आप भक्त हैं या भगत?...तय कीजिए

जयंती पर विशेष , , बृहस्पतिवार , 28-09-2017


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मुकुल सरल

भक्त और भगत में बहुत फ़र्क़ है जनाब। भाषिक तौर पर भले ही दोनों शब्द एक हों। एक-दूसरे के पर्याय या अपभ्रंश हों लेकिन आज के संदर्भ में दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। हमारे समय ने तमाम अर्थ बदल दिए हैं। जैसे आज संत शब्द बोलते ही भक्तिकालीन संत-कवि याद नहीं आते, बल्कि उनकी जगह बलात्कारी बाबाओं का चेहरा दिखाई देता है, वैसे ही भक्त शब्द बोलते ही एक आस्थावान, झूठ और पाप से डरने वाला धार्मिक उदार व्यक्ति का चेहरा सामने नहीं आता बल्कि ऐसे लोगों का चेहरा सामने आता है जो अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हैं, जो प्रतिगामी सोच रखते हैं और देश को मध्य युग में ले जाना चाहते हैं। ऐसे लोग जो धार्मिक तौर पर कट्टर विचार रखते हैं, जिनके नज़दीक दूसरे धर्म या मत का कोई मोल नहीं, जो शुद्धता और श्रेष्ठता के भ्रम के मारे हैं, जो मोदी सरकार का आंख मूंदकर समर्थन करते हैं और इस हद तक की उनके कामकाज की आलोचना या असहमति भी उन्हें बर्दाश्त नहीं और वे ऐसा करने वालों से गाली-गलौच के अलावा उनकी जान लेने को भी आमादा हैं। आज के संदर्भ में ऐसे ही लोगों को भक्त कहा जाता है।

लेकिन भगत...भगत शब्द आज भी जब हम बोलते हैं तो भगत सिंह का ही चेहरा हमारे सामने आता है। पहले तो हम भक्त को भगत बोल भी लेते थे लेकिन आज हमें सिर्फ़ भगत के नाम पर भगत सिंह ही याद आ रहे हैं। और हम इस शब्द को सिर्फ़ और सिर्फ़ उन्हीं के अर्थ में जानना, समझना और याद रखना चाहते हैं, क्योंकि हमारे नज़दीक भगत सिंह का बड़ा मतलब है।

भगत सिंह। फोटो साभार

भगत सिंह का मतलब...

हमारे लिए भगत सिंह मतलब शहीदे-आज़म, भगत सिंह मतलब आज़ादी का मतवाला, भगत सिंह मतलब क्रांति की मशाल, भगत सिंह मतलब इंकलाब ज़िंदाबाद है।

भगत सिंह मतलब साम्राज्यवाद का दुश्मन, क्रांति और आज़ादी को समग्र रूप में जानने और बताने वाला, राजनीति को सही रूप में समझने और समझाने वाला और इंसाफ और बराबरी का पैरोकार है।

तो आज के संदर्भ में भक्त और भगत दो समानार्थक शब्द एक दूसरे के विलोम बन गए हैं। और हमें इसी को समझना होगा।

भगत सिंह। फोटो साभार

भगत सिंह के भगवाकरण की साजिश

इसलिए जब कोई भगत सिंह को केसरिया पगड़ी पहनाता है या उन्हें सिर्फ एक जाट सिख के तौर पर देखना या दिखाना चाहता है तो हमें तकलीफ होती है। इस प्रवृत्ति पर हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक आशुतोष कुमार भी आपत्ति जताते हैं। आज आप गूगल पर भगत सिंह लिखकर सर्च कीजिए तो उनकी हैट की वास्तविक तस्वीर की जगह केसरिया पगड़ी की ही तस्वीर ज़्यादा मिलेगी। जबकि भगत सिंह ने क्रांति का रास्ता चुनने के साथ ही अपने केश त्याग दिए थे। मुझे याद है कुछ साल पहले की घटना है, दिल्ली के ही एक इलाके में भगत सिंह जयंती के मौके पर लगाए गए पोस्टरों पर कुछ ऐसे ही भक्त लोगों ने तिलक लगा दिया था। आज भी यह कोशिश साफ दिखती है। इस तरह कट्टरवादी लोग भगत सिंह को हड़पना चाहते हैं। उनके हिंदूकरण की कोशिश करते हैं। इस तरह वे एक क्रांतिकारी का सांप्रदायिककरण करके उसे छोटा करने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश का विरोध होना चाहिए।

"मैं नास्तिक क्यों हूं?"

भगत सिंह घोषित तौर पर नास्तिक थे और वे नास्तिक क्यों थे यह भी वो बिल्कुल साफ करके गए हैं। मैं नास्तिक क्यों हूं आलेख लाहौर जेल में लिखा गया, जो द पीपल में 27 सितम्बर 1931 के अंक में प्रकाशित हुआ था। भगतसिंह ने अपने इस लेख में ईश्वर के बारे में अनेक तर्क किए हैं। इसमें सामाजिक परिस्थितियों का भी विश्लेषण किया गया है। उनका यह लेख आज हमारे पास एक पुस्तिका के रूप में मौजूद है।

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इस लेख में भगत सिंह कहते हैं कि

मैं अपना जीवन एक ध्‍येय के लिए कुर्बान करने जा रहा हूँ, इस विचार के अतिरिक्‍त और क्‍या सांत्‍वना हो सकती है? ईश्‍वर में विश्‍वास रखनेवाला हिंदू पुनर्जन्‍म पर एक राजा होने की आशा कर सकता है, एक मुसलमान या ईसाई स्‍वर्ग में व्‍याप्‍त समृद्धि के आनंद की तथा अपने कष्‍टों और बलिदानों के लिए पुरस्‍कार की कल्‍पना कर सकता है। किंतु मैं किस बात की आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्‍सी का फंदा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख्‍ता हटेगा, वही पूर्ण विराम होगा- वही अंतिम क्षण होगा। मैं, या संक्षेप में आध्‍यात्मिक शब्‍दावली की व्‍याख्‍या के अनुसार, मेरी आत्‍मा, सब वहीं समाप्‍त हो जाएगी। आगे कुछ भी नहीं रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई जिंदगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्‍वयं एक पुरस्‍कार होगी, यदि मुझमें उसे इस दृष्टि से देखने का साहस हो। यही सब कुछ है। बिना किसी स्‍वार्थ के, यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्‍कार की इच्‍छा के बिना, मैंने आसक्‍त भाव से अपने जीवन को स्‍वतंत्रता के ध्‍येय पर समर्पित कर दिया है, क्‍योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत से पुरुष और महिलाएँ मिल जाएँगे, जो अपने जीवन को मनुष्‍य की सेवा तथा पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्‍त और कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारंभ होगा। वे शोषकों, उत्‍पीड़कों और अत्‍याचारियों को चुनौती देने के लिए उत्‍प्रेरित होंगे, इसलिए नहीं कि उन्‍हें राजा बनना है या कोई अन्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त करना है - यहाँ या अगले जन्‍म में या मृत्‍योपरांत स्‍वर्ग में। उन्‍हें तो मानवता की गरदन से दासवृत्ति का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शांति स्‍थापित करने के लिए इस मार्ग को अपनाना होगा। क्‍या वे उस रास्‍ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिए खतरनाक किंतु उनकी महान आत्‍मा के लिए एकमात्र शानदार रास्‍ता है? क्‍या अपने महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जाएगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण लगाने का साहस करता है?”

"मेरा धर्म सिर्फ देश सेवा"

आज जब धर्म के नाम पर देश में आतंक का माहौल है। लोग एक दूसरे की हत्या तक कर दे रहे हैं, तब यह विचार पढ़ने और समझने और ज़रूरी हो जाते हैं। वह साफतौर पर कहते थे कि मेरा धर्म सिर्फ देश की सेवा करना है। यही वे विचार हैं जिसकी वजह है कि प्रतिगामी विचारों वाले, साम्राज्यवादी ताकतों के एजेंट, सांप्रदायिक कट्टर लोग उनसे डरते हैं। इसलिए वे मजबूरी में भगत सिंह का नाम तो लेते हैं क्योंकि यह नाम इस देश के जन-जन के मन में बसा है लेकिन वे उनके विचारों को नहीं बताते। भगत सिंह अमर रहें का नारा तो वे लगाते हैं लेकिन हमेशा सतर्क रहते हैं कि उनके विचारों लोगों के बीच न पहुंचने पाएं। उनपर कभी कोई विचार-विमर्श या बहस न हो, क्योंकि इससे उनकी सत्ता हिलने का डर रहता है। इसलिए वे गांधी के विचार तो बताते हैं (हालांकि वे उसपर भी अमल नहीं करते), लेकिन भगत सिंह के विचारों पर कभी बात तक नहीं होती।

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इसलिए कोई नहीं बताता विचार

आज भी जयंती के मौके पर ऐसे लोग उनकी तस्वीर पर फूल-माला तो ज़रूर चढ़ाएंगे लेकिन अपने मुंह से एक बार भी यह नहीं बताएंगे कि भगत सिंह क्या सोचते थे, उनके क्या विचार थे जो वे हंसते-हंसते देश के लिए बलिदान हो गए। भगत सिंह कहते हैं कि अहिंसा को आत्म-बल के सिद्धांत का समर्थन प्राप्त है जिसमे अंतत: प्रतिद्वंदी पर जीत की आशा में कष्ट सहा जाता है। लेकिन तब क्या हो जब ये प्रयास अपना लक्ष्य प्राप्त करने में असफल हो जाएं? तभी हमें आत्म-बल को शारीरिक बल से जोड़ने की ज़रूरत पड़ती है ताकि हम अत्याचारी और क्रूर दुश्मन के रहमोकरम पर ना निर्भर करें।

भगत सिंह का कहना था कि क़ानून की पवित्रता तभी तक बनी रह सकती है जब तक की वो लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति करे।

वह कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति जो जीवन में आगे बढ़ने के लिए तैयार खड़ा हो उसे हर एक रूढ़िवादी चीज की आलोचना करनी होगी, उसमे अविश्वास करना होगा और चुनौती भी देना होगा।

वह कहते हैं कि आम तौर पर लोग जैसी चीजें हैं उसके आदी हो जाते हैं और बदलाव के विचार से ही कांपने लगते हैं। हमें इसी निष्क्रियता की भावना को क्रांतिकारी भावना से बदलने की जरूरत है।

निष्ठुर आलोचना और स्वतंत्र विचार ये क्रांतिकारी सोच के दो अहम् लक्षण हैं।

इस प्रकार भगत सिंह धर्म, अंध श्रद्धा, अंध विश्वास, रूढ़िवाद सभी को चुनौती देते हैं, लेकिन आज की सत्ता इसी सबको बढ़ावा देना चाहती है इसलिए वह भगत सिंह के विचारों से डरती है।

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उन्हें भगत सिंह के विचार डराते हैं

धर्म और आस्था के अलावा क्रांति, आज़ादी, राजनीति इन सबको लेकर भगत सिंह ने बेहद गहराई से अपने विचार रखे हैं। जो आज भी सत्ताधीशों, मठाधीशों, सरमायदारों को डराते हैं। दरअस्ल भगत सिंह पूर्ण आज़ादी के समर्थक थे, यानी ऐसी आज़ादी जिसमें सत्ता वास्तव में आम आदमी खासतौर पर किसान-मज़दूर के हाथ में हो। वे कहते थे कि हमें ऐसी आज़ादी नहीं चाहिए जिसमें गोरे अंग्रेजों की जगह भूरे अंग्रेज सत्ता पर काबिज़ हो जाएं। यही वह विचार है जो आज भी सत्ताधीशों की नींद उड़ाए रखता है।

वह कहते हैं कि क्रांति मानव जाति का एक अपरिहार्य अधिकार है। स्वतंत्रता सभी का एक कभी न ख़त्म होने वाला जन्म-सिद्ध अधिकार है। श्रम समाज का वास्तविक निर्वाहक है। 

हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी, जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है। चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति हों या अंग्रेजी शासक या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी रखी हुई है। चाहे शुद्ध भारतीय पूंजी-पतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो, तो भी इस स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता।

मैं इस बात पर जोर देता हूँ कि मैं महत्वाकांक्षा, आशा और जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ। पर मैं ज़रूरत पड़ने पर ये सब त्याग सकता हूँ, और वही सच्चा बलिदान है।

विचारों को कैसे मारोगे?

भगत सिंह का कहना था कि किसी भी इंसान को मारना आसान है, परन्तु उसके विचारों को नहीं। महान साम्राज्य टूट जाते हैं, तबाह हो जाते हैं, जबकि उनके विचार बच जाते हैं।

तभी तो उन्होंने कहा कि

हवा में रहेगी मेरे ख़्याल कि बिजली,

ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे!

यही वह समय है, जब...

इन पंक्तियों, इस शेर को आज और ज़ोर से दोहराने की ज़रूरत है। भगत सिंह के ही शब्दों में युद्ध छिड़ा हुआ है... यह वही समय है जब ऐसे ही विचारों की वजह से पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। जब प्रोफेसर कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पनसारे जैसे विचारकों और तर्कवादियों की हत्या कर दी गई। यही वह समय है जब एक दलित स्कॉलर रोहित वेमुला को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जब गौहत्या के शक में गरीब दलितों को सरेआम पीटा जाता है, अखलाक को घर में घुसकर मार दिया जाता है, जुनैद, पहलू खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। यही वह समय है जब जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश की जाती है और छात्रों को देशद्रोह के मुकदमों में फंसाने की कोशिश की जाती है, जब बीएचयू की लड़कियों को यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने पर लाठियों से पीटा जाता है, यही वह विकट समय है जब एक सैनिक को खराब खाने की शिकायत पर बर्खास्त कर दिया जाता है, एक सैनिक को जातीय भेदभाव की शिकायत करने पर प्रताड़ित किया जाता है। तो ऐसा ये विकट समय है, जिसमें भगत सिंह को याद करना और उनसे ऊर्जा लेना बहुत ज़रूरी हो जाता है।

उसे ये फिक्र है हरदम नया तर्जे-ज़फ़ा क्या है

हमें यह शौक है देखें सितम कि इन्तहा क्या है!

 










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:: - 09-28-2017
I am as an Indian I am the follower of Veer Bhagat Singh not any religious guru