श्रीलंका के टोनी ने लड़ी भारत के आजादी की जंग

हमारे नायक , , रविवार , 03-09-2017


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मसऊद अख्तर

एंथोनी पिल्लै एस.सी.सी.
(1914-2000)
एस.सी.सी. एन्थोनी पिल्लै, जिन्हें उनके साथी टोनी कहकर बुलाते थे का जन्म तत्कालीन सीलोन के जाफना, श्रीलंका में 27 अप्रैल 1914 को हुआ। उनके पिता एस. एन्थोनी पिल्लै थे। एस.सी.सी. उनके नाम सेबेस्टियन सायरिल कांस्टेन का संक्षेप है। उनका परिवार कैथोलिक ईसाई परिवार था। उनके पूर्वज तमिलनाडु के थिरुनलवेली से थे और श्रीलंका में बस गए थे। उनके पिता चाहते थे कि टोनी इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त कर एक नौकरशाह के रूप में वापस आयें। परन्तु उनकी माता की इच्छा उन्हें पादरी बनाने की थी। संत पैट्रिक हाई स्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने सीलोन यूनिवर्सिटी कॉलेज में इतिहास में दखिला लिया परन्तु बाद में वे लन्दन स्थित किंग्स कॉलेज में पढ़ने चले गए। तथा वहां से अर्थ शास्त्र में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। उस दौरान वह लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र के प्रख्यात प्रध्यापकों का व्याख्यान सुना करते थे। वे वहां लीग ऑफ़ इंडिया और साथ ही सीलोन के छात्रों के मार्क्सवादी अध्ययन समूह के सदस्य बन गए। धीरे-धीरे उनका झुकाव समाजवाद की ओर हो गया और थोड़े समय पश्चात 1938 में श्रीलंका लौटने तक वह पक्के समाजवादी हो गए थे।
श्रीलंका में भी लड़े लड़ाई
इंडिया लीग के सदस्य होने के नाते वह श्रीलंका में उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन से जुड़े जिसकी शुरुआत फिलिप गुणवर्धने ने की थी, जिनके भाई रॉबर्ट बाद में चलकर एंथोनी पिल्लै के काफी करीबी मित्र बन गए। रॉबर्ट की बहन कैरोलिन भी अपने भाई के साथ राजनीतिक गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया करती थीं। इससे टोनी व कैरोलिन को साथ साथ काम करने क अवसर मिला और बाद में टोनी ने कैरोलिन से विवाह कर लिया। यद्यपि उस समय टोनी की अधिकतर गतिविधियाँ राजनीतिक थीं लेकिन साथ ही साथ वह ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में भी हिस्सा लिया करते थे। विशेषकर कोलम्बो बंदरगाह पर कम करने वाले कर्मचारियों के बीच।
जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, टोनी गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गये। भूमिगत जीवन के दौरान वह बर्बर नाटन ब्रिज हाइड्रोइलेक्ट्रिक सिस्टम के कर्मचारियों को हड़ताल के लिए लामबंद करते रहे। इन गतिविधियों से उनकी प्रसिद्धि विशेषकर कर्मचारियों के बीच काफी बढ़ गई। अतः सीलोन सरकर ने त्रस्त होकर टोनी के बारे में जानकारी देने वाले को 10,000 रूपये क इनाम घोषित कर दिया।
जब जेल से कैदियों को छुड़ाया
उन्होंने अपने सहयोगियों को जो जेल में बंद थे, सुरक्षित छुड़ाने की एक विस्तृत योजना तैयार की। उनकी योजना पूर्ण सफल रही और वे और उनके सहकर्मी मछली पकड़ने वाली नौका से सुरक्षित भारत आ गए। भारत आने के पश्चात उनके साथी विभिन्न केन्द्रों पर अलग अलग चले गए और टोनी मदुरै तमिलनाडु में रुक गए। सन 1942 में जब भारत छोड़ो आन्दोलन की वजह से उनके भारतीय साथी भूमिगत हो गए तो 1942 के अंत में टोनी मद्रास में रह गए और उन्होंने इसे ही अपना मुख्यालय व कार्यक्षेत्र बनाया। वह बोल्शेविक लेनिनिस्ट पार्टी से जुड़ गए और छात्रों मजदूरों आदि के बीच पर्चे बांटना शुरू कर दिया। परिणामतः वह पुलिस द्वारा सन 1940 में गिरफ्तार कर लिए गए। फिर अलीपुर जेल में विचाराधीन कैदी के रूप में भेज दिए गए। वह 1946 में वहां से रिहा हुए।
टोनी पहले से ही ट्रेड यूनियन गतिविधियों में दिलचस्पी रखते थे। उनके परामर्शदाता ‘मद्रास लेबर यूनियन’ जो भारत की सबसे पुरानी ट्रेड यूनियनों में से एक थी, के साथ जुड़े तमिल विद्वान और ट्रेड यूनियन लीडर कल्याण सुन्दरम थे। इस यूनियन के सदस्यों ने बकिंघम और कार्नेटिक मिल्स के मजदूरों को आकर्षित किया। 1946 से टोनी का प्राथमिक कार्य ट्रेड यूनियन हो गई और राजनीति द्वितीय। अनायास उनके मद्रास मजदूर यूनियन से जुड़ते ही यूनियन हड़ताल पर चली गयी। 45 दिन की यह हड़ताल ऐतिहासिक रही और वह टोनी के गुणों, कार्यकुशलता व साहसी नेतृत्व का ही परिणाम थी। प्रबंधन द्वारा मजदूरों को प्रताड़ित करने का हर संभव प्रयास किया। लेकिन टोनी के सफल नेतृत्व की वजह से मजदूरों की हड़ताल पर असर नहीं पड़ा। परिणामस्वरूप इस हड़ताल के पश्चात मद्रास मजदूर यूनियन ने बकिंघम और कार्नेटिक मिल्स में 100 प्रतिशत सदस्यता (14,500) सुनिश्चित करने में सफालता पा ली। इस यूनियन के अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान उन्होंने मजदूरों को बहुत से लाभ दिलवाने में सफलता प्राप्त की और इन मजदूरों ने भारत में टेक्सटाइल मजदूरों के रूप में सबसे ज्यादा पारिश्रमिक पाने का सम्मान प्राप्त किया।
जब एंटनी को भेजा गया श्रीलंका
1947 में आर्थिक मांगों के आवेश ने राजनीतिक मोड़ ले लिया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मद्रास में टोनी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर उनके उत्पीड़न की सभी विधियों का प्रयोग किया। उस समय टोनी को आंध्र प्रदेश स्थित राजमुंदरी जेल में डाल दिया गया। कुछ समय पश्चात उन्हें पुलिस की सुरक्षा में राजमुंदरी से मद्रास ले जाया गया और वहाँ धनुषकोड़ी नामक स्थान पर ले जाकर श्रीलंका जाने वाले जहाज में चढ़ा दिया गया। श्रीलंका पहुँचने के पश्चात टोनी जी ने इस आधार पर चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र प्राप्त कर लिया कि उन्हें बम्बई जाकर ह्रदय सम्बन्धी बीमारी का इलाज कराना है और इस तरह वह बम्बई आ गए। बम्बई से वह मद्रास जाने में सफल रहे और वहाँ वह कुछ समय तक मिल मजदूरों के घर में रहे। परन्तु एक अवसर पर जब वे मजदूरों को संबोधित कर रहे थे उन्हें बंदी बना लिया गया और वेल्लूर केन्द्रीय करागार भेज दिया गया। यहाँ से वे 15 अगस्त 1947 को देश के आजाद होने के बाद ही अन्य लोगों के साथ जेल से रिहा हुए।
पार्षद बनने से हुई शुरुआत
वर्ष 1948 में ‘मद्रास लेबर यूनियन’ के आग्रह पर वह नगर निगम के चुनव में खड़े हुए और पार्षद चुन लिए गए। 1952 में वह तमिलनाडु विधानसभा के सदस्य चुने गए। इसी समय महंगाई भत्ते की गणना की पद्धति का पुनरीक्षण करवाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनके इस योगदान की तमिलनाडू के तत्कालीन मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी ने बहुत प्रशंसा की। वर्ष 1957 में वह संसद सदस्य चुने गए। समाजवादी पार्टी का विघटन होने पर वह तमिल नेशनल पार्टी में शामिल हो गए। तथा वर्ष 1964 में इस पार्टी का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय होने के बाद कांग्रेस पार्टी में आ गए। तत्पश्चात वह तमिलनाडु राज्य कांग्रेस में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेकिन उन्होंने कभी भी अपने राजनितिक प्रभावों से अपनी ट्रेड यूनियन गतिविधियों को प्रभावित नहीं होने दिया। टोनी मद्रास लेबर यूनियन के अध्यक्ष होने के साथ-साथ विभिन्न अवसरों पर 200 से अधिक स्थानीय, क्षेत्रीय व राज्यस्तरीय यूनियनों के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
इन यूनियनों में से अधिकतर ऐसे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती थीं जो कि असंगठित क्षेत्र के थे, तथा उन्होंने इन यूनियनों के माध्यम से मजदूरों के लिए काफी कार्य किया। ट्रेड यूनियन के क्षेत्र में उनका दृष्टिकोण प्रत्यक्ष मध्यस्थता के माध्यम से समस्याओं के निराकरण का था।
कई सामाजिक गतिविधियों में हुए शरीक
लगभग 40 वर्षों तक टोनी जी की गतिविधियों का मुख्य क्षेत्र मद्रास पोर्ट व डॉक मजदूर व उनसे जुड़ी समस्याएं रहीं। इस कार्यकाल के दौरान मजदूरों को अनेक लाभ दिलाने के साथ-साथ पोर्ट की कार्यक्षमता में सुधार लाने के लिए भी उन्होंने अनेक उपाय किये। वर्ष 1952 में वह मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के ट्रस्टी चुने गए। इसके बाद लगभग 40 से अधिक वर्षों तक वह इस पद पर रहे। वह देश के उत्पादकता आन्दोलन के प्रणेताओं में से एक थे। वह राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के संस्थापक सदस्यों में से एक थे तथा इससे जुड़ाव के नाते जो ज्ञान व अनुभव उन्होंने अर्जित किया उसका इस्तेमाल वह अपनी यूनियन व उद्योग से जुड़ी गतिविधियों में किया करते थे।
कई पुरस्कार से नवाजे गए टोनी
श्रम व उद्योग के क्षेत्र में उनकी सेवाओं के मान्यता स्वरूप उन्हें बहुत से पुरस्कार दिए गए। उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरूप मद्रास पोर्ट ट्रस्ट कर्मचारी संघ ने लगातार काफी शक्ति हासिल की। टोनी जी स्थापना काल से ही अखिल भारतीय पोर्ट व डॉक कर्मचारी परिसंघ से संबद्ध थे और इसकी गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया करते थे। वर्ष 1948 में बनी हिन्द मजदूर सभा के संस्थपक सदस्यों में से टोनी भी एक थे। वह 1952 में बम्बई में सम्पन्न हिन्द मजदूर सभा के तीसरे सम्मेलन में इसके उपाध्यक्ष तथा 1957 में बंग्लौर में संपन्न छठे सम्मेलन में अध्यक्ष चुने गए।
इसके बाद वह 1960 से लेकर 1997 के बीच लम्बे अन्तराल तक एक दो अवसरों को छोड़कर एच.एम.एस के विभिन्न सम्मेलनों के दौरान इस विशाल अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन के उपाध्यक्ष चुने जाते रहे। टोनी जी मात्र एक श्रमिक नेता न होकर उच्च कोटि के बुद्धिजीवी व विचारक भी थे। उनके कठोर परिश्रम व अध्ययनशील स्वभाव ने ट्रेड यूनियन और उद्योग दोनों को बढ़ावा देने में सहयोग दिया तथा वह जीवन पर्यंत मजदूर आन्दोलन और उद्योग को सशक्त बनाने के लिए प्रयत्नशील रहे। उनका निधन 16 अगस्त 2000 को हुआ।










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