वो दिन दूर नहीं जब भक्त राम की जगह रेगर को बैठा दें!

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 31-03-2018


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वीना

"तोता-तोता गेरियो (फैंकियो)!" बचपन में अमरूद के पेड़ के नीचे खड़े होकर पेड़ पर मजे़ से अमरूद खा रहे तोते से हम ये विनती कर रहे होते थे। क्योंकि पेड़ पर चढ़ने से हमें डर लगता था। फिर बड़े लोग चढ़ने भी नहीं देते थे। हाथ-पैर तुड़वाने का पंगा कौन ले।

हमें बताया गया था कि तोते की चोंच का वार झेल चुका फल पका भी होता है और मीठा भी। सो हम अपने हाथ-पैरों को संभाले, बड़ी शिद्दत से सब्र का फल टपकने के इंतज़ार में पेड़ के नीचे खड़े, ऊपर बैठे तोते को फल खाते देखते रहते थे।

बड़ों का कहना मानने वाले, रिस्क लेने से डरने वाले बच्चों से अलग कुछ बिंदास बच्चे भी होते थे। वो अंजाम की परवाह किए बग़ैर पेड़ पर चढ़कर तोते से पहले पके फल का मज़ा ले लेते थे। और नीचे खड़े लल्लुओं को मुंह चिढ़ाया करते थे। छोटी-मोटी चोट लगने पर घरवालों से डांट-झिड़की खाते हुए भी वो शान से नीचे खड़े रहने वालों के आगे से निकलते। जताते हुए कि उनके जैसे बहादुरों पर चोट जैसी तुच्छ बातों का कोई असर नहीं पड़ता। वो बार-बार नाज़ुक मिजाज़ों को चुनौती देंगे।

जब तक अपने जिस्म-ओ-जान को दांव पर लगाकर आज़ादी का स्वाद चखने की बात थी तो शहीद भगतसिंह जैसे सामने आते थे। और यातनाओं के ख़्याल से घबराए निक्करधारी ‘‘वीर’’ सावरकर सरीखे, शरीर की पोटली समेटे अंग्रेज़ी सुरक्षा डिब्बों में नज़रबन्द होकर जान की ख़ैर मनाते थे।

पर अब सावरकर के वंशजों ने धन और सत्ता के पंखों पर कब्ज़ा कर लिया है। सियासत के आज के हालातों में मुझे पेड़ पर पके फल का मज़ा लेते तोते की जगह सत्ता के पंख लगाए साहेब एंड पार्टी नज़र आ रही है। 

और नीचे इंतज़ार कर रहे हैं...आलसी, ज़रूरत से ज़्यादा अपनी परवाह करने वाले तोते की जूठन का इंतज़ार करते हाथ, हाथी, साइकिल और क्रांतिकारी झुंड आदि-आदि।

क्रांतिकारी  इंतज़ार कर रहे हैं टटपुंजिया छोटे-मंझले  किसानों के भूखे, लाचार, बेरोज़गार मज़दूर बनने का। घोषित क्रांतिकारियों की झोली में क्रांति के लिए तैयार सर्वहारा को पकाने का काम ऊपर पेड़ पर बैठे अंबानी-अडानी आदि के साथ मिलकर साहेब जी कर रहे हैं।

बेचारे साहेब को पता ही नहीं कि धन पंख लगाकर डाल-डाल नोंचने-तोड़ने का सुख पाकर इतराने वाले वो,  दरअसल क्रांतिकारियों के लिए क्रांति फल पका रहे हैं। ये गूढ़ बात कोई चाय बेचने वाला भला कैसे समझ सकता है। इसका ठेका तो बुद्धिजीवी क्रांतिकारियों के पास है।

मेहनत का काम मूर्ख करते हैं। विद्वान नहीं। सो निक्करधारी पिछले सौ सालों से लगातार अपनी कछुआ चाल में मेहनत करते-करते आखि़र फलों से लदे पेड़ पर तोता बन बैठ गए हैं।

कोई बात नहीं ले लो थोड़ा मज़ा आखि़र तो एक झटके में तुम्हारी दशकों की मेहनत का पका-पकाया अनपढ़ सर्वहारा क्रांतिकारी, हम विद्वानों की झोली में टपकाने ही वाला है। क्रांति धर्मग्रंथों में ऐसा ही लिखा है।

वैसे निक्कर पार्टी के पकाए मज़लूम मतदाता फल के वारिस कम नहीं है। राज्यों में साइकिल-हाथी समेत और भी हैं। और केंद्र में पंजा फिराक़ में है।

मां ने बेटे को पेड़ के नीचे बैठा दिया है। मां को यक़ीन है बिना हाथ -पैर हिलाए जल्दी ही सत्ता का पका फल बेटे की गोद में गिरकर रहेगा। वैसे मां पूंजीपति तांत्रिकों को भी खूब मानती है। उन्होंने माँ को भरोसा दिया है कि वो बेटे के हक़ में भी सत्ता मंत्र ज़रूर पढ़ेंगे। अभी निक्करधारियों ने अच्छा दिल बहलाया हुआ है।

कोई कुछ भी कहे पर निक्करधारी अपनी मेहनत का खा रहे हैं। बुद्धिजीवी लाख अनपढ़-अज्ञानी होने की तोहमत लगाएं पर लक्ष्य को हासिल करने की क्रिएटिविटी का तमगा निक्कर गैंग को ही मिलेगा।

चाहे नमूना देख लो - मुजफ़्फ़रनगर, सहारनपुर, भागलपुर, आसनसोल, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बंगाल-बिहार, राजस्थान, दिल्ली -  लव जिहाद, तीन तलाक, घर वापसी, गौ माता, राष्ट्रभक्ति, रथ यात्रा, रामनवमी जुलूस आदि, अनादि।

श्री राम की क्या मजाल की निहत्थे मज़दूर अफराजुल के कुल्हाड़ी से टुकड़े करने वाले शंभूलाल रेगर के हमशक़्ल को अपनी शोभा यात्रा की झांकी से बेदख़ल कर दें।

आख़िर ये शंभू रेगर सरीखे ही तो बाबरी मस्जिद गिरा कर आए थे। और अब मंदिर की ईंटे भी इन्हीं की राह देख रही हैं। भई रहती दुनिया तक तो राम इनके एहसान से उबर नहीं सकते। 

अभी तो राम झांकी जुलूस में शंभू रेगर के डुप्लीकेट को अलग झांकी में बिठाया गया था। क्या पता असली शूंभू जब जेल से बाहर आए तो राम जी को आदेश मिले कि राम-सीता को थोड़ा परे सरका कर राष्ट्रभक्त शंभू जी को बगल में बिठाया जाए।

बाक़ी ये झोली फैलाए जो क्रांतिकारी और  बेटे जी बैठे हैं इनकी ये ही जाने। वैसे क्रांतिकारियों को थोड़ा भी कच्चा फल पंसद नहीं है।

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं)










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Pawan Patel :: - 03-31-2018
नारेबाजी का कमोवेश थोडा असर लगता है. व्यंग्य लिखने का प्रयास अच्छा है. क्यूंकि इसे पढ़ते हुए आज के हालात पर हंसी जैसे आने का नाम नहीं ले रही. यह समय की विद्रूपता है कि पहले आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी/ अब किसी बात पर नहीं आती