अब कश्मीर घाटी और जम्मू-लद्दाख अलग-अलग हैं...कोई शक़!

आड़ा-तिरछा , , सोमवार , 25-06-2018


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वीना

लोग दिल्ली में गुजरात के सहकारी बैंक में नोटबंदी के घोटाले का जवाब मांगते रह गए और अमित शाह महबूबा से गठबंधन क्यों तोड़ा ये जम्मू की जनता को बताने निकल लिए। मोदी-शाह को साढ़े तीन साल में समझ आया कि जम्मू-लद्दाख के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। कश्मीर घाटी में अशांति है। सो शांति लाने और जम्मू-लद्दाख का विकास करने के लिए भेदभाव करने वाली महबूबा को बाय-बाय कहना ज़रूरी था।

और.....जिस विकास की पूरे भारत को तलाश थी वो भी चुपचाप 23 जून 2018 को अमित शाह की जेब में बैठ कर जम्मू सटक लिया। विकास भारी बहुमत से बीजेपी को संसद में पहुंचाने वाले मतदाताओं के मतों की क़ीमत नहीं वसूल पाया तो क्या हुआ?  अब ये विकास, श्यामा प्रसाद मुखर्जी के ख़ून की क़ीमत वसूल करके दिखाएगा। 

‘‘एक देश दो निशान, दो विधान’’  को ख़त्म करने के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जम्मू पहुंचा दिया गया है। जानकारी के लिए बता दूं कि इन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पिछले चुनाव में मोदी 1930 के ज़माने में मरवाकर लंदन में उनकी अस्थियों को कै़द करवा आए थे। 

मोदी के मुताबिक श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज़ादी की लड़ाई लड़ते-लड़ते लंदन में शहीद हुए। और अमित शाह के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर को भारत में मिलाने की कोशिश करने के लिए जम्मू कश्मीर जेल में उनकी हत्या कर दी गई। इसी हत्या की पुण्यतिथि 23 जून को मनाई जाती है। 

बीते चार साल अमित शाह देश के बाक़ी हिस्सों में मशरूफ़ थे। सो श्यामा प्रसाद मुखर्जी की याद उनको नहीं आ सकी। लेकिन इसका हर्ज़ाना देने के लिए नागपुर में प्रणब मुखर्जी की मेहमान नवाज़ी कर दी गई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को (अगर वो होती है तो) उम्मीद है ज़रूर शांति मिली होगी। कैसे? अरे भई, मुखर्जी-मुखर्जी! वो भी बंगाल के! इसमें क्या तुक है?  ये मत कहियेगा। बीजेपी-संघ और उनके वंशज मोदी-शाह आदि-आदि की किसी बात या हरक़त का कोई तुक होता है? जो यहां होगा। बामण राज, मतलब बामण राज। बाद ख़त्म।

वैसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं रहने के बाद भी बीजेपी संघ के ख़ूब काम आते हैं। इसके लिए चाहे उन्हें दो-दो बार मरना ही क्यों न पड़ा हो। अब ये सब उनकी मर्ज़ी से हो रहा है या नहीं ये तो वो ही जाने जो ऊपर यानि स्वर्ग में उनसे मिलने की औक़ात रखता हो। (अगर स्वर्ग कहीं है तो)

तो... पिछले चुनावों में मोदी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 1930 में उनकी पहली मृत्यु करवाने के लिए लंदन ले गए थे। उनकी दूसरी और असल मृत्यु के करीब 20-25 साल पहले, जबकि वो 1930 में भारत में बा-शरीर ज़िन्दा थे! और तो और उनकी अस्थियां भी अंग्रेज़ों की ग़ुलामी की नज़र कर आए थे। जिन्हें छुड़ाने का ज़िम्मा दिया था जवाहर लाल नेहरू को। क्योंकि नेहरू कांग्रेसी थे। और मोदी को कांग्रेस का नामोनिशान मिटाना था। वरना जब ब्रिटेन गए थे तो जिन अस्थियों को उन्होंने अपने भाषणों में लंदन में बेड़ियां पहनाई थी उन्हें अपने साथ ला सकते थे। पर नहीं लाए। और ब्रिटेन की महारानी के साथ खा-पीकर, हाथ -मुंह पोछकर लौट आए नेहरू को गालियां देने। 

वैसे ठीक भी है। तब जिस तारीख़ में मोदी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मरने का पत्रा निकाला था उस समय वो कांग्रेस के सदस्य रहे होंगे। तो कांग्रेस की ज़िम्मेदारी बनती ही है उनकी अस्थियां लाने की। भले ही वो वहां हो या न हो। मोदी ने कहा तो उन्हें वहां होना ही चाहिये और कांग्रेस को लाना ही चाहिये।

खै़र, कांग्रेस तो है ही निकम्मी। उसका ये काम भी अमित शाह ने कर दिया है। जैसे देश के बाक़ी 70 सालों से पेंडिंग काम मोदी-अमित शाह की जोड़ी पूरे कर रही है! वैसे ही। 

तो साहेब के इस जमूरे शाह ने 23 जून 2018 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लंदन से छुड़ाकर जम्मू कश्मीर में अवतरित करा दिया है। माफ़ कीजियेगा जम्मू कश्मीर में नहीं सिर्फ़ जम्मू में। अमित शाह के मुताबिक - ‘‘ अपनी जात को, अपनी जान को जोखि़म में डालकर कश्मीर के लिए यहां आया और बलिदान हो गया।’’  अब दुबारा अमित शाह श्यामा प्रसाद की अस्थियों को म्लेच्छों के बीच रखकर उनकी ‘‘जात’’ को जोखि़म में कैसे डाल सकते हैं। जबकि कश्मीर उनकी मुट्ठी में हो? तो मुखर्जी की ये 65 वीं पुण्यतिथि है। जैसाकि इस बार देश को बताया गया है। वैसे 1930 में जान गंवाने पर कौन सी पुण्यतिथि होनी चाहिये?  इस बार जब मोदी 2019 में वोट मांगने आएं तो इतनी बात तो साफ करनी बनती है जनता-जनार्दन कि नहीं? 

अब जब मुखर्जी का शहीदी टिकट जम्मू कश्मीर पर चिपका दिया गया है तो - ‘‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है’’ का नारा बुलंदियों पर है। एक बात समझ में नहीं आती कि जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1930 में लंदन में फौत हुए थे तब - ‘‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो ब्रिटेन हमारा है’’ का नारा क्यों नहीं दिया गया? आज़ादी की लड़ाई में संघ दुम दबाए अंग्रेजों को पीठ पर लादे मंदिर-मस्जिदों में सुअर-गाय का गोश्त फेंकने में भले ही व्यस्त रहा हो पर आज तो संघ भारत के सिंहासन पर है। 

देश की सेना के अलावा संघ की कर्मठ-कठोर, अनुशासित, लाठी-भाले वाली सेना भी उनके पास है लाखों की संख्या में। जो बक़ौल संघ प्रमुख मोहन भागवत तीन दिन में पाकिस्तान को सबक सिखा सकती है। तो अंग्रेज़ों को चुटिकियों में ग़ुलाम बना कर शान से राम रथ में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अस्थियां लाना कौन सी बड़ी बात है? लगे हाथ कोहिनूर का हीरा भी झपट लाते उस घमंडी इंग्लैंड की महारानी के ताज से। 

पर अफसोस! ऐसा कुछ न हुआ और श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर घाटी को सबक सिखाने के लिए और जम्मू-लद्दाख की अभाव झेल रही गोद में विकास को पटकने के लिए चुपचाप लंदन से अदृश्य उड़न खटोले में बिठाकर जम्मू लैंड करवा लिए गए। वैसे हमें उम्मीद है कि मुखर्जी साहब की रूह इसका बुरा नहीं मानेगी (अगर रूह होती है तो)। ये उन्हीं के दिखाए रास्ते हैं जिन पर उनके वंशज चल रहे हैं।

जिस तरह से पब्लिक ने विकास की खोजबीन शुरु कर दी है उससे मोदी जी प्रेशर में आ गए हैं। समझ नहीं पा रहे थे कि 2019 की विजय बग़ैर विकास की झलक दिखाए सफल हो पाएगी या नहीं। कहीं ऐसा न हो अडानी-अंबानी की चोरी-डकैती में कुछ कटौती करनी पड़ जाए! क्या पता किसानों की कर्ज़ माफ़ी और बकाया अदायगी जितना विकास ही मजबूरन दिखाना पड़ जाए!

पर साहेब और जमूरे की जोड़ी यूं ही थोड़े कुख्यात है। इतनी आसानी से विकास की मुंह दिखाई भला भारतीयों को कैसे होने दे सकते हैं? और तभी विकास को शांति का घूंघट उठा कर जम्मू ले जाने की योजना दिमाग़ में आ गई। और महबूबा को ठेंगा दिखाकर अमल शुरू! 

400 करोड़ बंकरों के लिए... 2100 करोड़ जम्मू में रोड के लिए...इतने करोड़ लद्दाख को इसके लिए...इतने करोड़ जम्मू-लद्दाख के इस काम के लिए....उतने ब्ला...ब्ला...ब्ला...इस काम के लिए। अमित शाह ऐसी बुलंद आवाज़ में इन रूपयों को बार-बार गिना रहे थे जैसे गुजरात के सहकारी बैंकों का इस्तेमाल कर जो नोटबंदी के घपले-घोटाले से बड़े जतन से चोरी-चकारी करके इकट्ठा किया गया हो उसी में से जम्मू-लद्दाख पर लुटाने आए हैं!

इसलिए जम्मू-लद्दाख के लोगों तुम्हें मोदी-शाह जोड़ी का एहसानमंद होना चाहिये। जिन्होंने तुम्हारी ख़ातिर ही नोटबंदी लागू करवाई ताकि वो कुछ माल अंबानी-अडानी की नज़रे बचाकर तुम्हारे लिए अंदर कर सकें। 

तभी तो पकौड़े-पान बेचने का रोज़गार जम्मू-लद्दाख वासियों के लिए मुहैया करवाया जा सकेगा। एम्स, स्मार्ट सिटी बनाने का सपना केवल जम्मू-लद्दाख के लिए है। कश्मीर घाटी वासियों अगर तुमने चूं भी की तो सारी मिलिट्री फोर्स और पुलिस जो तुम्हारे और बाक़ी भारतवासियों के टैक्स पर पलती है, सिर्फ जम्मू-लद्दाख वालों के नहीं, उसे जेब में लेकर घूमते हैं अमित शाह। एक बार हाथ बाहर निकाल शू किया नहीं कि बस... 

बाक़ी श्यामा प्रसाद मुखर्जी को चैकीदारी पर लगा दिया गया है। और हां, ये डींगे सुन-सुनकर कान पक गए थे कि पाकिस्तान के टुकड़े करवाकर बंगला देश बनाने वाला नेतृत्व हमारे पास है, तुम्हारे पास क्या है? तो ये राग अलापने वाले 23 जून 2018 के बाद मुंह पर ताला लगा लें। आज जम्मू और कश्मीर के दो टुकड़े कर दिए गए हैं। अब कश्मीर घाटी और जम्मू-लद्दाख अलग-अलग हैं....कोई शक़!

(वीना पत्रकार, व्यंग्यकार और फ़िल्मकार हैं)

 








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