“येरमिह्तना-एक महान गोटुल”: धर्म, सत्ता, व्यापार और नक्सलवाद के बीच संघर्षरत बस्तर की महागाथा

उपन्यास , बस्तर, बुधवार , 04-07-2018


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। “यदि प्रेमचंद का “गोदान” किसानों की कृषि-संस्कृति का महाकाव्य है, तो “येरमिह्तना-एक महान गोटुल” आदिवासियों की गोटुल संस्कृति का इन्साइक्लोपीडिया है”। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह भाषाशास्त्री, प्रोफ़ेसर- वीकेएस विश्वविद्यालय, सासाराम, बिहार का इस उपन्यास के लिए उपरोक्त कथन इसकी आधी व्याख्या कर देता है। 

गोटुल प्रथम पाठशाला ही नहीं, उससे बढ़कर शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व किसी आदिवासी नेतृत्व गांव का न्याय केंद्र है। गोटुल हमेशा ही जिज्ञासा का विषय रहा है। अनेक शोध हुए, पर इसकी पूर्ण सांस्कृतिक व्याख्या विश्व में पहली बार इस उपन्यास ने की है। जो सहज, भावुक, जीवंत और मन-मस्तिष्क को झकझोर देने वाला है। यह उपन्यास गोटुल का विश्वकोष होने के साथ ही आदिवासियों की परिभाषा भी है। धर्म, सत्ता और व्यापार के इस युद्ध के बीच वे कौन हैं और आज कहां खड़े हैं। यह उनके संवैधानिक अधिकारों की सांस्कृतिक व्याख्या भी है। जो ना केवल बस्तर बल्कि पूरे विश्व के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। 

“नारंगी आकाश लिए सूर्य अस्त होने जा रहा है, यह देख बेलोसा प्रकृति शक्ति के प्रतिक स्तम्भ के सामने रखे उस एक दीये को जलाती है, जिसे गोटुल का प्रथम दीया कहा जाता है।”- जब इस वाक्य के साथ उपन्यास पढ़ना शुरू करते हैं, तो जल्द ही आप एक पाठक नहीं, उस गोटुल के जीवंत पात्रों का हिस्सा बन जाते हैं और गोटुल और उसके आस-पास हो रही घटनाएं आपको प्रभावित करने लगती हैं। अनेकानेक बार उनकी भावनाएं प्रेम, त्याग, भावुकता आपमें जन्म भी लेती हैं। आगे बढ़ते हुए यह अहसास ही नहीं होता कि आप उन लोगों की व्याख्या पढ़ रहे हैं, जो दुनिया की नज़रों से दूर अपने जीवन में व्यस्त हैं।

जिन्होंने औरों की तरह अपने जीने के तरीके का विज्ञापन कभी किया ही नहीं। पाठक सहजता से धर्म, सत्ता और व्यापार को उनके नजरिये से देखने लगता है। नक्सलवाद बस्तर से जुड़ा ज्वलंत विषय है। उसको भी यह उपन्यास छूता है कि कैसे सत्ता व नक्सलवाद के बीच आदिवासी संघर्षरत हैं। पाठक को उपरोक्त विषयों पर नया दृष्टिकोण मिलता है। जो उसे समझ के एक नये मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है। और यह सब सजीव दृश्यों व जीवंत पात्रों के सहज संवादों के साथ मनोरंजक तरीके से होता है। जिसमें पाठक अंततः जिज्ञासु बना रहता है।

दुनिया के वे शोधी छात्र जो प्रकृति केन्द्रित आदिवासियों पर शोध कर रहे हैं, उनके लिए यह प्रथम किताब है। और वे लोग जिन्होंने बगैर जाने गोटुल को घोटुल लिखा, ऐसे साहित्यकारों के लिए सबक कि आप इसे कुरूप नहीं कर सकते। यह खुद अपनी व्याख्या करेगा। 

इस दौर में हिन्दी साहित्य के युवा लेखकों के लिए यह लेखन की नई विधा का प्रशिक्षक है। यह न केवल बस्तर, आदिवासी, गोटुल पर केन्द्रित इस दौर की महान कृति है, बल्की हिन्दी साहित्य के लिए भी ऊर्जावान सिद्ध होगा। ऐसा जीवंत लेखन हिन्दी साहित्य को सबल देगा। पात्रों, घटनाओं, दृश्यों का सजीव वर्णन हिन्दी लेखन के नई पीढ़ी को विकल्प देगा। इस उपन्यास के लेखन विधा पर भी शोध होने की संभावना है। अनेक दृष्टिकोण से इस उपन्यास की समीक्षा होनी चाहिए। किसी एक शीर्षक से सम्पूर्ण व्याख्या संभव नहीं है। 

यह उपन्यास बस्तर का धरोहर है, जो सदियों तक बस्तर को उसके वास्तविक स्वरुप का बोध कराता रहेगा। और उसे एक  सबूत की तरह बताएगा कि किसने उसका रूप बदलने की कोशिश की या कर रहा है। यह बस्तर, आदिवासी, गोटुल और इनके संघर्ष को बेहद नजदीक से जानने का अमूल्य मौक़ा है। जो महज साहित्य नहीं आपकी भावनाओं को आंदोलित करने वाला उस एक वक्ता की तरह है। जो आपका येरमिह्तना अर्थात प्रथम स्नान कर देता है। उपरोक्त व्याख्या के साथ इसका सहज होना इसे महान कृतियों में शामिल करता है। जो युगों तक जीवित रहेगा और येरमिह्तना करता रहेगा। किताब ऑनलाइन अमेजन पर उपलब्ध है। तो किताब को पढ़िए और पढ़ाइए। 

(तामेश्वर सिन्हा जुझारू पत्रकार हैं और अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। आप आजकल बस्तर में रहते हैं।)








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Keshav parchake :: - 07-04-2018
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