सांप्रदायिकता के खिलाफ अपने नायकों से भी टकराने का साहस रखते थे भगत सिंह

जन्मदिन पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 27-09-2018


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लाल बहादुर सिंह

हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली 

ये मुश्ते- खाक है फानी, रहे न रहे !

27/28 सितंबर शहीदे-आज़म भगत सिंह का जन्म-दिन है!

कहते हैं कि किसी को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि यह समझा जाय की वह आज होते तो कैसे सोचते, वैसे ही सोचने और करने की कोशिश ही उनके प्रति उनके कृतज्ञ वारिसों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी !

भगत सिंह से न सिर्फ हर हिंदुस्तानी प्यार करता है, वरन वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की जनता के चहेते हीरो हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान की जनता ने लाहौर के प्रसिद्ध शादमान चौक का नामकरण भगत सिंह चौक कर दिया !

राष्ट्र उनके अदम्य साहस और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान के प्रति कृतज्ञ है  । वे हमारे प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं में संभवतः सबसे निर्विवाद हैं, जिनके बारे में शायद ही कोई सोचे  कि उन्होंने कोई विचार किसी संकीर्ण पक्षपात या स्वार्थवश व्यक्त किया होगा।

आज उनकी जयंती के अवसर पर, हम सब जो उन्हें आदर्श मानते हैं, क्या अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ईमानदारी से यह समझने का साहस दिखा सकते हैं कि भगत सिंह  कैसे सोचते थे !

गौर करें तो निम्न सवाल उनकी चिंता/चिंतन के केंद्र में थे-

आज़ादी का सवाल- पर महज अंग्रेजों को हटाने नहीं, वरन काले/भूरे अंग्रेजों को भी सत्ता से अलग रखने और जनता के हाथों सत्ता सौपने के अर्थ में !

उन्होंने अपने चर्चित लेख ' क्रन्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा ' में स्पष्ट घोषणा किया, " हम समाजवादी क्रांति चाहते हैं, जिसके लिए बुनियादी जरूरत राजनैतिक क्रांति की है.........लेकिन यदि आप कहते हैं कि आप राष्ट्रीय क्रांति चाहते हैं जिसका लक्ष्य भारतीय गणतंत्र की स्थापना है, तो मेरा प्रश्न यह है कि इसके लिए आप किन शक्तियों पर निर्भर करते हैं ? क्रांति राष्ट्रीय हो या समाजवादी, जिन शक्तियों पर हम निर्भर हो सकते हैं वे हैं मजदूर और किसान !.........भारत सरकार का प्रमुख लार्ड रीडिंग की जगह अगर सर पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास हों तो जनता को इससे क्या फर्क पड़ता है? एक किसान को क्या फर्क पड़ेगा, यदि लार्ड इरविन की जगह सर तेजबहादुर सप्रू आ जाएं ?"

भगत सिंह साम्राज्यवाद से किसी समझौते के माध्यम से नहीं, वरन imperialist chain से radical break के माध्यम से पूर्ण आज़ादी चाहते थे । वे यह समझते थे कि किसानों और मजदूरों को नेतृत्व में लाकर ही यह संभव है, पूंजीपतियों और ज़मींदारों के नेतृत्व में नहीं । 

वे चाहते थे की मेहनतकशों पर आधारित होकर आज़ाद राष्ट्र का नवनिर्माण हो ताकि जनता के जीवन में खुशहाली आ सके !

अफ़सोस, भगत सिंह का वह स्वप्न पूरा न हो सका । उनकी यह समझ सही साबित हुई है कि समझौता-विहीन संघर्ष द्वारा साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी के चक्र से बाहर निकले बिना, उसके कुचक्र को तोड़े बिना हमारे जैसे देशों की वास्तविक मुक्ति  और प्रगति संभव नहीं । हमारी सरकार किस कदर आज भी साम्राज्यवाद के दबाव और दलाली में लिप्त है, इसका सबसे ताजा नमूना है कि अमेरिकी दबाव में सरकार ईरान से सस्ते तेल का आयात बंद करने जा रही है, जबकि देश में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को लेकर हाहाकार मचा हुआ है ! 

किसानों, मजदूरों पर आधारित गणतंत्र कितना बना, इसके लिए यह याद करना ही पर्याप्त है कि यह दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती आय की असमानता वाला देश है, यह किसानों, बेरोजगार नौजवानों की आत्महत्याओं वाला देश है, यह आज लिंचिस्तान  है !

भगत सिंह के लिए बेहद अहम थी साम्प्रदायिकता से देश को बचाने की चिंता !! साम्प्रदायिकता द्वारा राष्ट्र तथा राष्ट्रीय आंदोलन के लिए उपस्थित खतरे को अपने तमाम समकालीनों की तुलना में अधिक स्पष्टता से उन्होंने समझा था ।

उन्होंने कहा साम्प्रदायिकता उतना ही बड़ा खतरा है जितना बड़ा उपनिवेशवाद !

उन्होंने धार्मिक-सांप्रदायिक संगठनों से जुड़े लोगों को नौजवान सभा में शामिल करने से इंकार कर दिया, क्योंकि उनका स्पष्ट विचार था कि धर्म सबका निजी मामला है और साम्प्रदायिकता तो  दुश्मन ही है, जिसके खिलाफ लड़ना है ।

साम्प्रदायिकता को वह कितना बड़ा खतरा मानते थे और उसके प्रति उनका रुख कितना सख्त और समझौताविहीन  था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस लाला लाजपत राय के लिए उनके मन में अपार सम्मान था, जिनके अपमान के खिलाफ सांडर्स की हत्या के आरोप में उन्हें फांसी तक हुई, वही लाजपत राय जब जीवन के अंतिम दिनों में साम्प्रदायिकता की ओर झुकते दिखे तो भगत सिंह ने उनके लिए लिखा " The lost leader " !( बकौल प्रो0 बिपन चंद्र उन्होंने एक परचा निकाला जिस पर लालाजी के प्रति असम्मान का एक भी शब्द लिखे बिना रॉबर्ट ब्रावनिंग की कविता " The lost leader" छाप दी जो उन्होंने Wordsworth के लिए तब लिखी थी जब वे Liberty अर्थात स्वतंत्रता के खिलाफ खड़े होने लगे थे ! और उसके कवर पर लालाजी की फोटो छाप दी ! वे वर्ग-चेतना के विकास को सांप्रदायिकता से लड़ने का सबसे कारगर हथियार मानते थे ।

आज हमारे समाज के पोर-पोर में जिस तरह साम्प्रदायिकता का जहर रात-दिन फासीवादी राजनीति और मीडिया के दलाल हिस्से द्वारा Inject किया जा रहा है, क्या हम अपने सबसे "चहेते" नेताओं के खिलाफ भी उसी तरह खड़े होने का साहस दिखाएंगे जैसे भगत सिंह लाजपत राय के खिलाफ खड़े हुए थे ?

वे  नास्तिक थे, उन्होंने लिखा, " मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन , परम-आत्मा का, जो की प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन  करती है, कोई अस्तित्व नहीं है । हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगति का ध्येय मनुष्य द्वारा, अपनी सेवा के लिए, प्रकृति पर विजय पाना है "

दरअसल वे जनता को अंध आस्था, अन्धविश्वास, रूढ़ियों, पुरातनपंथी-पोंगापंथी विचारों से निकालकर आधुनिक, वैज्ञानिक विचारों पर आधारित समाज का निर्माण करना चाहते थे । उन्होंने लिखा, " प्रत्येक मनुष्य को, जो विकास के लिए खड़ा है, रूढ़िगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उनपर अविश्वास प्रकट करना होगा..........उसे तर्क की कसौटी पर कसना होगा ।....निरा विश्वास और अन्धविश्वास खतरनाक है । यह मस्तिष्क को मूढ़ तथा मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है  ।  "

आज जब "भारतीय संस्कृति" के महिमामंडन और राष्ट्रवाद के नाम पर  साक्षात् सत्ता शीर्ष से " गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी" जैसे घोर अवैज्ञानिक विचारों, अन्धविश्वास और पोंगापंथ के गहन अंधकार से जनता की चेतना को आप्लावित किया जा रहा है, क्या हम भगत सिंह की वैज्ञानिकता, इहलौकिकता, आधुनिकता का मजबूती से झंडा बुलंद करेंगे ?!!

वे जाति-आधारित असमानता और अन्याय, छुआछूत जिसकी सबसे बर्बर अभिव्यक्ति थी,  का खात्मा कर, लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण करना चाहते थे !!!

उन्होंने इसे भारतीय समाज का बेहद अहम सवाल माना था और इसे मानव-गरिमा पर आघात माना था। उन्होंने साफ़ देखा कि इससे भारतीय समाज में श्रम के प्रति घृणा का भाव पैदा हुआ जिसने पूरे समाज की प्रगति को अवरुद्ध कर दिया !

दलितों से संगठित होकर संघर्ष की अपील करते हुए उन्होंने पूंजीवादी नौकरशाही के झांसे में आने से उन्हें सचेत किया । (संभवतः) डा0 आंबेडकर और गांधीजी के बीच Separate Electorate को लेकर चल रही बहस, जिसकी परिणति पूना पैक्ट में हुई थी, में हस्तक्षेप करते हुए उनके Separate Electorate के पक्ष में खड़े हुए,  "हम मानते हैं कि उनके अपने जन-प्रतिनिधि हों । वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगे ।" उन्होंने कहा "तुम असली सर्वहारा हो.....उठो और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो । धीरे धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं होगा । सामाजिक आंदोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनैतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो । तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो ! सोये हुए शेरों, उठो और बगावत खड़ी कर दो !!" 

यह हाल के दिनों में दलितों में जो एक नया रैडिकल लोकतान्त्रिक जागरण शुरू हुआ है, उसके पूर्वाभास जैसा लगता है !

भगत सिंह की विरासत के अनुरूप क्या भगत सिंह के चाहने वाले इस जागरण के साथ खड़े होंगे  ?

सर्वोपरि भगत सिंह अपने उक्त विचारों और सपनों को पूरा करने वाले औजार के बतौर एक क्रान्तिकारी पार्टी का निर्माण करना चाहते थे । 

आज जब न सिर्फ भगत सिंह का स्वप्न अधूरा है, वरन उन सारे मूल्यों- लोकतंत्र, समता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, आधुनिकता-के लिए आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा खतरा उपस्थित है, जिनका सपना स्वतंत्र्यवीरों ने देखा था, तब

क्या हम ऐसी राजनैतिक ताकतों को  मजबूत करने के लिए अपने को समर्पित करेंगे जो शहीदे आज़म भगत सिंह के सपनों का हिंदुस्तान बनाने की दिशा  में जद्दोजेहद कर रही हैं !

1857 की हमारी पहली जंगे-आज़ादी के महान मूल्यों के वाहक भगत सिंह हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के सबसे अप्रतिम सितारे हैं !

उनकी स्मृति को नमन !

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।) 










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