रति प्रायः तिरस्कार की भावना पैदा हो जाती है। वे अपनी जड़ों से कट जाते हैं और उनके ज्ञान तथा अनुभव का लाभ उनके पैतृक आवास में रहकर पारंपरिक धंधों में लगे अन्य बंधुओं को नहीं मिल पाता। आदिवासियों में शिक्षा के प्रसार के क्षेत्र में पहले ईसाई मिशनरियों और अब इनकी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदूवादी संगठनों ने भी उल्लेखनीय कार्य किया है किंतु इनका मूल उद्देश्य धर्म प्रचार ही रहा है।

नेहरू का आदिवासी पंचशील का सिद्धांत

पंडित नेहरू ने आदिवासी समाज की रक्षा के लिए  एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया था, जिसे आदिवासी पंचशील के नाम से जाना जाता है। इसमें उन्होंने आदिवासियों को उनकी प्रतिभा और विशेषता के आधार पर विकास के मार्ग पर आगे बढने को कहा था। इसके साथ ही उनकी उनकी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने, जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार के साथ ही उन्हें  वर्तमान सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से प्रतिस्पर्धा करने से बचने को कहा था। विश्व आदिवासी दिवस पर लोकतंत्र के आदिम उपासक, आनंद और उल्लास की प्राप्ति को सर्वोपरि स्थान देने वाले, संग्रह और लोभ जैसे दुर्गुणों से मुक्त, प्रकृति के इन रक्षकों की विजय की कामना करना हम सब का धर्म हैं। क्योंकि ये पूरी दुनिया को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

(राजू पाण्डेय स्वतंत्र रूप से लेखन का काम करते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)

 










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