सहमति-असहमति के दौर में डॉ. अंबेडकर की विरासत और संविधान

जन्मदिन पर विशेष , , रविवार , 14-04-2019


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अजय कुमार

दूर से देखने पर अंबेडकर का जीवन साधारण साधनों के अपने दम पर तरक्की को छूने वाले नायकों की परीकथा जैसा लगता है। अंबेडकर सालों सालों तक अस्पृश्यता के साथ होने वाले दैनिक भेदभाव से तो बचे रहे। क्योंकि उनके पिता छावनी में काम करते थे। जहां इस तरह का भेदभाव नहीं था उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में सिपाही थे खैर धीरे-धीरे उन्हें भी अस्पृश्यता का सामना तो करना ही था। डॉक्टर अंबेडकर 1917 में लंदन से भारत आ गए उनकी इन अकादमिक उपलब्धियों के फलस्वरूप अंग्रेजों का ध्यान उनकी ओर गया। अंग्रेजों का अंबेडकर में अछूतों का यह भावी प्रतिनिधि दिखाई पड़ रहा था। 1919 में मताधिकार प्रदान करने के लिए योग्यता कसौटी में संशोधन करने के लिए साउथबॉरो कमेटी बनाई गई थी। जिससे और ज्यादा भारतीयों को विभिन्न प्रांतों की असेंबली में चुनाव के लिए मतदान का अधिकार मिल सके। इस कमेटी ने जिन लोगों से सलाह मांगी उनमें अंबेडकर भी एक थे। यह एक बहुत महत्वपूर्ण क्षण था क्योंकि 1919 में ही ब्रिटिश भारत की प्रांतीय असेंबलियों और सरकारों को पहले से ज्यादा अधिकार व सत्ता देने वाले सुधार शुरु किए थे। 

इसके बाद अंबेडकर ने अछूतों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल और आरक्षित सीटों की व्यवस्था की मांग उठाई थी। साल 1920 में उन्होंने शिवाजी के वंशज कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज की आर्थिक सहायता से मूकनायक अखबार जर्नल निकालना शुरू किया। मगर जब शाहू महाराज ने अंबेडकर को एक बार फिर इंग्लैंड जाने और पढ़ाई जारी रखने के लिए वजीफे की पेशकश की तो उन्होंने प्रस्ताव मंजूर कर लिया फिर उन्होंने मास्टर ऑफ साइंस की डिग्री हासिल की और अगले साल रुपए की समस्या शीर्षक के तहत अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। इसके बाद वह भारत लौटे। मुंबई में वकालत की दुनिया में अपने पैर जमाने की कोशिश की। अछूत होने के कारण उनके लिए ग्राहक जुटाना बहुत मुश्किल था। दिल में गहरी कड़वाहट लिए उन्होंने संकल्प लिया कि वह अपना जीवन जाति व्यवस्था के उन्मूलन के अभियान में समर्पित कर देंगे। तत्पश्चात जुलाई 1924 में उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया और 1928 तक इसका दायित्व संभाला। 1927 में अंग्रेज सरकार ने बॉम्बे प्रेसीडेंसी की लेजिस्लेटिव काउंसिल में मनोनीत किया था। काउंसिल में रहते हुए अंबेडकर ने तालाब से पानी निकालने का आंदोलन किया। यही आगे चलकर 1927 में होने वाली उनकी पहली विशाल गोलबंदी का लक्ष्य बना।

इसके बाद मंदिर प्रवेश आंदोलन यानी मंदिर में दलितों के लिए प्रवेश का आंदोलन चलाया। यह आंदोलन 1935 तक रह-रह कर चलता रहा। 1930 का दशक अंबेडकर के लिए दलगत राजनीति में नए प्रयोगों का दौर रहा। अंबेडकर ने अंग्रेजों से मांग की क्यों न अस्पृश्यों को प्रथम निर्वाचन मंडल का अधिकार दिया जाए। अगर उनकी यह मांग मान ली जाती तो अस्पृश्य निश्चित रूप से एक मजबूत राजनीतिक स्थिति में रूपांतरित हो सकते थे। अंग्रेज सरकार ने भी कम्युनल अवार्ड के सिलसिले में हुई चर्चा के दौरान उनके तर्कों पर आंशिक रूप से सहमति दे दी थी। जिसकी घोषणा भी सरकार की ओर से 24 अगस्त को की गई थी। मगर क्यों कि गांधी जी को यह भय था कि पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था हिंदू एकता को तोड़कर रख देगी। इसलिए तत्काल ही वह यरवदा जेल में अनशन पर बैठ गए थे। अंबेडकर को पृथक निर्वाचन मंडल की मांग छोड़नी पड़ी। और 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर भी करने पड़े। इस घटनाक्रम से अंबेडकर को गहरा धक्का लगा था। हालांकि बाद में गांधी ने इस बात को माना था कि अस्पृश्यों को बड़ी संख्या में सीटें मिलनी चाहिए। 

1936 में अंबेडकर ने अपनी पहली राजनीतिक पार्टी इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आईएलपी) का गठन किया। यह फैसला 1937 में होने वाले चुनाव के मद्देनजर लिया गया था। 1937 के चुनाव गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के प्रावधानों के तहत कराए गए थे। यह कानून प्रांतीय सरकारों और असेंबलियों को 1919 के सुधारों से कहीं ज्यादा शक्तियां व अधिकार देता था। आईएलपी ने केवल मुंबई प्रेसिडेंसी और मध्य प्रांत में ही अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे और यहां पार्टी को कुछ सफलता भी मिली। पार्टी के नौ अन्य सदस्यों के साथ  अंबेडकर भी निर्वाचित घोषित हुए। 

इस तरह से जब देश में आजादी के लिए आंदोलन चल रहा था तो इसके साथ ही सामाजिक न्याय की आवाज को बुलंद किया जा रहा था। गांधी जी और डॉक्टर अंबेडकर इस संघर्ष के दो ध्रुव थे। गांधी जी का पक्ष प्रबल था तो उनके निशाने पर डॉक्टर अंबेडकर का आना स्वाभाविक था। लंदन में गोलमेज सम्मेलन में प्रतिनिधित्व पर हुआ विवाद डॉक्टर अंबेडकर के प्रथम निर्वाचन के अधिकार की मांग के साथ परवान चढ़ा। गांधी जी को चिंता थी कि दलित वर्ग के पृथक निर्वाचन क्षेत्र बनने से हिंदू बटेगा और विघटित भी होगा। उनके लिए इन वर्गों का प्रश्न नैतिक और धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक भी था। उन्होंने पृथक निर्वाचन के प्रस्ताव के खिलाफ आमरण अनशन की घोषणा कर दी। 17 अगस्त 1932 को रामदेव मैकडोनाल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की घोषणा की।

जिसमें दलितों को अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखा जाना था। जिसके विरोध में 20 सितंबर 1932 की दोपहर से गांधी जी ने अपना अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद जो हुआ वह पूना पैक्ट के रूप में हमारे सामने आया। पूना पैक्ट को लेकर लेखकों और कई सवर्णों तथा दलित नेताओं के अपने-अपने आरोप और प्रत्यारोप हैं। किंतु यदि तत्कालीन स्थितियों की पूर्वाग्रह से रहित निरपेक्ष विवेचना की जाए तो लगेगा कि यदि गांधी जी ने अपनी जान को दांव पर लगाकर सवर्ण समाज पर गंभीर दबाव ना पैदा किया होता तो शायद सामाजिक अन्याय की कालिख इतनी आसानी से नहीं धुलती। दूसरी तरफ डॉ अंबेडकर ने लगातार राजनीतिक दबाव ना खड़ा किया होता तो शायद अछूत जातियों को संसद, विधानमंडल और अन्य सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। आरक्षण का लाभ भी उसी का प्रतिफल है। 

गांधी जी के जीवन की रक्षा इस बात पर ही डॉक्टर अंबेडकर अंतिम रूप से सहमत हुए थे। क्योंकि वे जानते थे कि यदि आमरण अनशन के दौरान गांधी जी को कुछ हो गया तो देश में भयंकर दलित दंगे होने और समाज की खाई पाटने का जो ऐतिहासिक दायित्व डॉक्टर अंबेडकर के कंधों पर आया है वह अपना महत्व खो देगा। इस बात का खेद है कि प्रारंभ में जो वातावरण बना बाद में वह बिगड़ता गया।  

पूना पैक्ट के सह-हस्ताक्षर कर्ता नेता धीरे-धीरे अपने वादों से पीछे हटने लगे इस तरह से गांधी और अंबेडकर के बीच विवाद और कटुता बढ़ती चली गई। इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि डॉक्टर के जीवन में तल्खी बढ़ती गई। कांग्रेस डॉ. अंबेडकर के विरोध में इस तरह उतरी कि चुनाव में उन्हें हराने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। समय का खेल था कि कि जो कांग्रेस डॉक्टर अंबेडकर को चुनाव में पराजित करने के लिए हर तरह के ओछे खेल खेलने से परहेज नहीं करती थी, उसी कांग्रेस के नेतृत्व को संविधान सभा में ना केवल उन्हें लाना पड़ा अपितु उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष भी बनाना बनाना पड़ा। कानून मंत्री और मसविदा समिति के अध्यक्ष के रूप में तथा संविधान निर्माण में अंबेडकर के कार्यों व सहयोग को सराहा गया। बाद में हिंदू कोड बिल पर नेहरू और पटेल से मतभेदों के चलते उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। डॉक्टर अंबेडकर ने विदेशियों से आग्रहलेख में लिखा है कि कांग्रेस केवल राष्ट्रीय आजादी की लड़ाई लड़ रही है राजनीतिक प्रजातन्त्र में उसको कोई दिलचस्पी नहीं है। इसलिए हमारी यह पार्टी भारत में राजनीतिक प्रजातंत्र की लड़ाई लड़ रही है इसलिए यह अस्पृश्यों की पार्टी है, इसलिए यह सब की पार्टी है। 

अंबेडकर की चिंता के मूल में अस्पृश्य समाज को मुख्यधारा में सम्मानित स्थान दिलाने की थी। जिसके बारे में उनके विरोधियों ने काफी भ्रम फैलाया था। अंबेडकर ब्रिटिश शासन के कुछ हद तक इसलिए पक्षधर थे क्योंकि वह जानते थे कि यह सरकार सवर्ण और अवर्ण सभी के लिए समान कानून और एक शासन का सूत्रपात किया था। क्योंकि वह जानते थे कि अंग्रेज ऐसा कर सकते हैं। जिससे सवर्ण और अवर्ण के बीच में सामाजिक बराबरी आ सके।  

देश के बौद्धिक विकास के लिए भी वह ब्रिटिश सरकार को श्रेय दिया करते थे, किंतु उनका यह भी मत था कि भारत की भयानक गरीबी, अकाल और आर्थिक शोषण के लिए ब्रिटिश सरकार कम दोषी नहीं है। अंबेडकर कहते थे हमें राजनीतिक सत्ता चाहिए किंतु राज्य सत्ता से दलितों की सभी समस्याओं का हल नहीं हो सकता उसके लिए दलितों की मुक्ति के लिए सामाजिक क्रांति की आवश्यकता होगी। सत्ता हस्तांतरण के दौर में डॉक्टर अंबेडकर ने एक सुलझे हुए राजनेता के रूप में संविधान निर्माण परिषद में 13 दिसंबर 1946 को भाषण दिया। वह इस बात के लिए पर्याप्त है कि अंबेडकर स्वतंत्र भारत के भविष्य के प्रति आशान्वित थे। 

इसके साथ ही एक बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव भारतीय संविधान के द्वारा भी लाया गया जिसके द्वारा समाज के कमजोर वर्गों को अनेक प्रकार की सुविधायें जैसे शिक्षा, नौकरी विधान सभा और संसद में आरक्षण, लिखने पढ़ने के अवसर आदि इन्हें प्राप्त होने लगी जिसके कारण समाज के कमजोर तबको और दलितों को मुख्यधारा के समाज राजनीति एवं अकादेमियां में दर्ज होने का अवसर मिल सका। इस प्रकार से डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था यह शिक्षा ही है जिसे सामाजिक दासता खत्म करने के हथियार के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है और शिक्षा के माध्यम से ही कमजोर और दलित वर्ग के लोग सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते हैं।

डॉक्टर अंबेडकर व स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय पर जोर देते थे। स्वतंत्र भारत के सामने आने वाली समस्याओं पर भी डॉक्टर अंबेडकर का चिंतन बहुत साफ और दूरदर्शिता पूर्ण है। उन्होंने कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के लिए क्या किया में लिखा है, स्वराज के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं होगी जिससे शासक वर्ग हमेशा छूमंतर हो जाएगा। ब्रिटिश शासन के चंगुल से निकलने पर भी भारत का शासक वर्ग व शोषक वर्ग ज्यों का त्यों बना रहेगा। बल्कि उसमें ज्यादा शक्ति आ जाएगी संक्षेप में स्वराज्य में जनता की सरकार नहीं होगी। बल्कि सरकार शासक वर्ग की ही होगी और जनता की सरकार जनता के लिए को दफना कर जो चाहेगा वह करेगा। प्रश्न यह भी है कि क्या स्वतंत्र भारत में सामाजिक व्यवस्था में सुधार की योजनाओं को लागू किया जाएगा।

संविधान की स्वीकृति के बाद 23 नवंबर 1949 को अपने भाषण में डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि 26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं, राजनीति में हम समानता प्राप्त करेंगे। परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी जितनी जल्दी हो हमें इस अंतर्विरोध को दूर करना चाहिए वरना जो लोग इस असमानता से पीड़ित हैं वह इस सभा द्वारा इतने परिश्रम से बनाए हुए राजनीतिक लोकतंत्र के भवन को ध्वस्त कर देंगे। डॉ. अंबेडकर ने 1920 में लिखा था कि भारत की आजादी के साथ सभी वर्गों को धार्मिक आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी की गारंटी होनी चाहिए। 

डॉ. अंबेडकर ने 1920 में अपने पत्र मूक नायक में लिखा था कि भारत की आज़ादी के साथ सभी वर्गों की धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बराबरी की गारंटी होनी चाहिए, और हर व्यक्ति को अपनी प्रगति के लिए अनुकूल स्थितियां हासिल हों। गांधी जी ग्राम स्वराज की बात करते थे। और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के पक्षधर थे। जबकि अंबेडकर का यह मत था कि देश निर्माण में ग्राम इकाइयों का कोई योगदान नहीं हो सकता। वे मानते थे कि यदि केंद्रीय सत्ता मजबूत होगी तो संविधान में आम नागरिकों को दिये गए अधिकारों की निगरानी अच्छे ढंग से हो सकेगी। 

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और भारतीय संविधान 

डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि संविधान अच्छे लोगों के हाथ में रहेगा तो अच्छा सिद्ध होगा लेकिन बुरे हाथों में चला गया तो इस हद तक नाउम्मीद कर देगा कि ‘‘किसी के लिए भी नहीं’ नजर आएगा। उनके शब्द थे, ‘‘महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा। संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो लेकिन अमल में लाने वाले अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा। 

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा की गई देश और समाज की सेवाओं के अनेक आयाम हैं, लेकिन संविधान निर्माण के वक्त उसकी प्रारूप समिति के अध्यक्ष के तौर पर निभाई गई जिस भूमिका ने उन्हें ‘‘संविधान निर्माता’ बना दिया, वह इस अर्थ में विशेष है कि आज हम अपनी राजनीति में नियमों, नीतियों, सिद्धांतों, नैतिकताओं, उसूलों और चरित्र के जिन संकटों से दो-चार हैं, उनके अंदेशे उन्होंने तभी भांप लिए थे। तभी उन्होंने संविधान लागू होने के ऐन पहले और उसके बाद इनको लेकर कई आशंकाएं जताई और आगाह किया था कि ये संकट ऐसे ही बढ़ते गए तो न सिर्फ संविधान बल्कि आजादी को भी तहस-नहस कर सकते हैं। लेकिन अब तक किसी ने भी उनकी आशंकाओं पर गंभीरता नहीं दिखाई। उन्हें नजरंदाज करने वालों से तो इसकी अपेक्षा ही नहीं की जा सकती, लेकिन उन्हें पूजने की प्रतिमा बना देने वालों ने भी संकटों के समाधान के लिए सारे देशवासियों में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता बढ़ाने वाली बंधुता सुनिश्चित करने के उनके द्वारा सुझाए गए रास्ते पर चलने की जरूरत नहीं समझी।

इसलिए आज कई बार हमें उनके इतर जाने का रास्ता ही नहीं दिखता। गौरतलब है कि संविधान के अधिनियमित, आत्मार्पित और अंगीकृत होने से ठीक पहले 25 नवम्बर, 1949 को उन्होंने उसे ‘‘अपने सपनों का’ अथवा ‘‘तीन लोक से न्यारा’ मानने से इनकार करके उसकी सीमाएं रेखांकित कर दी थीं। विधि मंत्री के तौर पर अपने पहले ही साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि यह संविधान अच्छे लोगों के हाथ में रहेगा तो अच्छा सिद्ध होगा लेकिन बुरे हाथों में चला गया तो इस हद तक नाउम्मीद कर देगा कि ‘‘किसी के लिए भी नहीं’ नजर आएगा। उनके शब्द थे, ‘‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा। दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, यदि वे लोग, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा।’ उन्होंने चेताया था कि ‘‘संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता।

संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे राज्य के अंगों का प्रावधान कर सकता है। उन अंगों का संचालन लोगों पर तथा उनके द्वारा अपनी आकांक्षाओं तथा अपनी राजनीति की पूर्ति के लिए बनाए जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है।’ फिर उन्होंने जैसे खुद से सवाल किया था कि आज की तारीख में, जब हमारा सामाजिक मानस अलोकतांत्रिक है और राज्य की प्रणाली लोकतांत्रिक, कौन कह सकता है कि भारत के लोगों तथा राजनीतिक दलों का भविष्य का व्यवहार कैसा होगा? वे साफ देख रहे थे कि आगे चलकर लोकतंत्र से हासिल सहूलियतों का लाभ उठाकर विभिन्न तथा परस्पर विरोधी विचारधाराएं रखने वाले राजनीतिक दल बन जाएंगे, जिनमें से कई जातियों और संप्रदायों के हमारे पुराने शत्रुओं के साथ मिलकर कोढ़ में खाज पैदा कर सकते हैं। उनके निकट इसका सबसे अच्छा समाधान यह था कि सारे भारतवासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखें, न कि पंथ को देश से ऊपर। लेकिन ऐसा होने को लेकर वे आश्वस्त नहीं थे, इसलिए अपने आप को यह कहने से रोक नहीं पाए थे ‘‘यदि राजनीतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवतया हमेशा के लिए खत्म हो जाए। हमको इस संभावित घटना का दृढ़ निश्चय के साथ प्रतिकार करना चाहिए।

आजादी की खून के आखिरी कतरे के साथ रक्षा करने का संकल्प करना चाहिए।’ उनके अनुसार संविधान लागू होने के साथ ही हम अंतर्विरोधों के नये युग में प्रवेश कर गए थे और उसका सबसे बड़ा अंतर्विरोध था कि वह एक ऐसे देश में लागू हो रहा था, जिसे उसकी मार्फत नागरिकों की राजनीतिक समता का उद्देश्य तो प्राप्त होने जा रहा था, लेकिन आर्थिक और सामाजिक समता कही दूर भी दिखाई नहीं दे रही थी। उन्होंने नवनिर्मित संविधान को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के हाथों में दिया तो आग्रह किया था कि वे जितनी जल्दी संभव हो, नागरिकों के बीच आर्थिक और सामाजिक समता लाने के जतन करें क्योंकि इस अंतर्विरोध की उम्र लम्बी होने पर उन्हें देश में उस लोकतंत्र के ही विफल हो जाने का अंदेशा सता रहा था, जिसके तहत ‘‘एक व्यक्ति-एक वोट’ की व्यवस्था को हर संभव समानता तक ले जाया जाना था। उनके कथनों के आईने में देखें तो आज हम पाते हैं कि संविधान का अनुपालन कराने की शक्ति ऐसी राजनीति के हाथ में चली गई है, जिसका खुद का लोकतंत्र में विश्वास ही असंदिग्ध नहीं है, और जो लोकतंत्र की सारी सहूलियतों को अपने नाम करके लोकतंत्र के खात्मे के लिए इस्तेमाल कर रही है। संविधान भी उसके निकट कोई जीवन दशर्न या आचार संहिता न होकर महज अपनी सुविधा का नाम है।

इसीलिए तो संविधान के स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुता जैसे उदात्त मूल्यों से निर्ममतापूर्वक खेल किए जा रहे हैं, और सामाजिक और आर्थिक समता लाने के उनके आग्रह के उलट सत्ताओं का सारा जोर जातीय गोलबंदियों को मजबूत करने, आर्थिक संकेंद्रण और विषमता बढ़ाने पर है। यह तब है जब बाबा साहेब मूल उद्योगों को सरकारी नियंत्रण यानि राजकीय नियंत्रण और उचित वितरण प्रणाली के साथ निजी पूंजी को समता के बंधन में कैद रखना चाहते थे ताकि आर्थिक संसाधनों का ऐसा अहितकारी संकेंद्रण कतई नहीं हो जिससे नागरिकों का कोई समूह लगातार शक्तिशाली और कोई समूह लगातार निर्बल होता जाए। संविधान के रूप में बाबा साहेब की जो सबसे बड़ी पूंजी हमारे पास है, उसे व्यर्थ कर डालने का इससे बड़ा षड्यंत्र भला और क्या होगा कि उसकी प्रस्तावना में देश को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प वर्णित है, लेकिन हमारी चुनी हुई कहने को लोकतान्त्रिक लेकिन अधिकतम आलोकतांत्रिक सरकारों ने देश पर थोप दी गई नवउदारवादी पूंजीवादी नीतियों को इस संकल्प का विकल्प बना डाला है।

संविधान की आत्मा को मार देने के उद्देश्य से वे बार-बार उसकी समीक्षा का प्रश्न उछालती हैं, तो उनकी शह प्राप्त विभिन्न विरोधी सत्ताएं उसके अतिक्रमण पर उतरी रहती हैं। यह अतिक्रमण मुमकिन नहीं होता अगर बाबा साहेब की भारतीयता की यह अवधारणा स्वीकार कर ली गई होती- ‘‘कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं, बाद में हिन्दू या मुसलमान। मुझे यह स्वीकार नहीं है। मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें। भारतीय के अलावा कुछ भी न हो।’ दरअसल, वे देश में ऐसा समाजवाद चाहते थे, जो सबके लिए हो और हम उनका यह जन्मदिन मना रहे हैं, तो हमारा पाला ऐसे लोगों से पड़ा हुआ है, जिन्हें यह शब्द संविधान की प्रस्तावना में भी स्वीकार नहीं! 

अम्बेडकर यह मानते थे कि मनुष्यों में केवल राजनीतिक समानता और कानून के समक्ष समानता स्थापित करके समानता के सिद्धांत को पूरी तरह सार्थक नहीं किया जा सकता। जब तक उनमें सामाजिक-आर्थिक समानता स्थापित नहीं की जाती तब तक उनकी समानता अधूरी रहेगी। हमारे देश पर आज की दुनिया में भूमंडलीकरण की पूंजीवादी प्रक्रियाओं के चलते पुर्नउपनिवेशीकरण का खतरा मंडरा रहा है तो दूसरी तरफ धर्म और संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिक शक्तियां लगातार मजबूत हो रही हैं। अंधराष्टवाद के विरुद्ध प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक राष्ट्रवाद को अपनाना हमारे लिये जरूरी हो गया है, क्योंकि नवसाम्राज्यवादी और नवफासीवादी-शक्तियों की मार अततः उन्हीं लोगों पर पड़ती हैं जो सामाजिक अन्याय व बहिष्करण के शिकार हैं। अम्बेडकर ने जिन अंतर्विरोधों को दूर करने के लिए कहा था वे सामाजिक स्तर पर चाहे कुछ कम हुए हों लेकिन भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में आर्थिक स्तर पर पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गये हैं।

भारतीय लोकतंत्र के विषय में कांस्टीटुएंट एसेंबली में डा.अम्बेडकर के वे शब्द याद आते हैं जो उन्होंने भारत का संविधान प्रस्तुत करते हुए संसद में कहे थे जनवरी की 26 तारीख को हम अंतर्विरोधों के युग में प्रवेश करेंगे। राजनीति में समता और सामाजिक-आर्थिक जीवन में विषमता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति की कीमत एक वोट के आधार पर आंकेंगे लेकिन सामाजिक और आर्थिक जगत में विषमतामूलक संरचनाओं के कारण हम एक व्यक्ति-एक मूल्य के उसूल को नकारना जारी रखेंगे। अंतर्विरोधों की इस गिरफ्त में हम कब तक फंसे रहेंगे। सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में हम समता को कब तक ठुकराते रहेंगे अगर हमने लंबे अरसे तक समता को अस्वीकार करना जारी रखा तो इसका नतीजा हमारे राजनीतिक लोकतंत्र के संकटग्रस्त होने में ही निकलेगा। इस प्रकार डा. अम्बेडकर सामाजिक एवं आर्थिक अन्याय से मुक्त समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसका जरिया उनके अनुसार सांस्कृतिक क्रांति ही थी। उन्होंने क्रांतिकारी परिवर्तनों की राह पर चल कर स्वतंत्रता समानता एवं भ्रातृत्व के आदर्शों की प्राप्ति करनी चाही। उन्होंने बहिष्कृत जनों को शिक्षित एवं संगठित हो कर आंदोलन की राह पर चलने का आह्वान किया। डा. अम्बेडकर ने दलितों की मुक्ति का जो सपना देखा था वह बावजूद तमाम सारे सामाजिक राजनैतिक आन्दोलन के अभी भी अधूरा है।

(डॉक्टर अजय कुमार युवा दलित समाजशास्त्री हैं और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फेलो हैं। वह दलित समाजशास्त्र और इतिहास के आपसी संबंध पर शोध कर रहे हैं।)

 








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Umesh Chandola :: - 04-14-2019
पूरी दुनिया में उत्पीड़ित जनता का एकमात्र दर्शन रहा है---मार्क्सवाद । बाकी सब दर्शनों ने इसे लेकर काफी समय तक हो हल्ला मचाया है। दलित बुद्धिजीवियो का दर्शन मूलतः बुर्जुआ दर्शन ही है। देखे-// imkrwc.org /सा हित्य / मुलायम मायावती परिघटना

Umesh Chandola :: - 04-14-2019
अम्बेडकर नहीं बेनेगल नरसिंह ने बनाया है संविधान का मसौदा। ये भी1935 के इंडिया एक्ट पर आधारित है। संविधान की सच्चाई यह है--/ पढें --- भारत का संविधान, मिथक और यथार्थ , पेज 5 ,16 से 31जनवरी 2016 , enagrik.com