अरुंधति रॉय :अपार ख़ुशी का घराना और बेपनाह शादमानी की ममलिकत

नई किताब , , रविवार , 03-02-2019


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प्रदीप सिंह

नई दिल्ली। “मैं जो चीज कहना जरूरी समझती हूं, उसे लिखती हूं। अपने उपन्यासों को लिखने के क्रम में मैं रिसर्च नहीं करती बल्कि पात्रों को जीती हूं। नक्सलियों पर लिखने के लिए मैं बस्तर गई। उनके बीच में रही। उस दौरान हमने यह देखा कि जब एक माओवादी कहीं निकल रहा है,लोग उसे विदा कर रहे हैं तो यह पता नहीं होता था कि फिर मुलाकात होगी कि नहीं। उस दौरान मैं उन लोगों के मन में उठने वाले भावों को अनुभव करने और पढ़ने की कोशिश कर रही थी। इस तरह के अनुभव से गुजरने के बाद ही किसी पर प्रामाणिक रूप से लिखा जा सकता है। इसीलिए मेरा दूसरा उपन्यास आने में इतना वक्त लगा” प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय ने अपने रचनाक्रम के बारे में यह बताया। ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैप्पिनेस’ की उर्दू अनुवादक अर्जुमंद आरा ने कहा, "जब वह इस उपन्यास का अनुवाद कर रही थीं तो उसमें मुस्लिम समाज की कई परंपराओं और रवायतों का जिक्र था, जिसे किसी गैर मुस्लिम के लिए समझना आसान नहीं था। ऐसे में जब हमने अरुंधति से पूछा कि आप ने यह रिसर्च कहां औऱ कितने समय में किया है तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि मैंने रिसर्च नहीं किया,जिया है।" 

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के मल्टीपर्पज हॉल में ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैप्पिनेस’ के हिन्दी संस्करण ‘अपार ख़ुशी का घराना’ और उर्दू संस्करण ‘बेपनाह शादमानी की ममलिकत’ पर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। जिसमें उपन्यास की लेखिका अरुंधति रॉय के साथ ही इस उपन्यास का हिंदी में अनुवाद करने वाले मंगलेश डबराल और उर्दू अनुवादक अर्जुमंद आरा से बातचीत किया गया। जिसमें लेखिका अरुंधति ने उपन्यास के लेखन प्रक्रिया से लेकर उसके कथ्य,शिल्प और पात्रों तक पर विस्तार से चर्चा की। उपन्यास के पात्रों और उसके बनावट पर आलोचक संजीव कुमार और आशुतोष कुमार ने अरुंधति से बातचीत की। इस अवसर पर उपन्यास के दोनों, हिंदी और उर्दू अनुवादों के एक-एक चुनिंदा अंश का पाठ भी किया गया।

इस अवसर पर आलोचक संजीव कुमार ने कहा-

“अरुंधति रॉय के अंग्रेजी उपन्यास ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैप्पिनेस’ का हिन्दी अनुवाद ‘अपार ख़ुशी का घराना’ अभी-अभी पढ़ कर खत्माया है। फिलहाल इतना ही कि मंगलेश जी का अनुवाद पढ़कर ईर्ष्या-दग्ध हूं। कहीं से नहीं लगा कि एक अनुवाद पढ़ रहा हूं। इतनी सधी हुई कथा-भाषा के लिए जितना श्रेय अरुंधति को देना बनता है, उतना ही मंगलेश जी को भी। मंगलेश जी से मैं कविता में तो ईर्ष्या कर नहीं सकता, क्योंकि चाह कर भी मैं उतना अच्छी कविता नहीं लिख सकता।”  

आशुतोष कुमार ने लेखिका से सवाल किया कि आप इतनी अच्छी हिंदी बोलने के बावजूद हिंदी में क्यों नहीं लिखती। जहां तक मातृभाषा की बात है तो आपकी मातृभाषा तो मलयाली है?

अरुंधति ने कहा कि मेरी एक नहीं कई मातृभाषाएं है। मेरे पिता बंगाली तो मां केरल की हैं। मलयालम और बंगला जैसे कई भाषाओं में मेरी शिक्षा हुई।   

'द मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैप्पिनेस' अरुंधति राय का दूसरा उपन्यास है। पहले उपन्यास 'द गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स' के लिए बुकर पुरस्कार जीतने वाली अरुंधति का 20 साल बाद दूसरा उपन्यास आया है। 

‘अपार ख़ुशी का घराना’ में भारतीय उप-महद्वीप से जुड़ी सम-सामयिक कहानियों का समावेश है। इसमें कई पात्रों के जीवन के बारे में विस्तार से बताया गया है- “एक साथ दुखती हुई प्रेम-कथा और असंदिग्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है। उसे फुसफुसाहटों में, चीखों में, आंसुओं के जरिए और कभी-कभी हंसी-मजाक के साथ कहा गया है। उसके नायक वे लोग हैं, जिन्हें उस दुनिया ने तोड़ डाला है, जिसमें वे रहते हैं और फिर प्रेम और उम्मीद के बल पर बचे हुए रहते हैं। प्रत्येक पात्र सुरक्षित जगह, अर्थ और प्यार की तलाश में है”। अरुंधति उपन्यास के पात्रों को 'पागल आत्माएं' बताती हैं, “पुरानी दिल्ली के बाहरी इलाके में मौजूद एक कब्रगाह का निवासी, फ़ुटपाथ पर रहने वाली एक बच्ची, अपनी मृत बेटी को पत्र लिखने वाला शोकाकुल पिता, अपने अपार्टमेंट में पुरानी नोटबुक्स को पढ़ते रहने वाली एक अकेली महिला और एक गेस्ट हाउस में रहने वाली दंपत्ति शामिल हैं”।  

अरुंधति राय ने 21 वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद उपन्यास के आने पर अपने विचार रखते हुए कहा, “1997 में ‘गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ पुस्तक के 2-3 महीने बाद तत्कालीन भाजपा सरकार ने परमाणु परीक्षण किया था और मैं इसके विरोध में थी। तब मुझे परमाणु शक्ति के विरोध का प्रतिरूप बना दिया गया था। उस समय मैंने यह निश्चय कर दिया था कि जब मुझे कुछ कहना होगा, तब लिखूंगी।”

डबराल ने अनुवाद के समय के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “इस उपन्यास के शीर्षक के लिए काफी कश्मकश थी ‘महकमा’ ‘मंत्रालय’ आदि शब्दों के बाद अरुंधति के कहने पर ‘घराना’ पर मुहर लगी”।  


 










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