अपनी-अपनी अगस्त क्रांति

विशेष , भारत छोड़ो आंदोलन, बृहस्पतिवार , 17-08-2017


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उपेंद्र चौधरी

इतिहास में सबकी अपनी-अपनी भूमिका होती है और यह भूमिका संगठन विशेष या व्यक्ति विशेष के तात्कालिक या दीर्घकालिक दृष्टिकोण से तय होती है। अगर आप तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, तो कम्युनिस्ट पार्टी भी आपको देशद्रोही नज़र आयेगी, मगर जब आप उस समय की वैश्विक परिघटना की परतें उघारेंगे तो कम्युनिस्ट पार्टी की समझ की व्यापकता और इतिहास में उसकी भूमिका आपको तर्कसंगत दिखेगी। ऐसा इसलिए नहीं कि तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय इतिहास का लेखन साम्यवादी लेखकों ने किया है या फिर उनकी इतनी लेखकीय तानाशाही रही है कि बाक़ी की बोलती बंद हो जाती है।

आज़ादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी व अन्य। साभार : गूगल

इतिहास दस्तावेज़ से तय होता है

आने वाली पीढ़ी के  लिए इतिहास दस्तावेज़ से तय होता है और दस्तावेज़ बड़ी ही साफ़गोई से कहते हैं कि दूसरा विश्वयुद्ध जब लड़ा जा रहा था, अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य बड़ा ही उलझा हुआ और संकटपूर्ण था। एक तरफ़ एशिया का सूरज और महाशक्ति की होड़ में शामिल एशियाई देश जापान, तानाशाह मुसोलिनी वाला देश इटली और कई बड़े देशों द्वारा तबाह हुआ और हिटलर जैसे क्रूर शासक को अपनी बागडोर इस ख़्याल से थमा देने वाला देश जर्मनी था कि पहले विश्वयुद्ध में तबाह हुआ जर्मनी न सिर्फ़ अपना पुनर्निर्माण कर लेगा, बल्कि एक बड़ी शक्ति होकर उभरेगा। दूसरी तरफ़ दो उपनिवेशवादी देश क्रमश: इंग्लैण्ड तथा फ़्रांस और एक अमेरिका से भी ऊंचे क़द को हासिल करने में लगा तथा अपने विचारों के साथ दुनिया भर में छा जाने की हसरत रखने वाला देश  यूएसएसआर यानी सोवियत संघ था।

दूसरा विश्वयुद्ध और 1942 की क्रांति

अगर आप दुनिया के एक बड़े हिस्से को ग़ुलाम बनाने वाले देश इंग्लैण्ड या फ़्रांस के साथ ख़ुद को पाते हैं, तो ज़ाहिर है कि आप दूसरे गुट में होंगे। लेकिन अगर दुनिया को तबाह करने की क़सम खाने वाले हिटलर के ग्रुप वाले देश के साथ हैं, तो स्वाभाविक है कि आप पहले गुट के समर्थक होंगे। दूसरा विश्वयुद्ध 1939-1945 के बीच लड़ा गया। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में अगस्त की 9वीं तारीख़ को छेड़ा गया। उसी ऐतिहासिक तारीख़ को, जिस दिन उत्तर प्रदेश के काकोरी में चलती हुई ट्रेन से क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश खज़ाना लूटा गया था। ऊपर बताये गये दोनों विचारों की जद्दोजहद 1942 की क्रांति में ‘भाग लेने वाले’ और ‘भाग नहीं लेने वालों’ के बीच थी। सबके अपने-अपने कारण थे और सबके अपने-अपने संभावित परिणाम की कल्पना थी।

भारत छोड़ो आंदोलन

मूल बात को आगे बढ़ाने से पहले थोड़ी सी बात भारत छोड़ो आंदोलन के व्यापक क्षेत्र और उसके व्यापक प्रभाव की। जिस गांधी ने 1922 में गोरखपुर के पास चौराचौरी में असहयोग आंदोलनकारियों द्वारा 23 पुलिसकर्मियों के जला देने के कारण किसी सहयोगी से बिना विचार-विमर्श किये उस समय तक के सबसे बड़े आंदोलन को वापस लेने की घोषणा कर दी थी। वही गांधी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में ‘करो या मरो’ का नारा देते हैं। ‘करो’ और ‘मरो’ दोनों ही आह्वान का इस्तेमाल आंदोलनकारियों ने अपने-अपने विवेक के मुताबिक़ अपने तरीक़ों से किया था। यह आंदोलन इतना व्यापक और असरदार था कि अंग्रेजों को बलिया जैसी जगह पर फिर से नियंत्रण पाने के लिए आंदोलनकारियों पर बमबारी तक करनी पड़ी थी। बलियामुंगेरमुजफ्फरपुरसताराकोल्हापुरतालचरतामलुकमुर्शिदाबाद आदि अनके जिलों पर तो आंदोलनकारियों ने कब्जा तक कर लिया था। ब्रिटिश दमन चक्र ख़ूब चला, तो आंदोलन भी भीषण रूप से हिंसक हो उठा । रेल पटरियां उखाड़ फेंकी गयींटेलीफोन के तार तहस नहस कर डाले गये और अनेक डाकखाने ध्वस्त कर डाले गये। कुल मिलाकर व्यापक पैमाने पर शासकीय संपत्ति को भारी क्षति हुई।

साभार

कम्युनिस्ट पार्टी और भारत छोड़ो आंदोलन

सोवियत संघ जिस गुट में शामिल था,उसका उद्देश्य नाज़ीवाद(हिटलर) और फ़ासीवाद(मुसोलिनी)  को समाप्त करते हुए पूरी दुनिया में उस साम्यवाद को लाना था,जिसका मानना था कि सर्वहारा की सत्ता पर काबिज होना ही असल में बराबरी वाले समाज की स्थापना की पहली  कड़ी है। ऐसे में स्वाभाविक था कि भारतीय साम्यवादी दल इस आन्दोलन से अपनी दूरी बढ़ाता। दूरी बढ़ाने का अर्थ साम्यावादी पार्टी का अंग्रेज़ों के साथ देने से निकाला जा सकता है। इस अर्थ के पसीने तब छूट जाते हैं, जब दस्तावेज़ बताते हैं कि 1942 के पहले मेरठ षड़यंत्र और कानपुर षड़यंत्र जैसे मुकदमों में साम्यवादियों को फंसाकर उनपर बेइंतहा ज़ुल्म ढाये गये। जब रातोंरात लगभग सभी कांग्रेसी नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। ऐसे में भारत छोड़ो आंदोलन की बागडोर उन सोशलिस्ट नेताओं ने मज़बूती से थाम ली, जिनमें से अनेक बाद के सालों में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। अगर आप किसी पाये में फिट होकर देखें तो संभव है कि आपको कम्युनिस्ट देशद्रोही दिखें, लेकिन अगर आपमें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की मंशा है, तो साफ़-साफ़ दिखेगा कि 1942 की क्रांति में भाग नहीं लेना कम्युनिस्ट पार्टी का एक दूरगामी और रणनीतिक फ़ैसला था।

मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना। साभार : गूगल

मुस्लिम लीग की भूमिका

मुस्लिम लीग ने भी 'भारत छोड़ो आन्दोलनमें अपनी हिस्सेदारी नहीं की थी। लीग ने आलोचना करते हुए कहा था, "आन्दोलन का लक्ष्य भारतीय स्वतन्त्रता नहीं, बल्कि भारत में हिन्दू साम्राज्य की स्थापना हैइस कारण यह आन्दोलन मुसलमानों के लिए घातक है।" अगर आप इसका अर्थ यह निकाल लें कि भारतीय मुसलमान भी देशद्रोही हैं, तो ऐतिहासिक संदर्भ में यह एक एक ग़लत आकलन होगा, क्योंकि मुस्लिम लीग भले ही मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करती रही हो, मगर उसके साथ कट्टर मुसलमान ज़रूर थे, मगर बड़ी संख्या वाले उदारवादी मुसलमान तो बिल्कुल ही नहीं थे। बाद में भारत छोड़ो आंदोलन की व्यापकता और इसमें मुसलमानों की संलग्नता को देखते हुए लीग ने एक प्रस्ताव पास किया, जिसमें कहा गया, ‘क्विट इंडिया,डिवाइड इंडिया’ यानी अंग्रेज़ों भारत तो छोड़ो,मगर इसका बंटवारा भी करते जाओ। लीग की इस मांग में जहां एक तरफ़ उसके भीतर अंग्रेज़ों को लेकर नफ़रत दिखती है,तो दूसरी तरफ़ अंग्रेज़ों द्वारा बोयी गयी ‘बांटो और राज करो’ की नीतियों वाली फ़सल के पक जाने का संकेत भी मिलता है।

उदारवादियों की सोच

सच बात तो यही है कि उदारवादियों को भी यह आन्दोलन नहीं भाया था। सर तेज़बहादुर सप्रू ने भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव को 'अविचारित तथा असामयिकबताया था। बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने भी उस प्रस्ताव को एक 'अनुत्तरदायित्व पूर्ण और पागलपन भरा कार्यबताया था।

हिन्दू महासभा का रोल

'हिन्दू महासभाएवं 'अकाली आन्दोलनने भी इसकी कड़ी आलोचना की थी। उपर्युक्त सभी शख्सियत और संगठनों ने भारत छोड़ो आंदोलन से अपनी दूरी बना ली थी।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ। (फाइल फोटो)

आरएसएस की भूमिका

आरएसएस की भूमिका को लेकर आम तौर पर बहस होती रहती है। सच बात तो यही है कि आरएसएस की दृष्टि कभी अंतर्राष्ट्रीय नहीं रही। उसका पूरा ज़ोर आंतरिक  मामलों पर ही रहा है। भारत छोड़ो आंदोलन के मामले में भी आरएसएस का रूख़ उसी आंतिरक मामले को लेकर तय हुआ था। इस संगठन को लेकर अंग्रेज़ी हुक़ूमत की जो टिप्पणी थी,उसे जानने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि भारत छोड़ो आंदोलन में आरएसएस कहां खड़ा था। आंदोलन शुरू होने के डेढ़ बरस बादब्रिटिश हुक़ूमत की बॉम्बे सरकार के एक मेमो में अत्यंत संतुष्टि भाव के साथ ज़िक्र किया गया, ‘संघ ने पूरी ईमानदारी के साथ ख़ुद को क़ानून के दायरे में रखा है, विशेष रूप से 1942 की अगस्त क्रांति में भड़की अशांति में उसने स्वयं को शामिल नहीं किया है।

ये ठीक है कि 1942 की क्रांति से आरएसएस ने स्वयं को अपने ही कारणों से दूर रखा, लेकिन अगस्त क्रांति को लेकर उसके कार्यकर्ताओं की भावना इस संगठन से अलग थी। आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं को इस क्रांति में भाग नहीं लेने की कोशिशों की नाकामी से बेहद हताश था। इस बारे में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख गोलवलकर ने स्वयं लिखा है,‘1942 में भी कार्यकताओं के दिलों में आंदोलन के प्रति गहरी भावना थीन सिर्फ़ संगठन के बाहर के लोगों नेबल्कि हमारे कई स्वयंसेवकों ने भी ऐसी बातें करनी शुरू कर दी थीं कि संघ निकम्मे लोगों का संगठन है,उनकी बातें किसी काम की नहीं हैं। वे काफ़ी हताश भी हो गए थे।

पूर्ण सफल नहीं हो सका आंदोलन

ग़ौरतलब है कि भारत छोड़ो आन्दोलनसंगठन तथा आयोजन की कमज़ोरियों, सरकारी सेवाओं में कार्यरत उच्च अधिकारियों (जिसमें हिन्दू मुसलमान सब शामिल थे) की वफ़ादारी  तथा आन्दोलनकारियों के पास साधन एवं शक्ति के अभाव में पूर्ण रूप में सफल नहीं हो सका। 

कई बार इतिहास जिस समय घट रहा होता है, उस समय के तात्कालिक नेतृत्व के सामने टकराहट मोल लेने या टकराहट को टालने के अनेक संदर्भ होते हैं। किसी घटना विशेष के परिणाम को लेकर इतिहास कभी अपना कोई संकेत नहीं देता, मगर उस परिणाम की व्याख्या आने वाली पीढ़ी अपने-अपने तरीक़े से करती है, नेतृत्व उन पीढ़ियों से अपनी तरह की व्याख्या करवा लेता है, लेकिन ज़रूरी है कि इतिहास की व्याख्या करते समय उसके उपकरणसाक्ष्य और दस्तावेज़ ही हों, लेकिन लक्ष्य हमेशा आम लोगों के हित और उनके भविष्य हों। इस संदर्भ में गांधी के उस कथन को याद रखना बेहद ज़रूरी हो जाता है कि अगर आप आगे देखते हैं, तो किसी भी व्यक्ति या संगठन के पहले के विचारों तथा बाद के विचारों में टकराहट बहुत स्वाभाविक है। परस्पर विरोधी या असंगत दिखते हुए भी बाद के विचार अक्सर ही पहले के विचार से  ज़्यादा परिपक्व होते हैं। ग़लतियां सुधारकर आगे बढ़ने में ख़तरे की कम गुंज़ाइश होती है, ग़लतियां नहीं सुधारकर आगे बढ़ने में कट्टरता और संकीर्णता के ख़तरे कहीं ज़्यादा होते हैं। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल स्वतंत्र रूप से लेखन कर रहे हैं।)










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