जनता को सम्मोहित करने के लिए बहुरुपिये ने धारण किया फिर नया चोला

आड़ा-तिरछा , , शुक्रवार , 22-03-2019


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अमित मौर्य

देश दुनिया में तमाम कलाकार हैं जो अपनी कलाओं से लोगों को आकर्षित करते हैं,  इनमें से ही एक कला है बहुरुपिया बनना जिसमें कलाकार अवसर के अनुसार तरह-तरह के रूप बनाता और लोगों को रिझाता है।

कुछ बहुरूपिये तो अपनी कला का इतना जीवंत प्रदर्शन करते हैं कि मूढ़ बुद्धि छोड़िये बुद्धिजीवी भी उसके बाजीगरी से सम्मोहित हो जाते हैं, यही नहीं उसके अभिनय को सच मान उस पर सर्वस्व के साथ स्वयं को अर्पण के लिए तैयार हो जाते हैं।

ऐसे ही एक 'उच्चकोटि' के बहुरूपिये 'मौगी' (जो मदारी भी है) को जब यह अहसास हो जाता है कि लोग उसे अब एक 'बहुसंख्यकों' का देवता मानने लगे हैं। तो आज से पांच साल पहले वो पूरी प्लानिंग के साथ अपने जमूरे के साथ जनता के बीच कूद पड़ता है लोकतंत्र के मंदिल को कब्जाने ।

बहुरुपिया मौगी अपने जमूरे को बुलाता है।

जमूरा -जी उस्ताद 

हम किसको बरगलाएं और

लोकतंत्र के मंदिल को जाने वाली सीढ़ी कहां से बनायें।

जमूरा- उस्ताद हम 'गाधी' के प्रदेश से हैं आइये 'शास्त्री जी' के जिले में चलते हैं। 

वहां आप रोयेंगे गाएंगे टेसुए बहाएंगे लोगों को भरमाएंगे तो जनता आपकी एक्टिंग को देखकर दीवानी हो जाएगी।

बहुरूपिया मौगी- तो चल जमूरे शास्त्री जी की नगरी और ई बता उहां खास क्या-क्या है जिस पर हम जनता को इमोशनल कर सकें।

जमूरा साहू-उस्ताद वहां बाबा हैं मईया गंगा हैं भावुक लोग हैं वहां खड़े होकर उट  पटांग कुछ भी बोलेंगे शहर के लोग उसे सच के तराजू पर एकदम नही तौलेंगे।

बहुरूपिया मौगी-तो जमूरे चल चलते हैं इमोशनल अत्याचार करते हैं,शास्त्री जी के जिले वालों को बरगला लिया तो समझ लो लोकतंत्र के मंदिल की कुंजी पा गया।

जमूरा साहू- मगर उस्ताद वहां खुद को बेचारा दिखाना है, किसी भी हद तक जाकर गांधी के वंशजों को मुलुक की बरबादी का कारण बताना है।

बहुरूपिया मौगी- जमूरे तू मेरी कला देखना बस ये चाय की केतली ले ले और जब तक कहूं नहीं तब तक इसे नहीं फेंकना।

जमूरा साहू- जी उस्ताद मगर आप लोकतंत्र के मंदिल में चले गए तो मुझे क्या मिलेगा, वैसे भी लोग मुझे तड़ीपार कहते हैं ।

बहुरुपिया मौगी- चिंता न कर जमूरे  तू मेरा 'मीत'है मैं गया जीत तो तूं भी हो जाएगा हिट।

जमूरा साहू- जी उस्ताद चलो चलते हैं शास्त्री जी के जिले और बाबा की नगरी।

फिर  बाबा की नगरी में आज से पांच वर्ष पूर्व।

बहुरुपिया मौगी- मेहरबान साहेबान कदरदान।

बीच में जमूरा साहू टोकते हुए

जमूरा साहू- उस्ताद आप गलत जा रहे हो स्क्रिप्ट दूसरी है।

बहुरुपिया मौगी- ओह ओके, ठीक है जमूरे थोड़ा ध्यान से उतर गया था। अब सही स्क्रिप्ट पढूंगा।

मितरों मैं यहां आया नही हूं मुझे शंकर जी की जटाओं से निकलने वाली मां ने बुलाया है, मैं गरीब चाय वाला हूं आप मुझे लोकतंत्र के मंदिर में स्थापित करो मुझे साठ दिन दो। मितरों सब बदल दूंगा। लोकतंत्र का मंदिल गांधी परिवार की वजह से खराब हो गया है आप लोग साठ साल पीछे हो गए हो मुझे साठ दिन का समय दो सब सही कर दूंगा। लड़कों को नौकरी दूंगा। वादियों को 370 के बंधन से मुक्त कर दूंगा, और मेहनत कर 'विकास' पैदा कर दूंगा, कुएं को तालाब कर दूंगा, दिन को रात कर दूंगा बॉर्डर को साफ कर दूंगा, और पन्द्रह लाख वाला लॉलीपॉप सबको दूंगा।

उसके बाद भोली जनता बहुरूपिये के बहकावे में इस कदर आ गयी कि 'हर-हर मौगी घर-घर मैगी' बनने लगा।

फिर बहुरूपिये मौगी ने यह फार्मूला पूरे देश में आजमाया। जहां जाता वहीं को अपना बताता। चाय की केतली दिखाता लिहाजा लोकतंत्र के मंदिल की सीढ़ी इसके लिए बनती गयी ।

और एक दिन यह बहुरुपिया मंदिल का कब्जेदार हो जाता है, कब्जा होते ही सब वादे इरादे भूलकर बस मंदिल के बाकी रखवालों के प्रति दुष्प्रचार शुरू कर देता है।

जब जनता सम्मोहन से अर्धमुक्त हो बहुरूपिये से विकास कब पैदा होगा पन्द्रह लाख वाला लॉलीपॉप कब मिलेंगे जैसे सवाल करने लगी तो इसके पाले गये अंधभक्त लोगों को 'नैरू' जी को जिम्मेदार बताने लगे और जो तर्क करने लगे तो इसके भक्तगण तुरन्त उसे पड़ोसी 'पाकुस्थान' मंदिल का समर्थक बताने लगते थे।

अब पांच साल बीत गए हैं फिर से मंदिल कब्जाने के लिए बहुरुपिया मौगी मंदिल का रखवाला दिखाने के लिए 'चौकीदार' बन कर आ गया है, मगर जब भी इसकी बात आये तो इसके मायावी जाल से निकलते हुए बस एक मंत्र 'चौकीदारी चोर है' पढ़ दीजिएगा यह खुद ही झोला उठाकर भाग जाएगा...क्योंकि चौकीदारी सही है तो नीरव क्यों भाग गया ?

चौकीदार सही है तो मेहुल कहां है..?

चौकीदार सही है तो घुसपैठियों की की संख्या और आतंकवाद क्यों बढ़ा..?

चौकीदार सही है दाऊद को क्यों नहीं पकड़ लाया..?

चौकीदार सही है तो जमूरे साहू को क्यों बढ़ाया, आजवाणी का कद क्यों घटाया..?

चौकीदार सही है...मालया को क्यों न रोक पाया..?

चौकीदार सही है तो...काला 'माल' क्यों न आया..?

और सबसे बड़ी बात कि अगर चौकीदार सही है तो रा-फेल की फाइल क्यों गुमाया ..?

ऐसे हजारों हजार सवाल हैं, मगर इन सब सवालों से बचने के लिए चौकीदार हर बात पर 'नैरु' को दोषी बतायेगा।

इसलिए अभी वक्त है। अगर अब हम नहीं चेते तो अगले पांच साल सिर्फ झेलना और रोना ही होगा। तो एक बार खुल कर कहिये चाय वाला बहुरुपिया चौकीदार नहीं चोर है। 

(अमित मौर्य वाराणसी से निकलने वाले अखबार रणभेरी के संपादक हैं।)

 








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