बाबाओं को मात देते खद्दरधारी

हमारा समाज , नई दिल्ली, शनिवार , 02-09-2017


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अखिलेश अखिल

बाबाओं के व्यभिचार और उनकी अपराधचारिता से पूरा देश स्तब्ध है। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ हो गयी है कि बाबाओं का ये मुकाम बगैर सत्ता संरक्षण के संभव नहीं है। लिहाजा इस मामले में भी किसी और से पहले सत्ता में बैठे नेता ही जिम्मेदार हैं। उन नेताओं से भी क्या उम्मीद करना जिन्होंने अपने पेशे को नरक के पाताल में पहुंचाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इतिहास गवाह है राजनीति के नाम पर नेताओं ने महिला समाज के साथ जो अन्याय किया है उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। 

खद्दरधारियों का दागदार चेहरा

इस मामले में भी नेता बाबाओं से किसी भी तरीके से कम नहीं हैं। इन खद्दरधारियों के खुद के दामन महिला उत्पीड़न के दाग से दागदार हैं। बावजूद इसके कोई नेता कानून के शिकंजे में नहीं फंस पाता है। भला उन्हें दण्डित कौन करेगा? कभी-कभी तो लगता है कि देश की राजनीति ने लोकतंत्र को बंधक बना रखा है। इस लोकतंत्र में राजनीति करने वाली ऐसी  कौन सी पार्टी है जिसका कोई न कोई नेता यौन शोषण के अधम काम में लिप्त न हो। भारत शायद तनहा मुल्क हो जहां दुराचारी नेता भी बंपर वोटों से जीतते हैं। फिर मंत्री बनकर उन्हें देश चलाने की जिम्मेदारी भी मिल जाती है। यह अजीब विडंबना है कि समाज फिर उन्हीं से महिलाओं की बराबरी और उनके हकों को सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने की अपेक्षा करता है। क्या कोई शख्स अपने ही खिलाफ कानून बना सकता है?  

ग्लैमर की चमक ले डूबी बाबा राम रहीम को।

सत्ता की साये में पलते हैं बाबा

राम रहीम और आसाराम की घटनाओं से साफ़ हो गया है कि राजनीतिक छत्रछाया में ही बाबाओं की सारी कारगुजारियां चलती हैं। जिन बाबाओं पर राजनीतिक वरदहस्त नहीं उसे भला कौन पूछने वाला है? धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक हो गए हैं। इस देश में सेक्स, पैसा और वोट बैंक का कॉकटेल बाबा और राजनीति के मिलने से ही बनता है। लेकिन इस मामले में बाबाओं से नेता किसी भी रूप में कम जिम्मेदार नहीं हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि देश की अगुआई करने के नाते उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। लिहाजा भ्रष्ट, अपराधी और दुराचारी बाबाओं को संरक्षण देकर वो उससे भी बड़े अपराध के भागीदार हो जाते हैं। ऐसे में अगर कोई बाबाओं को सजा देने से इस समस्या के समाधान की आशा करता है तो उसके अज्ञान पर कुछ न कहना ही बेहतर होगा। ऐसे में अगर देश, समाज और राजनीति से अपराध और दुराचार को खत्म करना है तो फिर लड़ाई चौतरफा होगी। और उसमें सबसे पहले राजनेता और बाबा निशाने पर होंगे। 

यौन शोषकों की कतार में जनप्रतिनिधि

राजनीति में पल रहे दुराचारी नेताओं पर नजर दौड़ाई जाए तो बहुत चौंकाने वाली तस्वीर सामने आएगी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि वर्तमान में  3 ऐसे सांसद और 48 विधायक हैं जिन पर महिलाओं के यौन शोषण का मामला चल रहा है। इनमें सबसे ज्यादा 14 जन प्रतिनिधि भाजपा के हैं। 7 शिवसेना के, तृणमूल कांग्रेस के 6, कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी के 5-5, बीजू जनता दल के 4, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल और डीएमके के 2-2, माकपा के एक और 3 निर्दलीय जनप्रतिनिधियों पर महिलाओं के यौन शोषण के मामले चल रहे हैं। चुनाव पर्चा भरते समय खुद इन जन प्रतिनिधियों ने इस संबंध में शपथ पत्र दाखिल किया है। ऐसे में सवाल यह बनता है कि बाबाओं की तर्ज पर इनके भी खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है।   

विज के साथ राम रहीम।

 जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मामले       

मामला केवल यौनशोषण तक सीमित नहीं है बल्कि इसका विस्तार अपराध तक होता है। एडीआर के मुताबिक देश के कुल 4896 सांसदों और विधायकों में से 1581 पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। यानी कुल 33 फीसदी जन प्रतिनिधि आपराधिक छवि वाले हैं। इन पर ह्त्या, ह्त्या के प्रयास से लेकर फिरौती और देश विरोधी मामले दर्ज हैं। इनमें से 51 ऐसे हैं, जिन पर महिलाओं के यौन शोषण का मामला चल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पांच साल के दौरान राजनीतिक दलों ने 334 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए जिन पर यौन शोषण के गंभीर मामले चल रहे हैं। टिकट देने में सभी पार्टियां समान  रूप से आगे रही हैं। 

राहत पहुंचाने वाली बात ये है कि इनमें अधिकतर उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं हो पाए वरन हमारी संसद और विधान सभायें दुराचारियों का क्लब बन कर रह जातीं।  एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने दावा किया है कि उसने यह रिपोर्ट कुल 776 में से 774 सांसदों और 4120 में से 4078 विधायकों के चुनाव शपथपत्र के विश्लेषण के बाद तैयार किया है। दरअसल, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में सभी राजनीतिक दलों का बुरा हाल है। कई राजनीतिक दलों के घाघ नेता पार्टी में महिलाओं को तवज्जो देने की कीमत भी वसूलते हैं। देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसी घटनाओं की कमी नहीं है, जहां पर्दे के पीछे ढके-छिपे यौन शोषण के मामले सार्वजनिक हुए हैं। 

लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब जनता की नजरों में सबके साथ न्याय हो। लेकिन यहां तो ताकतवर और दुराचारी नेता  समाज को हंसी के पात्र में बदल दिए हैं। 










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