आज पूरे भारत को 1857 वाली एकता की ज़रूरत

जयंती पर विशेष , , शुक्रवार , 27-10-2017


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अमरेश मिश्रा

बहादुर शाह ज़फर जयंती-भाग 2

अंग्रेज़ों कि कब्रें

वर्तमान भारत में विभाजनकारी माहौल और दूरियां बढ़ रही हैं। सम्पूर्ण भारत को 1857 वाले एकता के बंधन की ज़रूरत है। 

राजनीतिक विरोधाभास से परे, हम कैसे बहादुर शाह ज़फर  के अवशेषों को वापस ला सकते हैं, और भारत के विभिन्न भागों में 1857 के चिरस्थायी मेमोरियल्स बना सकते हैं, इस पर विचार होना चाहिये। 

लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि विभिन्न, क्रूर ब्रिटिश अधिकारियों की कब्रें अभी भी  लखनऊ, कानपुर और दिल्ली में, पूरे महिमामण्डन के साथ, स्थित हैं। हम बिना इन कब्रों का कुछ किये, ज़फर के अवशेषों को भारत कैसे ला सकते हैं? आगे देखिये यह दोनों मुद्दे कैसे आपस में जुड़े हुए हैं।

 

  • क्रूर अंग्रेज अफसरों की कब्रें हमें आज भी मुंह चिढ़ा रही हैं!
  • कब्रों पर दर्ज होने चाहिए अफसरों के काले कारनामे
  • ब्रिटिश दासता के प्रतीकों को बदल कर अपनी सच्ची कहानी लिखने का वक़्त
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लखनऊ का विशेष महत्व

इस सब में लखनऊ का विशेष महत्व है। 4 मुख्य ब्रिटिश अधिकारी इस शहर में दफनाये गए हैं। सर हेनरी लॉरेंस 1856 में अवध राज्य  पर ब्रिटिश अधिकार के बाद पहले कमिश्नर थे। इनकी और कुख्यात ब्रिगेडियर-जनरल नील की कब्र लखनऊ रेजीडेंसी एरिया के अन्दर स्थित है। 

आलमबाग में ‘सर' हेनरी हेवलोक की कब्र है। ब्रेवेट-मेजर डब्ल्यूएसआर हाडसन को ला मार्टिनियर कॉलेज में दफनाया गया था।  

1857 की क्रांति की तस्वीर। फोटो साभार : गूगल

हाडसन के काले कारनामे

22 सितम्बर 1857 के दिन हाडसन ने ही बहादुर शाह जफ़र के तीन निहत्थे बेटों को दिल्ली के खूनी दरवाजे के पास उनके सरेंडर करने के बाद भी, सरे-आम, गोली से उड़ा दिया था।  

डब्ल्यूएसआर हाडसन का असली चरित्र उनकी खुद की लिखी किताब, "माय 12 ईयरस इन इंडिया"  से उजागर होता है। 

इस किताब में कई जगह हाडसन द्वारा स्थापित 'हाडसन हॉर्स' नाम की घुड़सवार पलटन के करतूत उजागर की गई है। 

इस पलटन ने कैसे हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अवध में गांव के  गांव जला दिये, कितने निर्दोष भारतीय नागरिकों को मार दिया, कहीं 'कालों को' तो कहीं ‘पाण्डे’ (पाण्डे एक प्रत्यय है जो मंगल पाण्डे के प्रथम 'बागी' बन जाने के बाद 1857 के राष्ट्रवादियों को चिह्नित करने के लिये ब्रिटिश सेना इस्तेमाल करती थी।) को मारा, यह सब हाडसन ने खुद लिखा है। मतलब हाडसन भारतियों के सामूहिक हत्या को एन्जॉय करता था।

हाडसन अंग्रेजों द्वारा भी कम प्रतिष्ठा वाला समझा जाता था। कई किताबें, जैसे की "The Indian Rebellion of 1857 (Michael Edwardes, 1975)’, ‘A Leader of Light Horse (LJ Trotter, 1901)’, ‘History of the Indian Mutiny (TR Holmes, 1898)’ में  हाडसन के खिलाफ अनेक बातें उल्लेखित हैं जिसमें हाडसन को भ्रष्ट अफसर बताया गया है जो फंड में हेरा-फेरी करता था।

 

फ़रवरी 1858 में इंग्लैंड के ब्रद्फोर्ड से सांसद थॉमस पेरनोट थोम्पसन ब्रिटिश  हाउस ऑफ़ कॉमन्स में खड़े हुए और हाडसन को जफ़र के पुत्रों का हत्यारा करार दिया। पेरनोट ने कहा हाडसन 'पागलपन' का शिकार था।

 

'सर' हेनरी लॉरेंस

अनेक किताबें जैसे कि ‘Lives of Indian Officers (John William Kaye, 1899)’, ‘Dictionary of Indian Biography (Charles Edward Buckland, 1906)’ और लॉ  रेन्स के खुद के लिखे पत्र (Lawrence’s own despatches published in ‘Freedom Struggle of Uttar Pradesh edited by SA Rizvi and ML Bhargava, 1957)’, लॉरेन्स को धार्मिक कट्टरपंथी के रूप में चित्रित करते हैं।  जिन्होंने लखनऊ में 12 से 31 मई 1857 तक अनेक लोगो को मार डाला। और भारत में साम्प्रदायिकता की शुरुआत भी की।

'सर' हेनरी हेवलोक 

हेवलोक ने  धार्मिक कट्टरता को नस्लवाद  के साथ मिला दिया। कई किताबें जैसे ‘A Biographical Sketch of Henry Havelock KCB (William Brock, 1858)’, ‘Way to Glory (John Pollock, 1963)’, ‘Memoirs of Sir Henry Havelock (John Clark Marshman, 1860)’, बताती हैं कि हेवलाक ने इलहाबाद से कानपुर और उन्नाव(उन्नाव वह स्थान जहां पर हेवलाक ने पासी गाँवों की महिलाओं और बच्चों को मारा) के  रास्तें में किसानो और गरीब जनता की लाशें बिछा दीं। 

हत्यारा नील 

जैसा कि ‘The Indian Mutiny of 1857 (GB Malleson, 1899)’, ‘The Great Rebellion (Christopher Hibbert, 1978)’, में उल्लेखित है,  इलहाबाद और फतेहपुर में नील काली चमड़ी वाले लोगों को मारना अपना ‘धार्मिक कर्तव्य’ समझता था। 

 

नील ने इतने ज्यादा लोगों को मार दिया कि उनके अफसरों ने उनको लताड़ा कि ब्रिटिश सेना को अनाज की सप्लाई करने वाला भी नहीं मिल रहा है।

 

कानपुर में नील के एक विशेष ऑर्डर के अनुसार, क्रांतिकारी सिपाहियों को फांसी के पहले खून, हिन्दुओं को गो-मांस तथा मुसलमानो को सूअर का गोश्त चटवाया जाता था। कोड़ों से अलग मारा जाता था। 

मौत और उसके बाद

लॉरेन्स, हेवलाक, नील को क्रमशः 4 जुलाई, 24 नवंबर और 24 सितम्बर को भारतीय क्रांतिकारियों ने लखनऊ में मार गिराया। 11 मार्च, 1858 को हाडसन भी लखनऊ में बेगम कोठी की लड़ाई में भून डाला गया। 

 

लखनऊ और अवध की लड़ाइयों ने अंग्रेज़ों को इतना भयभीत किया कि 1858 और 1947 तक, पूरे विश्व में जहां तक ब्रिटिश साम्राज्य फैला था, लखनऊ रेसिडेन्सी एक मात्र ऐसी जगह थी, जहां ब्रिटिश यूनियन जैक रात को फहराता था! 

 

भारतीय जनमानस, एवं लखनऊ की जनता भी, इस बात को नहीं भूली। 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान, भारतीय स्वतन्त्रता सेनानियों ने लखनऊ रेसिडेन्सी, आलमबाग, और ला मार्टनियर कॉलेज में विरोध प्रदर्शन किया। 

1947 में आज़ादी के पर्व पर, स्वतन्त्रता सेनानियों ने रेसिडेन्सी को नष्ट करने के लिहाज से घेर लिया था। 

भारत में सबसे पहले, लखनऊ में ब्रिटिश अफसरों की मूर्तियां हटायी गईं। पर क्रूर ब्रिटिश अफसरों के कारनामों को उनकी कब्रों पर दर्ज करने की कवायद नहीं हुई। 

यह भारतीय राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान नहीं तो और क्या है कि आज भी ला मार्टिनियर कालेज में 'हाडसन हाउस' नाम से लड़कों की टीम है। और भारतीय सेना की चौथी घुड़सवार रेजीमेन्ट, जो अपने को हाडसन हॉर्स का वंशज मानती है,  हर साल हाडसन की कब्र पर सलामी ठोकती है? 

ला मार्टनियर कालेज में पढ़ रहे बच्चे, कुख्यात हाडसन, जो उनके पुरखों का कातिल है, को अच्छा इन्सान समझते हैं! 

साम्राज्यों का दौर खत्म हो चुका है। इक्कीसवीं सदी भारत, चीन, ब्राज़ील जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं और राष्ट्रों का दौर है। 

राष्ट्रीय एकता एवं अपनी पहचान के लिये ये सभी देश औपनिवेशिक काल के बोझ को उतार फेंक रहे हैं। राष्ट्र निर्माण को अगले चरण में ले जाने के लिये, भारत के पास 1857 जैसी अद्भुत, ऐतिहासिक मिसाल है। 

अगर हमनें ब्रिटिश-विदेशी दासता के प्रतीकों को बदल कर अपनी, सच्ची कहानी नहीं लिखी, तो अगली पीढ़ी हमें कभी माफ़ नहीं करेगी। 

(समाप्त)

प्रथम भाग पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें- बहादुर शाह ज़फर के अवशेष भारत लाए जाएं...

http://www.janchowk.com/ART-CULTUR-SOCIETY/lastmugalemper-bahadurshahjafar-rangoon-delhi/1325










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