गिरगिट-गिलहरियों के क्षुद्र स्वार्थ

हमारा समाज , , रविवार , 02-06-2019


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संदीप नाईक

मेरा कहना और मानना है कि पतनशील समाज में अब साहित्य का कोई अर्थ नहीं है और साहित्यकारों को भी यह मुगालते दूर कर लेना चाहिए, मेरे जैसे एनजीओ वाले ने तो तय भी कर लिया है कि अब समाज को और खास करके वंचित, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, असहाय, दिव्यांगी और उपेक्षित लोगों को मदद करने के बजाय असहाय रखना या मदद ना करना (दुत्कारना ज़्यादा बेहतर होता शब्द शायद) ही बेहतर है। क्योंकि जागरूकता का  फायदा जब ऐसे मिले तो - क्या मतलब है इस सबका।

यह एक बेहद स्वार्थी, मौका परस्त और मक्कार समाज है जो आपके पास अपने अधिकारों और हकों की लड़ाई के लिए आता है - शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कुपोषण, आजीविका, सुशासन से सम्बंधित मुद्दों और इकाईयों से लाभ लेने के लिए आपको दुहता है- आपके धन, स्रोतों और जानकारी का दोहन करता है, परंतु भयानक किस्म का साम्प्रदायिक, दलगत और जातिवादी मूल्यों में धंसकर जाति भेदभाव को खत्म करने के बजाय उसे "एन्जॉय" करता है और इसके तमाम तरह के जायज-नाजायज़ फायदे उठाता है और मज़ेदार यह है कि बन्दूक आपके कंधे पर धरता है शातिरी से। 

एनजीओ के लोग अभी इस बात को समझ कर भी नहीं समझेंगे-और यहां ज्ञान देने अलग आ जाएंगे बल्कि लड़ने भी। क्योंकि उनकी रोजी-रोटी, दुकानदारी, अनुदान से लेकर पठन-पाठन, व्यवसाय और अध्येत्तावृतियां इसी से, इन्हीं गरीब-गुर्बों से चलेगी तो वे अभी और मुखौटे पर मुखौटे ओढ़े रहेंगे। ठीक वैसे ही जैसे साहित्यकार, तथाकथित समाजसेवा की आड़ में कवि, कहानीकार , उपन्यासकार, आलोचक, सम्पादक, प्रकाशक और फिल्मकार नंगे हुए और उघाड़े होकर सामने आए, हजार रूपट्टी से लखटकिया पुरस्कार लेने के लिए साहित्यकारों ने इन 5 सालों में क्या क्या नहीं किया। जात बिरादरी के प्लेटफॉर्म से लेकर बिछने तक के धत कर्म किये- जो अब जग जाहिर है।

इन सबका अलिखित और छुपा हुआ एजेंडा सामने भी आया है- मेरे जैसा कोई सच बोलने वाला जब कविता, तथ्य या कोई बात सामने रख रहा है- तो ये निजी बहसों में वाट्स एप या मैसेंजर में इतने भड़क रहे हैं कि सामने होते तो चाकू ही मार देते और इसमें वे स्त्रियां भी शामिल हैं जो ममता की मूरत बनकर वर्षों से मदर टेरेसा का चोंगा ओढ़कर कुशलता से लेखक और समाजसेवी का नाटक कर रही थीं। 

ख़ैर, साहित्यकारों, समाजसेवकों और मीडियाकर्मियों को मुंह धोकर मुगालते समय रहते दूर कर लेना चाहिये। अभी 5 साल बाकी है, कुछ मीडिया वाले तो इतनी बकवास पर उतर आए थे कि उन्हें लगा कि वे तंत्र बन गए और यह भूल गए कि दो रुपये के अखबार में जो सम्पादक ने नहीं छापा यहां उल्टी करते रहे और खुदा बनने लगे  - इस ग्लैमरस बने हुए संजाल को देखने समझने की कोशिश करें। 

हम लोगों की यानी प्रौढ़ पीढ़ी ने जिसने विवि के जड़ और ठस अखाड़ों से लेकर ठेठ जमीनी आंदोलनों में काम किया - साक्षरता का, मजदूर आंदोलन हो, नर्मदा आंदोलन हो, भोपाल गैस त्रासदी, दलित मूवमेंट्स या पंचायती राज के क्रियान्वयन में महिलाओं की भागीदारी का - उन्हें सदमा लगा है - "यह कन्फेशन है",  पर इस सबके बाद भी हम टूटे हैं - पराजित नहीं हैं, और यह मानते हैं कि इस जनता को एक बार बुरी तरह जलील होना ही चाहिये, प्रताड़ित और शर्मसार होना ही चाहिये - ताकि इन्हें समझ आए कि ये क्या डिज़र्व करते हैं और संविधान क्या होता है, लोकतंत्र क्या है। 

जो लोग कल पैदा हुए और अपने आकाओं के तलवे चाटने, शोध उपाधियों और हिंदी पत्रिकाओं में छपने के लिए यहां ज्ञान देने आए अपनी जन्मतिथि भी लिखें क्योंकि इनके जन्म से पहले से हम बंजर जमीन पर हल चला रहे हैं, ख़ैर 

दुष्यंत के साथ अपनी बात खत्म करूंगा 

"हम पराजित है मगर लज्जित नहीं"....

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।) 








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