‘मौज-ए-सराब’ का विमोचन: हम ही थे जो चलते रहे हवा के ख़िलाफ़...

नई किताब , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 21-09-2017


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जनचौक स्टाफ

नई दिल्ली: “इस नई किताब में मीनू बख़्शी ने मोहब्बत के शायराना इज़हार को सूफ़ियों की तरह बरता है। उनके सीधे और सच्चे अलफ़ाज़, उर्दू की ख़ुशबू को नयी नस्ल तक बख़ूबी पहुंचाते हैं। यह कहना है मशहूर अभिनेत्री शबाना आज़मी का। वह कल गुरुवार को यहां इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में शायरागायिका और जेएनयू की प्रोफेसर मीनू बख़्शी की नई किताब ‘मौज-ए-सराब: waves of illusion’  के विमोचन के मौके पर बोल रहीं थीं।

प्रोफेसर मीनू बख़्शी की किताब ‘मौज-ए-सराब’ का विमोचन।

इस मौके पर जाने-माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली भी मौजूद थे। उन्होंने कहा कि वक़्त के साथ, मीनू का कलाम संवरता ही जा रहा है और उनकी रूहानी जुस्तजू नए आयाम हासिल कर रही है।

कलमकार और डिप्लोमेट पवन वर्मा ने कहा कि वो स्पेनिश की प्रोफ़ेसर हैं जिन्हें उर्दू शायरी तो विरासत में मिली है, ही तालीम के ज़रिये, लेकिन मीनू बख्शी की शायरी में उर्दू की रूह नज़र आती है

जश्न--बहार ट्रस्ट की संचालिका कामना प्रसाद ने कहा कि मीनू बख़्शी का ये नया मजमुआ माडर्न हिन्दुस्तानी औरत के फ़िक्र और एहसासात की अक्कासी बख़ूबी करता है। ये किताब ग़म--ज़ात को ग़म--कायनात बनाती है। समाज और उर्दू शायरी के दरम्यान नए पुल बांधती है।

प्रोफेसर मीनू बख़्शी।

इस मौके पर प्रो. मीनू बख़्शी ने अपने दिल की बात कही। उन्होंने कहा कि उर्दू हमेशा से दिल की ज़बान समझी जाती है जिसकी बुनियाद अमन--मोहब्बत के उसूलों पर क़ायम है। बतौर सिंफ़, उर्दू ग़ज़ल सूफ़ियों और दरवेशों के 

ज़ेर--साया परवान चढ़ी है, लिहाज़ा इसमें जज़्बा--मोहब्बत -दर्जा--अतम और गहराई के साथ मौजूद है।” 

रहता है मेरा दिल तो सदा इज़्तराब में;

जब से निगाह उलझी है मौज--सराब में.

किताब पर बातचीत के बाद, गायकी और कथक की भी प्रस्तुति हुई। कार्यक्रम में मीनू बख़्शी ने अपनी खास ग़ज़लें भी पेश की जिनपर शिवानी वर्मा ने कथक  के ज़रिये भाव पेश किये।

रूपा पब्लिकेशंस इंडिया की ओर से प्रकाशित इस किताब की भूमिका में मीनू बख़्शी कहती हैं कि मैं उर्दू और ग़ज़ल दोनों से मोहब्बत करती हूँ क्योंकि ये मुश्तरका तौर पर मोहब्बत की रौशनी फ़िज़ा में बिखेर कर दिल--रूह को मुनव्वर कर देते हैं।

इस किताब को उर्दू स्क्रिप्ट के अलावा देवनागरी और रोमन में भी पेश किया गया है। अशआर का अंग्रेज़ी तर्जुमा नाइला दाउद ने किया है।

आइए इस ग़ज़ल संग्रह के कुछ ख़ास शेर पर नज़र डालते हैं-

हम ही थे जो चलते रहे हवा के ख़िलाफ़

वगरना वक्त के सांचे में ढल गयी दुनिया

 

मुझे अहद-ए-नौ की निगाहों में पढ़

की मैं भूली बिसरी कहानी नहीं

 

उठ गए पाँव उसी राह में अब तो मेरे 

जिसमें बस जी का है नुक़सान ख़ुदा ख़ैर करे  










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