बरेली में अनाज के बगैर तिल-तिल कर मर गई सकीना, प्रशासन बता रहा बीमारी से मौत

विशेष , बरेली, शुक्रवार , 17-11-2017


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कुमार रहमान

बरेली। अभी हम देवरिया में भूख से दो मासूमों की मौत को भूले भी नहीं थे कि बरेली में एक बुजुर्ग महिला की भी फाकों से मौत हो गई। हालांकि प्रशासन इसे भूख से मौत मानने को तैयार नहीं है। उसके अपने वही पुराने घिसे-पिटे तर्क हैं कि यह मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है। पहले हम जान लेते हैं संक्षिप्त रूप से घटना के बारे में।

फतेहगंज पश्चिमी इलाके के मोहल्ला भोला नगर की पचास साल की सकीना का बेटा दिल्ली में मजदूरी करता है। सकीना पति इसहाक के साथ पन्नी लगी झोपड़ी में जिंदगी काट रहीं थीं। कुछ दिनों पहले इसहाक जब बीमार पड़े तो जोड़-जोड़ कर इकट्ठा किए गए सारे पैसे इलाज में खर्च हो गए। बाद में बचे खुचे जेवर भी बिक गए। पति मेहनत मजदूरी करने लायक नहीं था इसलिए घर की माली हालत बद से बदतर होती चली गई। धीरे-धीरे हालत भुखमरी तक पहुंच गई। मुहल्ले वाले कभी-कभार खाने को दे देते थे। इस बीच पति इसहाक कोटेदार के पास राशन के लिए दौड़ते रहे लेकिन वह उन्हें टरकाता रहा। उसने कहा कि बीवी की बायोमेट्रिक मशीन पर उंगली की छाप लगेगी तभी राशन मिलेगा। मुहल्ले वाले बताते हैं कि एक बार इसहाक बीमार बीवी को किसी तरह से ले भी गए तो उस दिन भी राशन नहीं मिला। भूख और कुपोषण की वजह से बीमार सकीना की 14 नवंबर को मौत हो गई।

बात मीडिया में आने के बाद प्रशासन की नींद टूटी। उसके बाद मौके पर मीरगंज के एसडीएम राम अक्षैवर चौहान जांच के लिए पहुंचे। घंटे भर की जांच में साबित हो गया कि सकीना की मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है। इसके साथ ही कोटेदार सहित सभी को क्लीनचिट मिल गई और मामला रफा-दफा मान लिया गया। पति इसहाक की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह व्यवस्था के भारी शोरशराबे में दब कर रह गई। 16 नवंबर को डीएम आर विक्रम सिंह भी मुआयना करने पहुंचे थे लेकिन फिलहाल नतीजा ढाक के तीन पात का ही रहा।

भात के लिए चिल्लाती झारखंड की मासूम संतोषी की मौत का मामला हो या देवरिया का या फिर अब बरेली का। एक बात साफ है कि व्यवस्था किसी भी हाल में इन मौतों को भूख से हुई मानने को तैयार नहीं है। इसके अपने कुछ राजनीतिक और प्रशासनिक निहितार्थ हैं। भूख से हुई मौतों के बाद हर तरफ होने वाली आलोचना और मीडिया में छीछालेदर की वजह से कोई भी मुख्यमंत्री यह मानने को तैयार नहीं है कि मौत भूख से हुई है। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने भी झारखंड के सिमडेगा ज़िले में मासूम संतोषी की मौत को झुठला दिया था। हालांकि अभी बरेली में महिला की मौत के मामले में योगी आदित्यनाथ का बयान तो नहीं आया है। लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी इसे बीमारी से मौत साबित करने को तुली हुई है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि अगर किसी भी जिले में भूख से मौत होती है तो उसके लिए वहां के डीएम जिम्मेदार होंगे।  इसी साल 26 मार्च को योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट किया था कि किसी जिले में अगर भूख से किसी व्यक्ति की मौत हुई तो संबंधित जिलाधिकारी और सीएमओ इसके लिए जिम्मेदार होंगे और वह दंडित होंगे। जिले के मुखिया की गर्दन बचाने के लिए पूरा सिस्टम भूख की जगह बीमारी से मौत साबित करने में लग जाता है। पिछले कुछेक सालों में भूख से मौतों पर अदालत का रुख भी सख्त रहा है। पिछली कांग्रेस सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने गोदामों में अनाज सड़ाने की जगह गरीबों में बांटने की हिमायत की थी लेकिन पूंजीवादी मानसिकता वाली सरकारों का रुख हमेशा गरीब विरोधी ही रहा है। चाहे वह कांग्रेस सरकार हो या मौजूदा बीजेपी की हुकूमत।  

नवीं क्लास के साइंस के विद्यार्थी को भी पता होता है कि भूख से ही कुपोषण होता है और शरीर कमजोर होने के बाद कई तरह की बीमारियां घेरती चली जाती हैं। फिर अंततः एक दिन मौत हो जाती है। तो बात बहुत सीधी सी है कि अगर भोजन नहीं मिलेगा तो कोई भी बीमार होकर ही मरेगा। बरेली की सकीना के घर जब पत्रकारों की टीम पहुंची तो वहां अनाज का एक भी दाना नहीं था। चूल्हे की हालत भी बता रही थी कि वह कई दिनों से नहीं जला है। इसके बावजूद प्रशासन मान रहा है कि उनके घर भूख जैसी कोई समस्या नहीं थी।

समाज ने भी नहीं ली सुध

इस पूरे मामले में एक और पहलू भी है। जब सकीना की मौत हुई तो उन्हीं दिनों बरेली में आला हजरत का उर्स चल रहा था। इस उर्स में दुनिया भर से अकीदतमंद आते हैं। जिनकी तादाद कई लाख तक होती है। उर्स में हर दिन पांच सौ से ज्यादा डेगें चढ़ रही थीं और यहां से महज बीस किलोमीटर दूर एक मुस्लिम महिला भूख से तड़प तड़प कर मर गई। यह इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इस्लाम कहता है कि खाना खाने से पहले देख लो कि पड़ोसी भूखा तो नहीं है। अफसोस की बात यह भी है कि मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद भी अकीदत से भरा कोई भी जायरीन उसके पति की मदद करने को नहीं पहुंचा। दरगाह से जुड़ा कोई शख्स भी वहां गया हो फिलहाल इसकी भी जानकारी नहीं है। बीमार इसहाक की भी हालत बहुत बेहतर नहीं है। उनके भोजन की भी व्यवस्था नहीं है। 

बहरहाल पूरे तंत्र का पेट गर्दन तक भरा हुआ है और उसे भूख जैसी किसी चीज के बारे में पता तक नहीं है। बेहतर है सरकारों के लिए कि वह भूख को बीमारी मान लें ताकि जांच-वांच की झंझट ही न रहे और अनाज के बिना किसी की मौत से उपजे शोर से उसकी नींद में खलल न पड़े।

(कुमार रहमान पत्रकार हैं और बरेली में रहते हैं।)










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