धर्म की सत्ता और राष्ट्रवाद की अफीम

आड़ा-तिरछा , , रविवार , 06-05-2018


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वीना

कई साल पहले मैं अपने पापा के साथ रिक्शे में जा रही थी। ऊपर छत से खुले तीन पहियों वाले रिक्शे में। रिक्शा चलाने वाला एक 20-21 साल का नौजवान था। हमारे रिक्शे में बैठने के कुछ देर बाद ही लगा कि रिक्शा सामान्य से कुछ ज़्यादा ही तेज़ चल पड़ा है। सोचा, रिक्शेवाला जवान है, जोश में है। फिर रिक्शे ने और ताबड़तोड़ स्पीड पकड़ ली। अब लगा जैसे हम ज़मीन पर नहीं हवा में हैं। ‘‘हमें जल्दी नहीं है आराम से चला।’’ मेरे पापा के ये शब्द मेरे कान से आगे रिक्शेवाले तक पहुंचने से पहले ही हम चारों - मैं, पापा, रिक्शेवाला और रिक्शा एक दूसरे पर उलट-पुलट होकर बिखर चुके थे। से सब इतनी तेज़ी से हुआ कि हम रिक्शे में नहीं ज़मीन पर हैं पता तब चला जब हम रिक्शे की जगह ज़मीन पर पड़े अपनी-टूटी-फूटी मुद्राओं का अध्ययन कर रहे थे।

पापा ने अपने खून सने हाथ को देखते हुए रिक्शेवाले से कहा -

‘‘पहुंचा दिए अमरीका।’’ फिर नाराज़ होकर मुझसे कहा -‘‘और बैठ ले हवाई जहाज में।’’ पापा का ये कहना था कि मेरी ज़ोर से हंसी छूट गई। शुकर है तब पापा को भी हंसी आ गई वरना और गालियां पड़तीं। ‘‘कह रहा था अरी पैदल चल ले, पर ना, मान तो है ही नहीं ना।’’ उठते हुए पापा फिर बढ़बढ़ाए। इत्तेफ़ाक से जहां हम लोट-पोट हुए थे वहीं सामने एक मल्हम-पट्टी वाले खुद डिग्री होल्डर डॉक्टर की दुकान नज़र आ गई। मैंने शुक्र मनाया, चलो सही जगह सरकस दिखाया हमने। हादसे के बाद इलाज का इंतजाम तो है।

मैं रिक्शेवाले को भी साथ ले गई पट्टी करवाने के लिए। डॉक्टर ने पूछा क्या हुआ? पापा ने रिक्शेवाले की तरफ इशारा करके कहा -"पायलट साहब जल्दी में थे। अमरीका के राष्ट्रपति ने बुलाया था इन्हें।’’ डॉक्टर  रिक्शेवाले की तरफ देख कर मुस्कराया। फिर पापा के ज़ख़्म साफ करने लगा। 

पास ही नल था मैं मिट्टी में सने हाथ धोने चली गईं। जब वापस पहुंची तो रिक्शेवाला गायब था। मैंने पूछा -"रिक्शेवाला कहां गया? उसकी पट्टी हो गई?’’ इस पर डॉक्टर हंसकर बोला -‘‘अफ़ीमची’’ है। चुपके से खिसक लिया, कहीं पिटाई ना हो जाए। यहां ज़्यादातर नौजवानों का यहीं हाल है। पढ़ाई-लिखाई, काम धंधा कुछ है नहीं। अफ़ीम-गांजा लगाते हैं और रोज़ कुछ ना कुछ ड्रामा करते हैं। इनके घरवाले भी परेशान हैं इनसे।’’ ओहो! तभी अपने साथ हमें भी दिन में तारे दिखाने आसमान में ले गया था।’’ पापा ने हंसते हुए कहा।

‘‘धर्म जनता की अफ़ीम है।’’ 5 मई को कार्ल मार्क्स के 200वें जन्मदिन पर जब बार-बार धर्म की अफ़ीम का जिक्र आया तो मुझे अफ़ीम के सौजन्य से अपना ये हाथ-पैर तुड़ाई कार्यक्रम याद आ गया। क्या यही हालत धर्म की अफ़ीम गटकने वालों की भी होती है?

अफ़ीम का नशा करने वाला वास्तविक दुनिया से कट जाता है। ज़मीन को आसमान समझने लगता है। अपनी दुर्दशा भूलकर तृप्ति के समन्दर में गोते लगाने लगता है। वो न फिर अपने भले-बुरे के बारे में सोचने-समझने लायक रह जाता है न दूसरे के।

आज के मौजूदा हालात में सिर पे छत से महरूम, ख़ाली पेट,नंगे बदन धर्म की अफ़ीम के सुट्टे लगाने वाली जनता हक़ीकत में किसी अफ़ीमची की तरह गटर के दलदल में फंसी है। पर कल्पनाओं में स्वर्ग के आसमान पर पंख फैला रहे हैं। धर्म की अफ़ीम चाटने वालों को समझ नहीं आ रहा है कि किसी ख़ास धर्म की चौधराहट का ख़्वाब अफ़ीम के नशे से ज़्यादा कुछ भी नहीं है। धर्म, देशभक्ति-राष्ट्रवाद के नाम की अफ़ीम जो उन्हें चटाई जा रही है आख़िरकर उससे उन्हीं का विनाश होने वाला है।

मज़े की बात ये है कि अफ़ीम चाटने वाली और चटाने वाली दोनों पक्तियां नशे में हैं। क्या अंबानी-अडानी, बिड़ला-टाटा आदि-आदि पूंजी अफ़ीम के नशे में धुत नहीं हैं? ये पूंजी अफ़ीमची इस क़दर नशे में हैं कि प्रकृति के रौद्र इशारे समझने को राज़ी ही नहीं। अगर ये होश में होते तो क्या समझते नहीं कि जिस धरती-धन और संसाधनों को ये अपनी वसीयत का हिस्सा बनाना चाहते हैं प्रकृति उन्हें भोगने वाले तुम्हारे वारिसों समेत तुम्हारी सारी लूट को  पानी, राख-आग में बदल देंगी? जल्द ही। अगर तुम न रुके तो।

वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग कह ही गए हैं कि 50 साल में पृथ्वी सर्वनाश की कगार पर पहुंच जाएगी।जिस तरह से प्रकृति का हिसाब-किताब बिगाड़ कर दुनिया भर के पूंजी अफ़ीमची पृथ्वी के संसाधनों को लूटने की होड़ मचाए हुए हैं और सत्ता अफ़ीम में मदहोश सत्ता अफ़ीमची बढ-चढ़कर व्यक्तिगत स्वार्थ-लालच के आसमान में परम सुख के पंख लगाकर इनके साथ उड़ रहे हैं, उस हिसाब से ऐसा होना लाज़मी है। 50 नहीं तो 75 साल में सही।

धर्म-जात की अफ़ीम  के शिकाऱ अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, पिछड़े किसान-मज़दूर जब तक ख़ुद इस धर्म अफ़ीम को नकार कर संभलेंगे तब तक हो लेगा बंटाधार!

हिंदू धर्म की कपोल कल्पनाओं के मुताबिक वो वराह अवतार जिसने पृथ्वी को अपने दोनों दांतों पर संभाल लिया था। वो भी पृथ्वी के क्रोध का सामना करने नहीं आएगा। आख़िर ग्लोबल वार्मिंग के विनाश से उसे भी तो अपनी जान बचानी है कि नहीं!

स्वर्ग में तो जैसा कि तुम्हारे आका बताते हैं धर्म अफ़ीमचियों, आत्मा के अलावा कुछ जाता नहीं। फिर पृथ्वी को लूटकर इंसानों को जानवर से बद्तर ज़िन्दगी और मौत देकर ये धन कहां ले जाने के लिए इकट्ठा कर रहे हैं?

क्या लगता है? ये सत्ता नशेड़ी और पूंजी अफ़ीमची चांद, मंगल पर बसने की संभावनाएं क्यों तलाश रहे हैं?

क्या ये भी मानते हैं कि स्वर्ग कोरी कल्पना है। और चांद-मंगल ग्रह वैज्ञानिकों की तलाशी ठोस हक़ीक़त। जहां पृथ्वी को बरबाद कर बसा जा सकता है। विद बैंक बैलेंस, जेट-रॉकेट समेत।

अगर धर्म-राष्ट्रवाद की अफ़ीम खाकर दलितों अल्पसंख्यकों, आदिवासी, पिछड़ों, किसानों-मज़दूरों पर अत्याचार करने वालों चांद-मंगल पर तुम्हें भी पृथ्वी विनाश के बाद सुरक्षित बचने वालों की लिस्ट में शामिल कर लिया गया है भले ही ग़ुलाम के रूप में ही सही, तो फिर चलो तुम जो चाहो करो। अपनी जान बचाने का हक़ सबको है। अगर नही तो इनकी अफ़ीम की गोलियां छोड़ों और चुपचाप जिन्हें परेशान करने पर आमादा हो उनमें मिलकर अपने लिए पृथ्वी को ही सुरक्षित करने की जद्दोजहद में लग जाओ। मज़लूमों को उनका हक़ लेने से रोकने की बजाय प्रकृति को मज़े लेकर चबाने वाले इन दानवों के जबड़े तोड़ो। इन पर नज़र रखो। अगर ये तुम्हें फंसाकर भागना चाहे तो इनके कुर्ते-कोट पकड़ कर वापस खींच लो।

(वीना पत्रकार, फिल्मकार और व्यंग्यकार हैं।)








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