रेडियो पर सैकड़ों गीत गा चुके अजीज को नहीं मिल पायी उनकी जगह, गायिकी पर मुफलिसी पड़ी भारी

विशेष , रांची, शनिवार , 04-08-2018


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मो.असगर खान

“पोसल पालल बेटी कांदय जारो जार,  हो... . आजू मइया नईहर तो छुटथे, गुनी दिला टूटथे, तो नईहर तो छूटा थे ... . कोरा में खेलाली तोके बहिंए झूलाली, हो..., अपने नइ खायके खियाली, तो नईहर तो छुटथे,गुनी दिला टूटे थे, तो नईहर तो छूटा थे.”

नागपुरी के इस बोल में आज भी जब अजीज अंसारी की आवाज रांची के आकाशवाणी पर सुनाई देती है तो गांव कस्बों में ग्रामीणों की आंखें डबडबा आती हैं। सांतवीं पास 65 वर्षीय अजीज अंसारी नागपुरी गीतकार और गायक दोनों ही हैं जिन्होंने आज तक दूसरों के लिखे हुए गीत नहीं गाए हैं।  

अजीज अंसारी अपने लिखे इस बोल के बारे में बताते हैं, “ गीत में मां और बेटी के बीच सवाल-जवाब हो रहा है। बेटी विलाप करते हुए कह रही है कि आज मैं ससुराल चली जाऊंगी, और आज से ही मेरा मैके छूट जाएगा। इस पर मां कहती है कि पोस पाल के इतना बड़ा किया। अपना पेट काटकर तुम्हें खिलाया। आज तुम मेरी नजरों से दूर जा रही हो… .” अंसारी को इस गीत का ख्याल गांव की शादियों में रुख़सती यानी विदाई वाले क्षण को देखकर आया था। उन्होंने नागपुरी भाषा में इसी तरह के लगभग चार हजार सामाजिक गीत लिखे और गाए हैं।  

गॉड गिफ्टेड कहे जाने वाले अजीज अंसारी ने नागपुरी में गीत लिखना और गाना किसी से नहीं सीखा। गांव में पिता और दो भईयों के साथ जो मुफलिसी और गरीबी झेली-देखी उसे कलमबंद करते गए और हिंदी भाषा में नागपुरी बोल से फिजा में मिठास घोलते गए। इनके ठेठ और पौराणिक नागपुरी गीतों  में गांव का दर्द, मुसीबतें हैं, तो संस्कृति सुवास भी। सद्भाव के संदेश तो सामाजिक कुरीतियां पर व्यंग भी।

1998 में मिला रजिस्टर्ड लोक गायक का दर्जा

साथ में कई कार्यक्रम कर चुके शहाबुद्दीन अंसारी बताते हैं कि अजीज अंसारी ने झारखंड के गठन पर जो गीत लिखा और गया था उसकी चर्चा आज भी आकाशवाणी के कर्मचारियों के बीच होती है। “केतई सुंदर देश हमर झारखंड डेरा, जहां करयं ऋषि-मुनी सूफी संत फेरा। सुबरनखा( स्वर्ण रेखा) कोइल कारो संख नदी बहे। कोयला तांबा, चांदी, सोना, माटी हीरा, चांद सूरज आके पहले डाले जहां डेरा....।” इस गीत में उन्होंने राज्य की खनिज संपदा, आपसी सद्भाव, संस्कृति और क्रांति के संघर्ष को एक साथ समेटा है। यह गीत आज भी ऑल इंडिया रेडियो पर बजता है।

28 वर्ष की उम्र में ही अजीज की मधुर आवाज ने 80 के दशक में गांव से रेडियो-टीवी तक का सफर तय कर लिया। लोगों ने रेडियो पर उन्हें 36 रागों में उनके सैकड़ों सामाजिक गीत सुने। अजीज की इस प्रतिभा को देख भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 1998 में उन्हें रजिस्टर्ड लोक गायक का दर्जा दिया। लेकिन इनकी पहचान आज तक गांव के खपरैल घर की सीमा तक ही सिमटी रही। इस पर अजीज कहते हैं, “इतने के बावजूद भी मुझे राज्य सरकार का ईनाम उपेक्षा के अनुरुप नहीं मिला।

अजीज को मिला मानपत्र।

यही वजह रही कि मैंने 2012 के बाद रेडियो-टीवी पर गाने-बजाने को अलविदा कह दिया है।” झारखंडी लोक गायक अजीज अंसारी बीते कई सालों से रांची से 20 किलोमीटर दूर रांची जिले के रातू प्रखंड के हुरहुरी गांव अपने परिवार के साथ जिंदगी बसर कर रहे हैं। उन्हें इस बात का मलाल आज भी है कि सैकड़ों गीत गाने के बावजूद भी उन्हें पहचान नहीं मिल पाई।

पद्मश्री मुकुंद नायक भी हैं मुरीद

अजीज अंसारी की आवाज और उनकी सलाहियत के कायल पद्मश्री लोक गायक-नृत्यकार मुकुंद नायक और मधु मंसूरी जैसे लोकप्रिय कलाकार भी हैं। मुकुंद नायक, आजीज अंसारी को बेमिसाल बताते हैं। वोह कहते हैं, “उनके गाए नागपुरी गीतों पर आज भी गांव में लोग झूम उठते हैं। उनके साथ मैंने कई कार्यक्रम किया है जो मेरे जीवन का सुखद पल था।” वहीं अजीज अंसारी अपनी बात-चीत में बताते हैं कि मैं मुकुंद नायक से पहली बार 1987 में एक कार्यक्रम के दौरान मिला था।

“चढ़लय अषाढ़ सुदी सावन अवसरे... गुनी-गुनी सूखे चीर रहली निभोरे... ए साजन इसन समय पिया नखयं घरे...” मेरे गाए इस गीत की उन्होंने बहुत सरहाना की थी। इसके बाद से अक्सर उनसे रांची नागपुरी कला संगम में मुलाकात होने लगी। लेखक अश्विनी पंकज अजीज अंसारी के गीत सुनकर कहते हैं कि ये झारखंड के धरोहर हैं। महावीर नायक, मधु मंसूरी और आजीज अंसारी जैसे कलाकार वीडियो एलबम और नई टेक्नालॉजी के कारण सिमटते जा रहे हैं। इनके मीठे बोल को इतिहास के पन्नों में संजोए रखने की जरुरत है।

1983 में रेडियो में मिला ब्रेक

रांची कांके प्रखंड के गागी गांव के एक छोटे से घर में जब कभी वालिद गुलाम रसूल अंसारी लोगों के साथ गजल या शायरी पढ़ा करते, तब 13 साल के अजीज अंसारी उनकी जमात में शामिल हो जाते। उन्हें सुनकर उन पंक्तियों को दोहराने लगते। बचपन से ही गीत-संगीत की तरफ झुकाव देख पिता, अजीज को अक्सर कार्यक्रम में साथ ले जाते। बात 1972-74 की है और अब अजीज की उम्र करीब 17। वो शादी-विवाह में बजने वाले नागपुरी गीत पूरे मन से सुनते और गुनगुनाते। अजीज अपनी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं,  “उन्हें बचपन से ही नागपुरी गीत गाने और लिखने का काफी शौक था।

एक स्कूल में गीत गाते हुए अजीज।

एक बार बचपन में दोस्तों के साथ मुढमा मेले में गया तो वहां नागपुरी गीत की किताब को दुकानदार गा कर बेच रहा था। मन किया कि ढेर सारी किताबें खरीद लूं। लेकिन पास में एक किताब का भी पैसा नहीं था। उस दिन से मेरा मन नागपुरी गीतों की तरफ और मजबूती से माइल (खीचाअ) हो गया। इसके बाद से ही मन ही मन जैसे-तैसे अपने ही बोल बनाकर गाने लगा।”

अजीज के लिखने और गाने में धीरे-धीरे कुछ सुधार हुआ तो गांव में उनकी चर्चा होने लगी। अब वो गांव, स्कूल में बेहिचक गाते थे। एक बार गांव में नगड़ी हाई स्कूल के शिक्षक आए हुए थे, जिन्होंने अजीज को गाते सुन अपने स्कूली बच्चों को प्रशिक्षण देने का आमंत्रण दिया। अजीज अंसारी कहते हैं कि इसी शिक्षक की मदद से पहली बार इमरजेंसी में (1977) मैंने दो गीतों की किताब लिखी और इसकी 1000 कॉपी छपवाई। 17 रुपये के इस छपाई से मुझे पांच सौ रुपये की आमदनी हुई। नाम, शोहरत और पहचान अलग। हालांकि बाद में मैंने नागपुरी गीत पर एक किताब भी लिखी जो काफी लोकप्रिय हुई।

इन सबके बीच अजीज अंसारी को लोग लोक गायक के रुप में जानने लगे थे। अंसारी बताते हैं कि उसी दौरान नाटककार और गायक शहाबुद्दीन अंसारी से मेरी मुलाकात हुई और हम दोनों ने ऑल इंडिया रेडियो रांची में दरखास्त दिया। ऑडिशन के बाद हम लोगों का चयन हो गया। और इस तरह 1983 में मैंने पहली बार ऑल इंडिया रेडियो में अपना ही लिखा हुआ गीत गया। जिसके बोल थे... . “हाय रे हाय मिलते ऋण, सरकारी वीडियो ठिन देबय कागजदारी। मिलते सरकारी ऋण खेत में लगबय बिहिन मकई से मोरत बारी, गेंहू के लगबय केयारी केयारी... .”

(मो.असगर खान पेशे से पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं। ये लेख सबसे पहले "दि वायर" उर्दू में छपा था।)








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