अगर गांधी और अंबेडकर न होते तो क्या होता?

जयंती पर विशेष , , शनिवार , 14-04-2018


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मुकेश कुमार

 

(गांधी और अंबेडकर भारतीय इतिहास के दो ऐसे महानायक हैं, जिन्हें उस समय की परिस्थिति ने एक दूसरे के खिलाफ खड़ा किया। किन्तु दोनों ने भारत के नवनिर्माण में ऐतिहासिक भूमिका अदा की है। दोनों अपने मिशन के साथ चार दशक तक भारत की राजनीति के केंद्र में बने रहे। भारत के शोषित-वंचित तबके को समाज के केंद्र में लाने के लिए दोनों अपने-अपने तरीके से प्रयत्नशील रहे। आज देश नये किस्म के संकट के दौर से गुजर रहा है, ऐसे समय में इन दोनों महापुरुषों के योगदान को नये सिरे से समझने की जरूरत है। इसी परिप्रेक्ष्य में बाबा साहब के पौत्र प्रकाश अंबेडकर ने महात्मा गांधी के शहादत दिवस (30 जनवरी, 2018) के मौके पर गांधीजी द्वारा स्थापित ऐतिहासिक सेवाग्राम आश्रम में बतौर मुख्य वक्ता यह वक्तब्य दिया है। उन्होंने अपना यह वक्तब्य मराठी में दिया था, जिसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है- संपादक)

मैं जिस बात को कहने जा रहा हूँ शायद वह कुछ लोगों को अच्छी लगे और बहुत सारे लोगों को मेरी बातें बुरी भी लग सकती हैं। क्‍योंकि इतिहास हर चीज का गवाह होता है और इतिहास इस बात का भी गवाह है- बाबा साहब हों, महात्‍मा गांधी हों दोनों का अपना-अपना मिशन था। उस मिशन को पूरा करने हेतु दोनों अपने-अपने तरीके से चलते हैं। और उन तरीकों में फर्क भी जान पड़ता है, जिसे मैं कहूंगा कि उस वक्त कुछ ऐसी परिस्थितियाँ थीं– जिसमें दोनों आमने-सामने खड़े थे। आज 60-70 साल बाद जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं और यह सोचते हैं कि दोनों एक साथ होते तो क्‍या हुआ होता! जो भूमिका उन दोनों ने उस समय ली, अगर वह नहीं ली होती तब क्या परिस्थिति होती! दोनों की भूमिका को समझने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है। मेरी मान्यता है कि दोनों की भूमिका उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप और ऐतिहासिक थी। इस बात को उस समय के लोगों ने अपने ऊपर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में व्यक्त किया है। लेकिन असल बात यह है कि उस वक्त अगर इन दोनों ने वह भूमिका नहीं ली होती तो क्‍या हुआ होता?

फिलहाल की परिस्थिति को देखें तो हम लोगों का जो झगड़ा है, वह पुराना है। इसे मैं नया झगड़ा नहीं मानता। उस समय भी हिन्दू महासभा थी, आरएसएस बन चुका था। साधु-संतों के संगठन भी मौजूद थे। उस समय इन संगठनों की जो विचारधारा थी, वह आज भी वैसी ही है। उसमें कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। उन संगठनों के जो ठेकेदार हैं, मैं जानबूझकर ठेकेदार शब्‍द का इस्‍तेमाल कर रहा हूँ। क्‍योंकि ठेकेदार की ही यह मंशा होती है कि पूरी व्‍यवस्‍था उसके नियंत्रण में रहे। वह ठेकेदार ही होता है, जो पूरी व्‍यवस्‍था को अपने कब्‍जे में लेना चाहता है। उस समय की व्‍यवस्‍था एक तरह से इन्हीं ठेकेदारों के कब्‍जे में थी। उस व्‍यवस्‍था को उन ठेकेदारों के कब्‍जे से निकालकर आम आदमी की व्यवस्था बनाने की कोशिश गांधी-अंबेडकर कर रहे थे। एक तरह से देखें तो बाबा साहब का रास्ता थोड़ा आसान नजर आता है। वह आसान इसलिए था क्‍योंकि उस वक्त अस्‍पृश्‍यों -अछूतों, जो गाँव के बाहर रहने वाले लोग थे, उन पर उस तरह से इन ठेकेदारों का कब्‍जा नहीं था, जिस प्रकार का कब्‍जा गांव के अंदर के लोगों पर था। प्रत्‍यक्ष तौर पर भी हम देखें तो उसे एक नाम दिया जा सकता था, एक पहचान दी जा सकती थी और उनका एक आंदोलन भी खड़ा किया जा सकता था।

लेकिन आज भी एक ऐसा वर्ग है, जिसको हम शक्ल नहीं दे पा रहे हैं,  आज हम उनको ओबीसी वर्ग कहते हैं। यह भी एक वर्ग है, जो था तो उस व्‍यवस्‍था के बाहर, किन्तु गाँव के अंदर और ठेकेदारों के पूरी तरह से कब्जे में था। इस प्रकार दोनों वर्ग में से एक गाँव के अंदर था और दूसरा गाँव के बाहर। फिर भी ये दोनों व्यवस्‍था से बाहर के ही थे और जब तक इन दोनों वर्गों में चेतना नहीं आ जाती, जागरूकता नहीं आ जाती तब तक कल की आजादी का अर्थ इन्‍हें समझ में आना मुश्किल था। तब यह सवाल मुंह बाये सामने खड़ा था कि आनेवाली आजादी क्‍या इन गुलामों के हाथों में होगी या फिर ठेकेदारों के हाथ में होगी? ठीक उसी समय अस्पृश्‍यों के सवालों को लेकर बाबा साहब आंदोलन में उतरते हैं। दूसरी ओर यह सवाल था कि गाँव में रहते हुए भी वंचित की स्थिति में रहने वाले इस वर्ग को आंदोलन में कैसे उतारें? इन्हें आंदोलन में शामिल करने हेतु यह जरूरी था कि इनको समाज के ठेकेदारों के विरोध में ही उतारा जाय। लेकिन उस समय की परिस्थिति में यह काम एकाएक नहीं हो सकता था। और तब यह आवश्यक हो जाता है कि इनको उतारने के लिए ठेकेदारों को सहलाते हुए आगे बढ़ा जाए। इस तरह की धारा महात्‍मा गांधी ने उस वक्‍त चलाई थी जो गांधी का बहुमूल्य योगदान है। जिस समस्या से आज भी हम जूझ रहे हैं, किन्तु उसका समाधान नहीं मिल पा रहा है, किन्तु गांधी ने उसी समय इसका एक हद तक हल निकाल लिया था।

भारत के मध्‍य वर्ग और मध्‍य जातियों पर धार्मिक आडंबरों- कर्मकांडों का दबाव डालकर उन्‍हें अपने गिरफ्त में रखने की साजिश चली आ रही है, उससे आज भी छुटकारा नहीं मिल पाया है। यही हमारे लिए सबसे बड़ा सवाल है, जिसके सा‍थ हम आज तक संघर्षरत हैं। ऐसे में इस वर्ग को इन कर्मकाडों/आडंबरों से मुक्‍त कर इनमें चेतना निर्माण करने हेतु या इसे दूसरे शब्दों में कहें तो हमें नये मानव को गढ़ने की प्रक्रिया के अंतर्गत नये नेतृत्‍व का निर्माण करना होगा। इस आशय से संबंधित जो कुछ भी प्रयोग गांधीजी द्वारा किए गए, वह हमारे लिए आज भी काफी मायने रखते हैं। लेकिन इन्‍हीं प्रयोगों को लेकर– गांधी और अंबेडकर के बीच मतभेदों को उछाला जाता है।

वस्तुतः उस वक्त के हालात पर नजर डालें तो गिने-चुने लोगों के हाथ में ही आजादी के आंदोलन की बागडोर थी। यह बागडोर जन सामान्‍य के हाथों में कैसे आएगी, इसको लेकर अंबेडकर ने अपने आंदोलन की दिशा निर्धारि‍त की। उस वक्त अंबेडकर ने यही सवाल उठाया था कि आजादी के आंदोलन में हमारी भागीदारी क्‍या है? जब आप सहभागी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं तो उसमें हमारा सहभाग क्‍या है? इस बात को लेकर उस समय अंबेडकर का संघर्ष लगातार जारी रहा और आज भी यही मुद्दा बहस के केंद्र में बना हुआ है, जो आज भी विवादास्‍पद है। अगर यह विवाद नहीं होता तो भारत के राजनीति के केंद्र में बाबा साहब और महात्‍मा गांधी दोनों एक-साथ हो सकते थे! यह बात ज्‍यादा मायने रखती है।

मुझे ऐसा लगता है कि 1920 के आसपास देश के स्‍वतंत्रता आंदोलन पर जब हम नजर डालते हैं तब यह परिदृश्‍य उभर कर सामने आता है कि आजादी आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाली कांग्रेस धार्मिकता के जकड़न से मुक्त होकर आजादी के आंदोलन की बागडोर भारत के मध्‍य वर्ग और निम्‍न वर्ग के हाथों में आ जाती है। यही भारत का उस वक्‍त का राजनीतिक इतिहास है। इसी के परिणामस्‍वरूप आज हम यहाँ तक पहुँच पाए हैं। अगर इस दृष्टिकोण से उस राजनीतिक इतिहास को देखा जाए तो हमें पता चलता है कि उस वक्‍त से लेकर स्‍वतंत्रता प्राप्ति तक अंबेडकर और गांधी ने अपनी जगह नहीं छोड़ी बल्कि हरदम स्‍वतंत्रता संग्राम के केन्‍द्र में डटे रहे तथा एक-दूसरे को संबल प्रदान करते रहे। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ भी खड़े हुए, बावजूद इसके संवाद की घड़ी में दोनों एक साथ भी दिखाई देते हैं।

हमें यह समझना होगा कि अंग्रेज़ खतरनाक किस्म के कूटनीतिज्ञ थे। उन्‍होंने पूरे विश्‍व पर राज किया और पूरे विश्‍व को लूटा। उनके उपनिवेश रहे विश्‍व के लगभग आधे देशों में मैं घूमकर आया हूँ। मैंने यह देखा कि उस समय भारत में जितना विकास का काम हुआ है उतना विकास विश्‍व के किसी भी अन्‍य उपनिवेश में नहीं हुआ था। यह अंग्रेजी राज के भारत की विशेषता है। अगर आप कहेंगे कि अंग्रेज़ धूर्त थे तो मैं कहूँगा हां वे धूर्त होंगे। हो सकता है कि उन्‍होंने भविष्य की सोच रखते हुए कि आनेवाले समय में दुनिया की व्‍यवस्‍था में भारत का प्रभाव बढ़ेगा, इसका अंदाजा उस समय में लगा लिया था। इससे जुड़ा हुआ एक वाकया बताता हूँ -एक बार मैं डरबन कान्‍फ्रेन्‍स में गया था तब मैंने वहाँ पर इस बात को रखा था कि अंग्रेज़ों ने जितने भी उपनिवेश देशों को लूटा है, उसे उसका हर्जाना देना होगा। इसकी अगुवाई भी मैंने ही की थी। इस बात को लेकर भारत की तत्कालीन सरकार ने मुझसे पूछा कि आप यह क्‍या कर रहे हैं? मैंने कहा हर्जाना मांग रहा हूँ, और यह उनके साथ (अंग्रेज़ों के साथ) की बात है। तो सरकार ने मुझसे यह कहा कि आप नहीं जा सकते और इसका यह कारण बताया कि अंग्रेजों ने हमें लूटा ही नहीं है।

मैंने पूछा कि हमें लूटा नहीं है, ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? तो इसके जवाब में उन्‍होंने कहा कि यूरोपीय देशों ने हमें लूटा नहीं बल्कि ये सारे देश आज हम पर निर्भर हैं। इसलिए हम इनका नेतृत्‍व कर सकते हैं। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि अंग्रेज़ धूर्त थे, सही समय पर (1937 में) यहाँ से वापस जाने की इच्छा जाहिर की थी। मेरे कहने का यही तात्‍पर्य है कि क्‍या हम उसी इतिहास में अटके रहेंगे? आखिर कब तक हम इसी राजनीति में अटके रहेंगे? जिस रास्ते पर महात्मा फुले, महात्मा गांधी और महात्मा अंबेडकर चले उस रास्ते पर चलकर इसे नैतिकता के साथ जोड़ेंगे अथवा नहीं? यह आज का प्रमुख सवाल है। अगर हमें नैतिक राजनीति की ओर जाना है तब हमें समान अवसर पर ध्‍यान देना होगा, जो सर्वसमावेषक हो। इसे नजरअंदाज कर हम आगे नहीं बढ़ सकते। साइमन कमीशन से लेकर बाबासाहब तक सभी ने यह कहा कि यहाँ आरक्षण होना चाहिए। इस बात का समर्थन अगर उस समय में गांधीजी करते तो शायद ही स्‍वतंत्रता आंदोलन में उनका नेतृत्‍व मान्‍य किया गया होता, इस बात पर मुझे संदेह है। क्‍योंकि जिस तरह से मध्‍य जातियों में से गांधी का व्‍यक्तित्‍व उभरा था, अगर गांधी आरक्षण को समर्थन देते तो उसी समय उनका नेतृत्‍व समाप्त हो चुका होता। इस अवसर का फायदा उठाकर, ठेकेदारों द्वारा यह साजिश की जा सकती थी कि आगे से बहुजन नेतृत्‍व उभरकर न आए।

इसके चलते निम्‍न जातियों का नेतृत्‍व भी वहीं खत्म हो जाता। बहरहाल संघर्ष हुआ, कड़ा संघर्ष हुआ, संघर्ष नहीं हुआ ऐसा मैं नहीं कहूँगा, संघर्ष बड़े पैमाने पर हुआ, परंतु इस संघर्ष में से जो बाहर निकला उससे आरक्षण की मूल अवधारणा को जरा-सा भी धक्‍का नहीं पहुँचा। अर्थात आरक्षण की संकल्‍पना को कोई क्षति नहीं हुई, वह जैसे की तैसे बनी रही। यह अलग बात है कि उसके क्रियान्‍वयन का तरीका दोषपूर्ण था। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि पूना पैकट के दौरान आरक्षण की अवधारणा के मूल तत्‍व गांधी-अंबेडकर के विवादों के बावजूद जस के तस बने रहे। इसके क्रियान्वयन पर दोनों ने आपसी समझौता किया। मेरा सवाल यह है कि उस समय में अगर गांधी इसका विरोध नहीं करते तो इस बात की क्‍या गारंटी थी कि कोई दूसरा इसका विरोध नहीं करता? सच पूछिये तो इस बात की कोई गारंटी नहीं थी। इस बात की गारंटी को अगर जाँचना-परखना है तो उस समय के हिन्‍दू महासभा के इतिहास को हमें समझना पड़ेगा।

हिन्दू महासभा के उस समय के प्रमुख व्यक्तियों में से एक मुंजे को ही देख लीजिए, उसका कहना था कि कोई एक ऐसा आदमी जो बहुजनों में से है और उसने हम सभी सवर्णों की लीडरशिप को ध्‍वस्‍त कर दिया है। जिसने सड़क के माध्यम से गाँव के जजमानी प्रथा के शोषितों के हाथों में गांव को नेतृत्‍व प्रदान किया। उनका यह नेतृत्‍व हम लोगों को ध्‍वस्‍त कर देगा। हमारी संकल्‍पना को नष्‍ट कर देगा। वह हमारे वर्चस्‍व को, मनुस्‍मृति को ध्‍वस्‍त कर रहा है। उस समय मुंजे जैसों की यह राय रही थी। इस पूरी परिस्थिति को सामने रखकर जब हम सोचते हैं तो पिछले 70 साल में जो भी परिघटनाएँ हुईं उसे यथासमय लोगों ने उसपर अपने जो भी मत प्रकट किए हैं उसे आज के समय में समझने से कोई फायदा नहीं। लेकिन आज हमें यह सोचना होगा कि उस समय में जो भी हुआ, जिसके द्वारा हुआ अगर वह नहीं हुआ होता, तब क्‍या हुआ होता? शायद उनकी जगह कुछ और ही होता।

मैं फिर से एक बार इतिहास की ओर देखता हूँ, हाल में भीमा कोरेगांव के शहीदों के अभिवादन के लिए आए लोगों को बुरी तरह से मारा-पीटा गया। ब्रिटिशों ने अछूतों को अपनी सेना में भर्ती तो करवाया लेकिन जैसे ही पेशवाई पर ब्रिटिशों ने विजय प्राप्‍त की, वैसे ही सेना में अछूतों की भर्ती बंद कर दी गई। हमें इस इतिहास को गौर से देखना होगा– जिन लोगों ने ब्रिटिशों को सत्ता स्‍थापित करने में मदद की उन्हीं लोगों को उन्होंने दरकिनार किया और अपने विरोधी रहे पेशवाओं को प्रधानता दी। इस इतिहास को हमें नये सिरे से देखना-समझना होगा। गलती से अगर यह नेतृत्‍व हिन्‍दू महासभा के हाथों में चला जाता और वे ब्रिटिशों को यह आश्वासन देते कि आप यहाँ 60 साल और राज करिए उसके बाद निकल जाइये। तब क्‍या अंग्रेज़ इन लोगों के इस आश्‍वासन पर विश्‍वास करते? यह भी सोचने वाली बात है। वे किसको प्रधानता देते और किसके साथ ईमानदार रहते? ऐसे लोगों के प्रति जो नि:शस्‍त्र हैं, जिनके पास कोई आर्थिक सत्ता नहीं और न ही कोई धार्मिक सत्ता है, या फिर ऐसे लोगों के प्रति जिनके पास सामाजिक-आर्थिक- धार्मिक-राजनीतिक सत्ता पहले से मौजूद है! इस पहलू पर भी सोचा जाना चाहिए।

(संकलन एवं संपादन- डॉ. मुकेश कुमार; मराठी से हिन्दी अनुवाद- गजानन एस. निलामे)

                         जारी....                         

 








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