अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लेने वाले बलवन्त सिंह क्यों हैं गुमनाम?

स्मृतिशेष , , मंगलवार , 20-03-2018


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उदय चे

पिछले दिनों राजस्थान में संगरिया, हनुमानगढ़ के पास एक दोस्त से मिलने गया था। दोस्त से किसान, मजदूर, महिला मुद्दों पर चर्चा चल निकली, अब चर्चा चल ही निकली तो चर्चा आजादी की लड़ाई के दौर में जा पहुंची। उस दौर में मेरी मुलाकात उस इलाके के एक गुमनाम महान योद्धा से हुई। जो आजादी से पहले गोरे अंग्रेजों और आजादी के बाद काले अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा और लड़ते हुए शहादत पायी। सामंतवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद के खिलाफ और मजदूर -किसान की समस्याओं के पक्ष में वे लिखते और बोलते रहे, यही लिखना और बोलना ही उनके कत्ल का कारण बना। 

इस क्रांतिकारी योद्धा का नाम बलवंत सिंह आजाद है जिसे लोग प्यार से पूरे इलाके में ‘बल्लू’ कहते थे। इलाके की जनता उनसे बहुत प्यार करती थी। जिस दिन उनकी हत्या हुई पूरे संगरिया में किसी ने चूल्हा नहीं जलाया। पूरे इलाके में बलवंत सिंह की हत्या पर गम और हत्यारों के खिलाफ रोष था। सबको मालूम भी था कि हत्या किसने और क्यों की है। लेकिन कोई सामूहिक आवाज हत्यारों के खिलाफ नहीं उठ सकी। इसका सबसे बड़ा कारण बलवंत सिंह के पिता जी जो उस इलाके के बहुत बड़े सामन्त थे। हत्या करने वाले भी बड़े सामन्त और राजनीतिज्ञ थे। बलवन्त सामन्तवाद के खिलाफ लड़ रहा था। सामंतवाद को खत्म करना चाहता था। इसलिए अपनों ने ही उनकी हत्या के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। 

उनकी पत्नी विद्या जी जो उस समय 23-24 साल की थीं और उनकी 3 दूध पीती बेटियां थीं। बलवन्त सिंह की हत्या के बाद उनके सामन्त पिता ने भी बलवन्त सिंह की पत्नी और उनकी बेटियों का साथ नहीं दिया। अपना हक भी विद्या जी को बड़े संघर्षों के बाद मिला। विद्या जी ने अपनी अंतिम सांस तक जिनकी18.03.2018 को 95 साल की उम्र में मौत हो गयी उस समय तक अनपढ़ होते हुए भी बलवन्त सिंह के उसूलों पर चलती रहीं और एक मजबूत महिला की तरह जिंदगी में संघर्ष किया। बलवन्त सिंह ने कई किताबें भी लिखी। लेकिन जो बाद में न संभालने के कारण नष्ट हो गयीं। उसके बहुत ही सीमित दस्तावेज मिले।    

आज भी सवर्ण जातियां समानता का संविधान होने के बावजूद दलितों को बराबरी देना नहीं चाह रही हैं और प्रतिदिन दलित उत्पीड़न की घटनाएं अलग-अलग जगह से सामने आती रहती हैं। दलितों को अछूत समझ कर सवर्ण जातियां उनके साथ जानवरों से भी बुरा व्यवहार करती थीं। शहीद भगत सिंह भी अपने लेख ‘अछूत समस्या’ में इस मुद्दे को उठा चुके थे। उस दौर में बलवन्त सिंह अछूत जातियों को महान जाति लिखकर संबोधित करते हैं। 

वहीं वो सवर्ण जातियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि ये मुट्ठी भर विदेशी जिनका कोई अस्तित्व नहीं है ये हमारे राजा बने बैठे हैं, तो सिर्फ तुम्हारे जातीय गौरव के कारण, तुम्हारे जातीय गौरव के कारण ही 7 करोड़ जनसंख्या की महान जाति जिनको आपने दूर रखा हुआ है। जिनको आप अछूत कहते हो। वो सभी जातियों के नेताओं से अपील करते हैं कि आपके भिन्न-भिन्न मत हो सकते हैं। उन मतों को रखते हुए एक दूसरे पर विश्वास करके ही भारत में रहना होगा। 

हिन्दू नेताओं से अपील करते हुए वे लिखते हैं कि - 

‘‘हिन्दुओं के नेताओं से सविनय प्रार्थना है कि वो दूसरी जातियों को संतुष्ट रखने के लिए आत्म-त्याग का उदाहरण दें। जिस प्रकार छोटे भाई के रूठने पर सब कुछ दे दिया जाता है। तुम भी अल्पसंख्यक जातियों को खुश रखो।’’

बलवन्त सिंह के बचे हुए दस्तावेज पढ़कर आसानी से उनकी विचारधारा को समझा जा सकता है। वो दलितों और अल्पसंख्यकों की बराबरी की बात करते हैं। क्योंकि जिस दौर में ये सब बलवन्त सिंह लिख रहे थे उस दौर में हिन्दू-मुस्लिमों में साम्प्रदायिक दंगे बढ़ रहे थे। इसलिए वो अपील करते हैं कि सभी बराबरी और भाईचारे से रहें, शांति से रहें तभी हम आजादी की लड़ाई को लड़ सकते हैं। हमारा दुश्मन अंग्रेज है न कि मुस्लिम या अछूत।

देश की आजादी कैसी हो इस पर भी उनकी राय स्पष्ट है - 

वो लिखते हैं कि हम गुलामी से रिहा होना चाहते हैं। लेकिन आजादी कैसी हो। 

अल्पसंख्यक को आजाद मुल्क में क्या मिलेगा। 

मजदूर-किसान को क्या मिलेगा। 

देशी राज्य रहेंगे?

देशी राज्यों के बारे में वो कहते हैं कि अगर देशी राज्य मतलब रियासतें अपने को भारत में अपना बपौती अधिकार रखना चाहती हैं तो ये असम्भव होगा आजाद मुल्क में। 

देशी रियासतों के क्रूर सत्ता का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि उन्होंने प्रजा की गाढ़ी कमाई पर ऐशो-आराम किया है। प्रजा की बहू-बेटियों की इज्जत, मान, धर्म की कभी इन्होंने परवाह तक नहीं की, प्रजा की बच्चियों की दिन-दहाड़े ये नर पिशाच इज्जत लूट लेते हैं। इनको तो खत्म होना ही होगा। इनका खात्मा जरूरी है। 

जीवन के अंतिम दिनों में - 

देश आजाद होने के बाद पूरा देश विभाजन के कारण हिन्दू-मुस्लिम दंगों से गुजर रहा था। पूरे देश में उथल-पुथल मची हुई थी। कहीं खुशी तो कहीं गम की लहर थी। इसी का फायदा उठाकर सामंत, कट्टर साम्प्रदायिकतावादी, जातिवादी जो आजादी से पहले पर्दे पीछे से अंग्रेजों को मदद करते थे। अब लूट मचाने के लिए कांग्रेस में घुस गए थे। उन्हीं में से कुछ नेता जिनका बलवन्त सिंह ने उनके कृत्यों का विरोध किया। उन नेताओं ने उनको जान से मारने की धमकियां दी। इस संदर्भ में एक पत्र बलवन्त सिंह ने कांग्रेस की अखिल भारतीय कमेटी को लिखा। इस पत्र को ही उन्होंने हजारों की संख्या में छपवाकर जनता में वितरित किया। इस पत्र में उन्होंने उन सभी लुटेरों की पोल खोल दी। इसी पत्र से बौखलाए हुए लुटेरों ने उनकी हत्या कर दी। 

इस पत्र में वो लिखते हैं कि - 

राजस्थान में कांग्रेस के बहुत से तत्कालीन नेताओं का नाम लेते हुए बलवन्त सिंह ने लिखा कि कैसे ये नेता राजस्थान में साम्प्रदायिकता भड़का रहे हैं। कैसे चापलूसी करके ये नेता जिनकी छवि कट्टर जातीय और साम्प्रदायिक की है कांग्रेस में घुस गए हैं जो अब इन्ही दंगों का फायदा उठाकर ये नेता सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं और कालाबाजारी कर रहे हैं। बलवन्त सिंह इन नेताओं को जनता का और कांग्रेस का महाशत्रु बताया। बलवन्त सिंह जनता को ऐसे गद्दारों से सचेत रहने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से ऐसे नेताओं को बाहर करने की मांग की थी।   

बलवन्त सिंह जिनकी आवाज को उस समय की सामंती ताकतों ने बन्द कर दिया। आज भी चुनकर बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के कत्ल का सिलसिला चल रहा है। ऐसे में उन क्रांतिकारी योद्धाओं को याद करना उनके संघर्ष को आगे बढ़ाना है।   

                          (ये लेख बलवन्त सिंह की पत्नी विद्या जी को समर्पित)

 










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