हिंदू महिलाओं का शोषण क्यों नहीं बन रहा एजेंडा?

विवाद , नई दिल्ली , मंगलवार , 29-08-2017


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शीबा असलम फहमी

शीबा असलम फहमी (इस मजमून की लेखिका), जकिया सोमन, नूरजहां सफिअ निआज, नाइश हसन आदि महिलाओं को अब सोचना चाहिए की जो मीडिया, प्रगतिशील समाज और नारीवादी, मुसलमान महिला को न्याय दिलाने की लड़ाई बिना थके लड़ रहे हैं और मुसलमानों से ज्यादा लड़ रहे हैं, वही लोग बलात्कार और कत्ल जैसे जघन्य अपराधों की शिकार हिन्दू महिलाओं से रत्ती भर हमदर्दी क्यों नहीं करते ? हिन्दू मीडिया मालिक, हिन्दू चैनल हेड, हिन्दू एंकर आखिर हिन्दू महिलाओं के खिलाफ क्यों हैं ? इन्हें पूरे भारतीय समाज में सेहतमंद बदलाव क्यों नहीं चाहिए? सिर्फ मुस्लिम समाज में ही सब परफेक्ट क्यों चाहिए?

  महिला के साथ आसाराम

दुराचारी संतों पर गला दबा के बोलती मीडिया

स्वामी नित्यानंद, बाबा सारथी, संत रामपाल, आसाराम, बाबा गुरमीत या फिर किसी छोटे-मोटे बाबा-योगी द्वारा हिन्दू बेटियों से धर्म के नाम पर बलात्कार की एक लम्बी आपराधिक परंपरा चली आ रही है इसके बावजूद इस पर मीडिया आंदोलित नहीं होता। आजतक कभी भी मैंने ऐसी रिपोर्टिंग नहीं देखी जिसमें लगातार हिन्दू बाबा-साधुओं-संतो की वासना और अपराधों पर जेंडर के एंगल से स्टोरी या रिपोर्टिंग की गयी हो। उन पर सैद्धांतिक कुठाराघात किया गया हो। उनके मठ, आश्रम, केंद्र, डेरों, गुफाओं पर, हमेशा भांडा फूटने, जग हंसाई होने, विदेशों में रिपोर्टिंग होने, मुकदमा दर्ज होने, फैसला तक आ जाने के दबाव में ही रिपोर्टिंग होती है जिसमें आईपीसी के कानूनी दायरे में बात की जाती है। बलात्कारी गुरमीत ने अगर हिंसा का तांडव न करवाया होता तो मीडिया चुप ही था 12 सालों से। यही हाल आसाराम बापू और संत रामपाल की गिरफ्तारी पर हुआ।

सवाल ये है कि महिला-पुरुष दोनों की मौजूदगी से भरे इन धार्मिक केंद्रों पर विशाखा गाइड लाइन के तहत यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए कमेटी बनाने की आदर्श व्यवस्था पर सरकार, महिला आयोग, मीडिया और न्यायालय ऐसी चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इन केंद्रों को सेक्सुअल हरस्मेंट ऑफ वीमेन एक्ट वर्कप्लेस एक्ट 2013’ के दायरे में लाने की मांग क्यों नहीं हो रही है? हिन्दू धार्मिक नेताओं की वासना और व्यभिचार की शिकार महिलाएं तब तक मीडिया में और बृहत हिन्दू समाज में न्याय नहीं पातीं जब तक कोई व्हिसल-ब्लोअर, रिश्तेदार, पत्रकार की जान नहीं चली जाती। तब भी ये जरूरी है की वासना की शिकार महिला दलित या आदिवासी न हो वरना भंवरी देवी, सोनी सोरी जैसा फैसला आता है। होना तो ये चाहिए था कि जिस तरह त्वरित तीन तलाक को जड़ से खत्म करने की मुहिम मीडिया ने चलाई, बार-बार न्यायालय ने फैसले दिए, चुनाव घोषणापत्र में इसको मुद्दा बनाया गया वैसा ही आंदोलन इन मठों के खिलाफ खड़ा होता।

महिलाओं से घिरे गुरमीत राम रहीम सिंह

हिन्दू महिलाओं की कौन करेगा फिक्र 

हिन्दू महिलाओं के अपराधी जब तक हिन्दू पुरुष हैं, हिन्दू बलात्कारी योगी-बाबा -संत हैं, हिन्दू भगोड़े पति-पुत्र हैं, तब तक मीडिया इन अपराधों को छुपाता है। हिन्दू विधवा आश्रमों, डेरों, गुफाओं में वासना का अंधा कुआं कितनी महिलाओं की आत्मा को कत्ल कर चुका है इसका कोई हिसाब नहीं है। लेकिन मजाल है की इस जगजाहिर अन्याय और अत्याचार पर इन धार्मिक लोगों को घेरा जाए।

त्वरित तीन तलाक की पीड़ित बुर्कापोश मुसलमान महिला की त्रासदी दर्शाने के लिए कितने तरह तरह के प्रभावशाली ग्राफिक, नाट्य -रूपांतर, और क्रिएटिव यही मीडिया तैयार करता है, लेकिन धर्म बदल कर बहु विवाह करने वाले चंद्रमोहन-धर्मेंद्र जैसे अनगिनत हिन्दू पतियों, हिन्दू भगोड़े पतियों, बिना शादी के रखैल रखनेवाले नारायण दत्त तिवारी जैसे अनगिनत अय्याश नेताओं, प्रोफेसरों, बुद्धिजीवी मर्दों, नाजायज औलादों के हक मारने वाले पिताओं, विधवा-आश्रमों को आबाद रखने वाले बेटों, बलात्कारी योगी-संत-बाबा और इन सब पर चुप रहने वाली हिन्दू धर्म व्यवस्था पर मीडिया वैसा कुठाराघात क्यों नहीं करता ? जैसा कुठाराघात वो संबित पात्रा, राकेश सिन्हा और बंसल से इस्लाम पर करवाता है तीन तलाक और बहुविवाह पर ? बाबाओं पर सिर्फ सियासी बहस और मुस्लिम समाज पर सैद्धांतिक बहस ? हिन्दू लड़कियों के अधिकार, इज्जत, बराबरी जैसे मुद्दे कहां हैं ?

हिन्दू लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए भारतीय मीडिया तभी आगे आता है जब अपनी मर्जी से किसी हदिया या करीना कपूर पीड़िताने मुसलमान मर्द से प्रेम विवाह किया हो। आखिर हिन्दू मर्दों की शिकार हिन्दू महिलाओं पर कौन फिक्र करेगा? मौलाना या चाइना ?

समाज को सुधार चाहिये या तबाही

सुधार के लिए संघर्ष जरूरी

इस बीच ये भी रेखांकित करने की जरुरत है की मुस्लिम बुनियाद परस्ती पर जब भी भारतीय न्यायालय हमला करता है, मौलानाओं ने उस पर मौखिक या लोकतान्त्रिक विरोध ही जताया है, जबकि बाबरी मस्जिद गिराए जाने से ले कर, बाबा गुरमीत के बलात्कारों पर फैसले तक, हिन्दू धार्मिक अराजकता किस-किस तरह से सड़कों पर तांडव करती रही है ये किसी से छुपा नहीं है। ऐसे में अब ये जरूरी है कि हम मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट इस मीडिया और समाज की चुनिंदा संवेदनशीलता-प्रगतिशीलता को समझें जो सिर्फ मुसलमान मर्द को नीचा दिखाने के लिए ही उभरती है। एक खास तरह से मुस्लिम महिला का दर्द उभारने की ये कला हकीकत में इस्लाम और आम मुसलमान मर्द के प्रति समाज में एक घिन्न पैदा कराने के लिए है क्या? जिसका भयानक नतीजा सड़कों पर घेर-घेर कर मारे जा रहे बेकुसूर मुसलमान मर्द भुगत रहे हैं।

मुस्लिम समाज में हालात बेहतर होने चाहिए, घर के अंदर भी, बाहर भी, जिसकी कोशिश हम सब करें, लेकिन दोगलों को मौका दिए बगैर। आइये बातचीत करें, बैठकें करें, जिद्द करें और कानूनी लड़ाई भी लड़ें, मौलानाओं से भी और सरकारों से भी, लेकिन इस लिहाज के साथ की सुधार के बजाय तबाही न आ जाए।

(शीबा असलम फहमी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और स्वतंत्र लेखन करती हैं।)

 










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m.iliyas ali :: - 08-12-2018