लोकतंत्र में सेवा और सत्ता के बीच का संघर्ष

आड़ा-तिरछा , , बुधवार , 21-03-2018


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संदीप जोशी

नई दिल्ली। जब समाज और उसके नेताओं में नैतिकता का संकट गहराता है तो अदालत का रास्ता ही एकमात्र विकल्प रहता है। अदालत के भरोसे जब सत्ता चलती है तो लोकतंत्र पर भी सवाल खड़े होते हैं। दिल्ली का सत्ता संकट इतना गहरा गया है कि जनता द्वारा मनोनीत नेता और नियुक्त प्रशासनिक अफसर अदालत पहुंच गए हैं। मनोनीत नेता और नियुक्त अफसर दोनों ही सत्ता के गलियारे में सेवा से भटक गए हैं। केन्द्र सरकार इसमें दो बिल्लियों और एक बंदर की कहानी से अपने को खुशकिस्मत समझ रही है। या बिल्लियों में बंदर बना रहना चाहती है। लेकिन जनता न बंदर है और न ही बिल्ली। वो अपने समय पर तराजू से स्थिति तौलना जानती है।  

लोकतंत्र में जनता ही सत्ता देती है। नेताआें को सत्ता की आकांक्षा चुनाव से पहले होती है। चुनाव जीतने और सत्ता पाने के बाद ही सरकार चलाने का असल संघर्ष चलता है। संघर्ष उसी जनता की सेवा करने के लिए मिलता है जो सत्ता सौंपती है। यह लोकतंत्र का सीधा-सादा समीकरण और राजनीति का गूढ़ गणित भी है।

सेवा के लिए मिली सत्ता का आप क्या करते हैं इसकी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व आप पर ही होता है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता मिलने का मुख्य उदेश्य सेवा ही होता है। सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी दिल्ली में सेवा की इच्छाशक्ति और सत्ता की आकांक्षा का संघर्ष चल रहा है।

दिल्ली सत्ता के जिस संघर्ष से जूझ रही है वह अपना सेवा भटकाव और अपनी राजनीतिक मंशा का भी हाल बताता है। दिल्ली में ‘आप’ सरकार का संघर्ष प्रशासनिक अफसरों से बेहया चल रहा है। सेवा का उत्तरदायित्व तो दोनों पर ही है। लेकिन मुख्य तौर पर सेवा की जगह सत्ता का ही संघर्ष आज देखा जा सकता है। सेवा के लिए मनोनीत नेताओं का और सरकार चलाने के लिए नियुक्त अफसरों का अदालत जाना जनता के साथ धोखाधड़ी है। न्याय देने के लिए जूझती अदालत का समय भी बरबाद होता है। केन्द्र सरकार इसी अदालती यज्ञ में घी डालने का काम भी सत्ता के लिए ही कर रही है। 

उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने माना कि पुलिस विधायकों और अफसरों के बीच मुख्यमंत्री निवास पर हुई हाथापायी की जांच चल रही है। अदालत उस जांच का इंतजार करेगी। लेकिन न्यायालय ने यह भी माना कि मनोनीत नेता और नियुक्त अफसरों के बीच सत्ता संघर्ष दुर्भाग्यपूर्ण है। लोकतंत्र को ताक पर रख दिया गया है। 

दिल्ली की चुनी गई ‘आप’ सरकार ने जो भी जनता के लिए सेवाकार्य किए हैं उसका हिसाब तो अगले चुनाव में जनता ही करेगी। क्योंकि काम तो जमीन पर होते हैं इसलिए अदालत जाना तीर्थ जाना तो नहीं है। लेकिन आज तो गम्भीर स्थिति बनी हुई है। आखिर सेवा के लिए मनोनीत लोग सत्ता का संघर्ष कैसे कर सकते हैं? और सेवा के लिए नियुक्त अफसर सत्ता की आकांक्षा कैसे रख सकते हैं? वहीं अदालत न तो सरकार चलाने के लिए है और न ही सेवा करने की स्थिति में कभी आ सकती है। फिर ऐसी राजनीति को कौन और क्यों बढ़ावा दे रहा है? इसको सत्ता की अति आकांक्षा कहें या फिर सेवा करने का लोकतांत्रिक निरादर मानें? दोनों ही स्थिति में चैराहे पर खड़ी जनता को ही अधर में देखा जा सकता है। अब ऐसी स्थिति में बेचारी जनता क्या करे?

लोकतंत्र का सबसे बड़ा खतरा तो नाकाम और कमजोर विपक्ष है। वहीं सत्ता पक्ष के सर्वाधिकार से भी लोकतंत्र को खतरा रहता है। राजधानी के इस महाभारतीय सत्तायुद्ध से जो सबसे हताहत और हैरान है वह है दिल्ली की आम जनता। बेशक दिल्ली और देश में सार्थक विकल्प अभी नहीं दिख रहा है लेकिन चुनावों में ही जनता नए विकल्प खड़े करती है। इस संघर्ष पर भी जनता अपना मत रखेगी।     

अण्णा हजारे ने 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकप्रिय आंदोलन किया था। उसी में से ‘आप’ निकली थी। जनता ने ‘आप’ को सरमाथे लिया और अभूतपूर्व जनमत देकर सेवा करने के लिए दिल्ली की सत्ता सौंपी। केन्द्र में जनमत पायी भाजपा सरकार को शुरू से ही दिल्ली का जनमत खटकता रहा है। ‘आप’ के जमीनी काम आज दिख नहीं रहे हैं। या कहें तो दिखाए नहीं जा रहे हैं। मगर ‘आप’ की औपचारिक व्यवहार कुशलता पर लगातार सवाल व संकट खड़े होते रहे हैं। प्रशासनिक औपचारिकता लोकतंत्र की व्यवहारिक व्यवस्था है। जिसको नजरंदाज करना लोकतंत्र का विरोध है। 

‘आप’ आज ‘माफी-मोड’ में चल रही है। सभी अदालती पचड़ों से अलग हटना चाहती है। देर से तो बेशक आए, लेकिन दुरस्त जरूर आए। भाजपा को जिस अण्णा आंदोलन का राजनीतिक लाभ मिला था उसी का सीधा लाभ दिल्ली में ‘आप’ को भी मिला था। जनता की राजनीतिक समझ को मनोनीत और नियुक्त लोगों ने सरेआम ललकारा है। अण्णा हजारे ने फिर 23 मार्च से आंदोलन करने का एलान किया है। इस बार कारण लोकपाल और लोकायुक्त कानून के वादे की नजरंदाजी रहेगी। 

क्या इस बार दिल्ली के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री अण्णा आंदोलन के साथ होंगे, देखना दिलचस्प होगा। दिल्ली और देश का संघर्ष क्या सेवा के लिए है या महज़ सत्ता के लिए? यह जनता फिर से समझाएगी।                                 

         (समाज,राजनीति और खेल पर लगातार लिखने वाले संदीप जोशी रणजी क्रिकेटर रहे हैं।) 

 










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