आंदोलन की भट्टी से तपकर निकले थे बर्धन

हमारे नायक , , चयन करें , 10-09-2017


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मसऊद अख्तर

ए.बी. बर्धन

(1924 – 2016)

अर्धेन्दु भूषण बर्धन जिनको हम ए.बी. बर्धन के रूप में जानते व पहचानते हैं भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल में से एक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भूतपूर्व महासचिव व पहली केन्द्रीय ट्रेड यूनियन अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष थे। ए.बी. बर्धन उन गिने-चुने नेताओं में थे, जिन्होंने हमेशा श्रमिक वर्ग के हित के लिए न केवल आवाज उठायी बल्कि उन्हें हक दिलाने के लिए यथोचित प्रयास भी किए। वो ऑल इंडिया डिफेन्स एम्पलाइज एसोसिएशन के उपाध्यक्ष, महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी फ़ेडरेशन और ऑल इंडिया इलेक्ट्रिक इम्पलॉइज़ फ़ेडरेशन के अध्यक्ष रहे थे।

ए.बी. बर्धन का जन्म वर्तमान में बांग्लादेश के बरिशाल में हुआ था। बर्धन के पिता नागपुर में रेलवे अधिकारी थे इसलिए उनकी शिक्षा दीक्षा वहीं हुई। वर्ष 1940 में 15 वर्ष की अल्पायु में वह नागपुर आ गए और नागपुर विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। यहाँ ये छात्र आन्दोलन से जुड़े और आल इण्डिया स्टूडेण्ट्स फेडरेशन के सदस्य बने। इसी वर्ष के अंत में वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए जो उस वक़्त प्रतिबंधित थी। अपने अध्ययन के दौरान ही वह पूर्णकालिक छात्र संगठनकर्ता बन गए। वर्ष 1945 में वह एआईएसएफ के सचिव चुने गए तथा 1948 के आरम्भ तक इस पद पर रहे। बर्धन ने विधि में स्नातक तथा अर्थ शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की। वह नागपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष भी चुने गए। छात्र संघ चुनाव में उन्होंने उस वक्त की प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के युवा नेता वसंत साठे को हराया जो बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। छात्र राजनीति के बाद वे महाराष्ट्र में स्टेट बिजली कर्मचारी संगठन से जुड़े, उसके अध्यक्ष बने और मजदूर संगठनों को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई। उस जमाने के बंबई प्रांत के दूसरे अनेक युवा कम्युनिस्टों की तरह वह भी, छात्र आंदोलन में अपनी जुझारू भूमिका से आगे बढ़कर, मजदूर वर्ग के संगठनकर्ता बन गए। अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती वर्षों की अपनी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के जरिए ही उन्होंने मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को समझा व अपनाया, जो कि मजदूर वर्ग के आंदोलन के किसी नेता के लिए बहुत ही जरूरी है।

बर्धन दूसरे कम्यूनिस्ट नेताओं के साथ।

वे जब छात्र राजनीति में आये उस वक़्त देश में आज़ादी का आन्दोलन चल रहा था। ऐसे में देश की आजादी की लड़ाई व आन्दोलन से जुड़ जाना स्वाभाविक था। साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के दौर के  छात्र आंदोलन ने और हमारे देश में विश्व युद्घ के बाद आए जनसंघर्षों के उभार ने, युवा  होते बर्धन के राजनीतिक नजरिए को गढ़ा। 

वर्ष 1941 में लगभग 16 वर्ष की आयु में घर छोड़कर बर्धन जी ने पूर्णकालिक तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। कुछ समय पश्चात छात्र आन्दोलन को छोड़कर वह ट्रेड यूनियन के क्षेत्र से जुड़ गए तथा उन्होंने ऊर्जा कर्मकारों, रेलवे कर्मकारों, कपड़ा मजदूरों, प्रतिरक्षा मजदूरों, प्रेस मजदूरों तथा इंजीनियरिंग उद्योग में लगे मजदूरों को संगठित करने का कार्य किया। महाराष्ट्र में राज्य बिजली कर्मचारी संगठन से वे जुड़े, उसके अध्यक्ष बने और मजदूर संगठनों को खड़ा करने में उन्होंने अहम  भूमिका निभाई। वे बिजली क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपे जाने के खिलाफ थे और उन्होंने बिजली एक्ट 2003 में सुधार लाने के लिए व्यापक जनहित से जुड़े कई सुझाव दिए थे। 

एक छात्र नेता, ट्रेड यूनियन नेता तथा पार्टी संगठनकर्ता के रूप में अपनी विभिन्न गतिविधियों के दौरान वह कई बार गिरफ्तार किये गए और उन्होंने 4 वर्ष से अधिक समय जेल में गुजारा। वह लगभग दो वर्ष भूमिगत भी रहे तथा इस दौरान वे कलकत्ता में मजदूरों को संगठित करने का काम भी किया। वर्ष 1943 में वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मध्य प्रदेश प्रांतीय समिति के सदस्य तथा बाद में सीपीआई के महाराष्ट्र राज्य परिषद् के सदस्य और 1960 में राज्यों के पुनर्गठन के पश्चात महाराष्ट्र का गठन होने पर महाराष्ट्र राज्य के सदस्य बनाये गए। उन्होंने समय-समय पर होने वाली अपनी अनेक गिरफ्तारियों के बावजूद अपने अध्ययन को जारी रखते हुए अर्थशास्त्र विषय में एम.ए. और एल.एल.बी. की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। वह 1957 में पांच वर्ष की अवधि के लिए महाराष्ट्र राज्य विधायिका के भी सदस्य चुने गए। वर्ष 1968 में पार्टी की आठवीं कांग्रेस में राष्ट्रीय परिषद् के लिए चुने गए तथा वर्ष 1978 में पार्टी की केन्द्रीय कार्यकारी समिति के लिए चुने गए. वे अस्सी के दशक में राष्ट्रीय सचिव मंडल के सदस्य के तौर पर दिल्ली आए वर्ष 1982 में वाराणसी में संपन्न हुई पार्टी कांग्रेस में वह पार्टी की केन्द्रीय सचिवालय के लिए चुने गए। 1995 में पार्टी कीई 16वीं कांग्रेस में सीपीआई के उप महासचिव व वर्ष 1996 में महसचिव चुने गए।

श्री बर्धन देश के ट्रेड यूनियन आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए विभिन्न यूनियनों व राष्ट्रीय परिसंघों के उच्च पदों की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर चुके हैं। वह 1994 में एटक के महसचिव बने मगर 1996 में सीपीआई के महासचिव बनने की वजह से उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा। बाद में वह एटक से उपाध्यक्ष के रूप में जुड़े रहे। इसके स्थ ही वह विद्युत् कर्मचारियों के अखिल भारतीय परिसंघ के अध्यक्ष और अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी परिसंघ के उपध्यक्ष रहे। उनके नेक लेख देश के विभिन्न पात्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उन्होंने ट्रेड यूनियन शिक्षा और आउटलाइन हिस्ट्री ऑफ़ एआईटीयूसी नामक पुस्तकें भी लिखी. इसके अलावा उन्होंने मजदूरों के सामाजिक अधिकारों का राजनीतिकरण कैसे होना चाहिए, इस पर भी लिखा है। वे जो भी लिखते और बोलते थे, वह न केवल सरस और बोधगम्य होता था, बल्कि उन्हें पढऩे-सुनने वाला हमेशा कुछ नया सीखता था।

निधन पर श्रद्धांजलि देते हुए नेतागण।

वे हिंदी, अंग्रेजी, और मराठी धारा प्रवाह बोलते थे और एक अच्छे और बेबाक वक्ता होने के साथ-साथ उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनकी संगीत साहित्य में भी विशेष रुचि थी। वे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के गीतों के अलावा पुराने हिंदी फिल्मों के गाने भी गाते थे। उनकी वज मधुर थी और सहगल से लेकर मुकेश तक की आवाज़ में वे गीतों को गाते थे।

वे हमेशा सभी वामदलों के एक होने की जरूरत पर बल देते थे और इसके लिए उन्होंने काफी प्रयास भी किया। यह दुखद है कि वे इस प्रयास में सफल नहीं हो पाए। बर्धन एक ऐसे नेता थे जिन्हें सत्ता, ताकत या संरक्षण की चमक-दमक कभी लुभा नहीं सकती थी। उनका जीवन एक कम्युनिस्ट और मजदूर वर्ग के नेता का जीवन था। बर्धन में एक और गुण यह था कि वह बड़े बेबाक तथा बेलाग शख्स थे, जिनके यहां न कोई दिखावा था और न दुराव। वह इसका शीर्ष उदाहरण थे कि मार्क्सवाद किस तरह एक कम्युनिस्ट नेता के चरित्र और आचरण को ढालता है।

7 दिसंबर 2015 को उन्हें बेचैनी महसूस होने के बाद दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें मस्तिष्क की धमनी में अवरोध के कारण मस्तिष्काघात हुआ था।  2 जनवरी 2016 को उनका निधन हो गया। 

ए बी बर्धन का निधन वामपंथी आंदोलन और लोकतांत्रिक मूल्यों की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति है। श्री बर्धन ने आजीवन धर्मनिरपेक्ष और जनवादी राजनीति का परचम उठाए रखा और वे ऐसे वक्त में विदा हुए हैं जब देश में राजनीतिक फायदे के लिए धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता जैसे मुद्दों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया गया है, आर्थिक उदारीकरण को विकास की पहली शर्त मान लिया गया है, मजदूरों और निम्न आर्थिक  वर्ग के लिए जीवन पहले से अधिक चुनौतियों भरा हो गया है। 

आजादी के पहले से राजनीति में सक्रिय हुए श्री बर्धन ने 21वीं सदी तक राजनीति का एक लंबा सफर तय किया और अंतिम वक्त तक वे सक्रिय रहे। उनका निधन मूल्यपरक् राजनीति का अंत है।  

 










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