भारतीय इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज है मुंडा विद्रोह के नायक बिरसा का नाम

हमारे नायक , , रविवार , 12-11-2017


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मसऊद अख्तर

बिरसा मुंडा

(15 नवम्बर 1875 – 9 जून 1900)

भारत के अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आन्दोलनों में आदिवासी आन्दोलनों का विशेष महत्व है। 19वीं सदी में बिरसा मुंडा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे और एक प्रमुख आदिवासी जननायक थे। वे आज भी न केवल आदिवासी आन्दोलनों के लिए ही प्रेरणा स्रोत हैं बल्कि लोकतांत्रिक समाज व स्वतंत्रता के लिए सत्ता के खिलाफ भारतीय जनता के प्रतिरोध की आवाज़ भी हैं।  

मुंडा जनजातियों ने 18वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक कई बार अंग्रेजी सरकार और भारतीय शासकों, जमींदारों के खिलाफ विद्रोह किये। बिरसा मुंडा के नेतृत्वर में 19वीं सदी के आखिरी दशक में किया गया मुंडा विद्रोह जिसे उलगुलान के नाम से भी जाना जाता है, उन्नीसवीं सदी के सर्वाधिक महत्वपूर्ण जनजातीय आंदोलनों में से एक है। इस विद्रोह में हज़ारों की संख्या में मुंडा आदिवासी शहीद हुए। बिरसा मुंडा के संघर्षों की ही वजह से छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट, 1908 (सीएनटी) झारखंड क्षेत्र में लागू हुआ जो आज भी बरकरार है। यह एक्ट आदिवासी भूमि को गैर आदिवासियों में हस्तांतरित करने पर प्रतिबन्ध लगाता है और साथ ही आदिवासियों के मूल अधिकारों की रक्षा करता है। 

वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को 'बिरसा भगवान' कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। मात्र 25 वर्ष की अल्प आयु में ही वे एक किवदंती बन गये और जन जन के बीच अमर हो गए। 

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था।  मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था । उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहा वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे।  उनका बचपन गरीबी, अभाव में बीता। उसके बाद फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया।

बिरसा ने प्रारंभिक शिक्षा सलगा में स्थित जयपाल नाग द्वारा चलाये जा रहे स्कूल से की। पढ़ाई में तेज होने के कारण जयपाल नाग की सलाह पर उन्हें जर्मन मिशन स्कूल, चाईबासा में प्रवेश दिलाया गया। इसी समय उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन हुआ और उन्हें ‘बिरसा डेविड’ नाम मिला। कुछ वर्ष पढ़ाई करेने के बाद, उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल छोड़ दिया। साथ ही बिरसा ने ईसाई धर्म भी त्याग दिया। इसके बाद उनका स्वामी आनन्द पाण्डे से सम्पर्क हो गया और उन्हें हिन्दू धर्म तथा महाभारत के पात्रों का परिचय मिला। 1895 में संभवतः कुछ ऐसी घटनाएं व संयोग बना जिससे मुख्यतः आदिवासी व मुंडा समाज उन्हें भगवान् मानने लगा। अपनी बीमारियों के निवारण के लिए मुंडा, उरांव, खरिया समाज के लोग बिरसा के दर्शन के लिए ‘चलकड़’ आने लगे। पलामू जिले के बरवारी और छेछारी तक आदिवासी बिरसाइट – यानि बिरसा के अनुयायी बन गए। लोक गीतों में लोगों पर बिरसा के गहरे प्रभाव का वर्णन मिलता है और वे ‘धरती आबा’ के नाम से पुकारे जाने लगे।

जन-सामान्य का बिरसा में काफ़ी दृढ़ विश्वास हो गया. इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली। लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उसने मुंडा समुदाय में धर्म व समाज सुधार के कार्यक्रम शुरू किये और तमाम कुरीतियों से मुक्ति का प्रण लिया। इसके बाद बिरसा ने सांस्कृतिक लोकाचार के लिए बोंगा (पुरखा देवताओं) को पूजने पर जोर दिया. लोगों में बढ़ रहे असंतोष ने आदिवासी रीति रिवाजों और प्रथाओं को भी प्रभावित किया, जिसे मूल मानकर बिरसा ने आन्दोलन की शुरुवात की. बिरसा ने नारा दिया कि “महारानी राज तुंदु जाना ओरो अबुआ राज एते जाना” अर्थात ‘(ब्रिटिश) महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो’.  इस तरह बिरसा ने आदिवासी स्वायत्ता, स्वशासन पर बल दिया।

भारतीय जमींदारों तथा ब्रिटिश शासकों के शोषण से आदिवासी समाज बुरी तरह त्रस्त  था। बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को शोषण की नारकीय यातना से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें तीन स्तरों पर संगठित करना शुरू किया. पहला तो सामाजिक स्तर पर ताकि आदिवासी-समाज अंधविश्वासों और ढकोसलों के चंगुल से छूट कर पाखंड से बाहर आ सके। इसके लिए उन्होंने आदिवासियों को स्वच्छता का संस्कार सिखाने की कोशिश की. उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में बताया। सामाजिक स्तर पर आदिवासियों के इस जागरण ने न केवल स्थानीय जमींदार-जागीरदार और तत्कालीन ब्रिटिश शासन के ही कान खड़े किये बल्कि पाखंडी झाड़-फूंक करने वाले व अंधविश्वासों के जरिये इनकी यथास्थिति के दयनीय स्थिति को बरकरार रखने वालों की दुकानदारी भी ठप हो गई। ये सब बिरसा मुंडा के खिलाफ हो गए। 

दूसरा था आर्थिक स्तर पर सुधार ताकि आदिवासी समाज को जमींदारों और जागीरदारों क आर्थिक शोषण से मुक्त किया जा सके। बिरसा मुंडा ने जब सामाजिक स्तर पर आदिवासी समाज में चेतना पैदा की तो आर्थिक स्तर पर सारे आदिवासी शोषण के विरुद्ध स्वयं ही संगठित होने लगे और बिरसा मुंडा ने आगे आकर उनके नेतृत्व की कमान संभाली। 

इसी बीच आदिवासियों ने 'बेगारी प्रथा' के विरुद्ध एक मज़बूत आन्दोलन किया। परिणामस्वरूप जमींदारों और जागीरदारों के घरों तथा खेतों और वन की भूमि पर कार्य प्रभावित होने लगा।

तीसरा था राजनीतिक स्तर पर आदिवासियों को संगठित व एकत्रित करना। चूंकि उन्होंने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आदिवासियों में चेतना जागृटी कर दी थी, अतः राजनीतिक स्तर पर इसमें उबाल आने में दिक्कत न हुई। आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति भी सजग हुए। 

1898 में डोम्ब री पहाड़ियों पर मुं‍डाओं की विशाल जन सभा हुई, जिसमें आंदोलन की पृष्ठ भूमि तैयार की गयी। आदिवासियों के बीच राजनीतिक चेतना फैलाने का काम भी चलता रहा. 24 दिसम्बर 1899 को बिरसापंथियों ने अंग्रेजों के खिलाफ प्रसिद्ध मुंडा विद्रोह छेड़ दिया। तीरों से पुलिस थानों पर आक्रमण करके उनमें आग लगा दी गई।  5 जनवरी 1900 तक पूरे मुंडा अंचल में विद्रोह की चिंगारियां फैल गई। ब्रिटिश फौज ने आंदोलन का दमन शुरू कर दिया। आदिवासी जंगलों में छिप गए और वहीँ से विद्रोह को संचालित करने लगे। 9 जनवरी 1900 को अंग्रेज सेना ने उन्हें डोम्बार पहा‍ड़ी पर घेर लिया और एक घमासान युद्ध हुआ, परन्तु गोला बारूद के आगे तीर-कमान कितना प्रतिरोध कर पाता और अंत में वीरता से लड़ते हुए बिरसा मुंडा के साथी बड़ी संख्या में शहीद हुए। आंदोलन लगभग समाप्त हो गया। गिरफ्तार किये गए मुंडाओं पर मुकदमे चलाए गए जिसमें दो को फांसी, 40 को आजीवन कारावास, 6 को चौदह वर्ष की सजा, 3 को चार से छह बरस की जेल और 15 को तीन बरस की जेल हुई. परन्तु अब भी बिरसा अंग्रेजों की पकड़ से दूर थे और भूमिगत हो गए।

बिरसा मुंडा काफी समय तक पुलिस की पकड में नहीं आये, लेकिन एक स्थानीय व्यक्ति पैसे की लालच में गद्दारी कर दिया जिसकी वजह से 3 मार्च 1900 को बिरसा गिरफ्तार हो गए। लगातार जंगलों में भूखे-प्यासे भटकने की वजह से वह काफी कमजोर हो चुके थे। जेल में उन्हे हैजा हो गया और 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी मृत्यु हो गई। यह भी कहा जाता है कि उन्हें जेल में धीमा जहर दिया गया था। लेकिन जैसा कि बिरसा कहते थे, आदमी को मारा जा सकता है, उसके विचारों को नहीं. और आज अंग्रेजों का शासन ख़त्म होने के सत्तर साल बाद भी बिरसा जन-जन में आज भी जीवित हैं।  बिरसा के विचार मुंडाओं और पूरी आदिवासी कौम को संघर्ष की राह दिखाते रहे। आज भी आदिवासियों के लिए बिरसा का सबसे बड़ा स्थान है।

भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया। परन्तु आज बिरसा की भूमि झारखंड में ही वर्तमान सरकारें बिरसा के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करने में लगी हैं. जहां अंग्रेजों द्वारा बिरसा की शहादत के बाद जनमानस को शांत करने के लिए बिरसा के संघर्षों की देन के बतौर छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट लागू किया, आज उसे ही देसी सरकारें बदलने व निरर्थक बनाने में लगी हैं और ज़मीन को आदिवासियों से छीन पूंजीपतियों के चरणों में डालने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ दिख रही हैं।  

 






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