मज़ाक़ बनना एक विश्वविद्यालय का!

कहां आ गए हम... , , बृहस्पतिवार , 07-06-2018


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मृत्युंजय

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जब 1997 में दाख़िल हुआ, तब भी इस तथाकथित 'पूरब के ऑक्सफ़ोर्ड' के धूमिल गौरव के खंडहर ही देखे। अब तो उन खंडहरों में लम्बे कुश उग आए हैं जो सामान्य ग़रीब घरों के जूताविहीन पाँवों को चीथ देते हैं।

वाक़या हिंदी विभाग का है जिसने एक वक़्त पाठालोचन का ऐसा श्रमसाध्य काम किया कि हमारे सामने आज मध्य और आदिकाल का साहित्य प्रामाणिक रूप में मौजूद हुआ। मैं जब बीए करने विभाग में दाख़िल हुआ, ठीक उसके पहले शिक्षकों की एक खेप नयी-नयी विभाग में आयी थी। विभाग में तब भी छात्र-शिक्षक अनुपात (जिसकी अब कोई चर्चा भी नहीं करता।) राम भरोसे ही था।

उसके कुछेक वर्षों बाद (संभवत: 2000 में) हमारे एक मित्र शोध कर थे और मैं एमए में पहुँचा था, हिंदी विभाग में अध्यापक की वैकेन्सी आयी। उसे मित्र ने भरा। मित्र उसके बाद एक डिग्री कॉलेज में प्राध्यापक हुए। वैकेन्सी न भरी गयी। वही विज्ञापन फिर भेष बदल कर आया। मित्र ने फिर भरा। मेरा भी जेआरएफ हो गया था, मैंने भी भरा। मित्र अब तक एक विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हो गए थे। वैकेन्सी तब भी नहीं भरी गयी। उसी विज्ञापन ने अबकी बार फिर अलग रूप धरा और प्रकट हुआ। तब तक मैंने अपनी पीएचडी पूरी कर ली थी। अबकी बार मित्र ने आवेदन न किया, सिर्फ़ मैंने किया। फिर मित्र प्रोफ़ेसर हो गए। वैकेन्सी का तब भी कुछ न हुआ। वही वैकेन्सी फिर अवतरित हुई। मैंने फिर भरा। कुछ दिन बाद फिर वही वैकेन्सी आयी, मैं नियमपूर्वक शपथपूर्वक फ़ॉर्म भरता रहा।

इस पूरे दौर में मेरे महबूब इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने मुझसे कम से कम पांच से सात हज़ार रूपए तो वसूले ही होंगे। जितनी फ़ीस से मैं अपने BA, MA और PhD की पढ़ाई कर चुका था, उससे ज़्यादा इस फ़ॉर्म प्रकरण में होम कर चुका था। और उर्दू शायरी के महबूब की ही तरह ज़ालिम मेरे महबूब विश्वविद्यालय ने नज़र उठाकर देखा तक नहीं, कोई ख़त नहीं, कोई हाल-ख़बर भी न ली।

पिछला विज्ञापन आने पर फिर एकाग्र आशिक़ की तरह फ़ॉर्म भरा। अबकी बार साक्षात्कार के लिए चुने गए अभ्यर्थियों की सूची से मैं बाहर कर दिया गया था। आगामी हफ़्ते में साक्षात्कार है। कारण क्या हुआ, क्या गुनाह हुआ, यह भी कोई बताने को तैयार नहीं। दूसरे विश्वविद्यालय वा आयोग कम से कम मेरिट को पारदर्शी रखते हैं, किसी गड़बड़ को सुधारने का मौक़ा देते हैं, पर वह महबूब ही क्या जो दिल को ख़ून से भर न दे!

एपीआई नाम का जिन्न बोतल से निकल आया, जो विश्वविद्यालय के सत्ता केंद्रों के घर पानी भरने जाया करता है। वे जिसको चाहें योग्य बनावें, जिसको चाहे अयोग्य। एक लॉकर भी पैदा हुआ जिसे वही खोल सकता है जिसको वह जिन्न अनुमति दे।

यों सोचता हूँ, आख़िर क्यों फिर इस विश्वविद्यालय से इतना मोह है? और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा। पर दिल है कि अभी भी हिंदी विभाग के बाहर चबूतरे पर जा टिकता है। दिल को समझाता हूं, कोई नहीं, कोई नहीं। नौकरी करने नहीं जा सकूँगा, पर किसी ने वहाँ जाने पर तो प्रतिबंध नहीं लगाया है न! बेकारी के डंक से बिंध कर महबूब को याद करना कमजरफ़ियत है। उसे यों ही याद करूँ जैसी मेरी यादों में वह है।

(लेखक मृत्युजंय युवा कवि हैं और अपनी देशज और अलग तरह की कविताओं के लिए जाने जाते हैं।)




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