धर्म परिवर्तन और जय भीम के नारे नहीं बन सकते 21वीं सदी में सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन के हथियार

धर्म-सियासत , , सोमवार , 22-01-2018


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शमशाद इलाही शम्स

मेरे कदीमी क़स्बा मवाना (जिला मेरठ-उत्तर प्रदेश) के नज़दीक एक गाँव है नंगला हरेरू। 1988-89 में यह गाँव राष्ट्रीय अखबारों की सुर्ख़ियों में तब आया था जब इस गाँव के कुछ दलितों ने सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान सिख धर्म कबूल किया था। फिर इस गाँव में एक गुरुद्वारे का शिलान्यास 29 अप्रैल 1989 को अकाली दल नेता लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोरा के हाथों हुआ था। 1988 में पचास और 1989 में 290 दलितों ने अमृत छक कर सिख धर्म कबूल किया था।  मवाना तहसील के अन्य कई गावों पाब्ला, छोटा मवाना, रहावती, किशोरपुर, नया गाँव, खालदपुर जैसे गाँवों के दलितों का ये धर्म परिवर्तन अख़बारों की जमकर सुर्खियां बना। यह वही दौर था जब पंजाब सिख अतिवादी आन्दोलन से लगातार सिहर रहा था, ऐसे हालात में सत्ता संस्थानों में इन ख़बरों से हडकंप मच गया था, कांग्रेस, आर्य समाज और संघ दलित समाज में हो रही इस प्रतिक्रिया को कुचलने के लिए दिन रात एक कर रहे थे।

नंगला हरेरू में दरअसल 1988 के ग्राम पंचायती चुनाव के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया था, ध्यान रहे इस गाँव में बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की है, गाँव का प्रधान मुसलमान था, जमींदार मुसलमान था और मुसलमानों ने दलितों पर जमकर उत्पीड़न किया था। यह दलितों द्वारा धर्म बदलने का पहला अध्याय नहीं था, 1950 और 1960 की दहाई में रिपब्लिकन पार्टी के प्रभाव और उसके आह्वान पर नंगला हरेरू के दलित बौध धर्म में शामिल हो चुके थे। मुसलमान प्रधान के गुंडों द्वारा इस गाँव के दलितों पर आक्रमण से कुछ दिन पहले हापुड़ के नज़दीक सोठावाली गाँव में जाटों ने एक साथ तीन दलित पत्रकारों की हत्याएं करके सनसनी फैला दी थी।

इसी गाँव के पास दूसरे एक गाँव में राजपूतों ने दलितों के साथ मारपीट की थी। इसलिए कुल मिलाकर इलाके में दलितों के लिए एक भय का वातावरण था। जिससे बाहर निकालने के लिए प्रतिक्रिया के रूप में दलितों ने सिख धर्म अपनाने का रास्ता चुना था। नंगला हरेरू की घटना से एक बात साफ़ हो गयी कि दलित उत्पीड़न में हिन्दुओं की दूसरी अगड़ी जातियों की तरह मुसलमान भी कम नहीं हैं। हाँ कुछ कम है तो कुछ ज्यादा बस इतना फर्क हो सकता है।

नगला हरेरू की कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती है। दरअसल कहानी का यहाँ से आग़ाज़ है। धर्म परिवर्तन की इस घटना के बाद जो राजनैतिक और सामाजिक प्रतिक्रियायें हुईं। वह बहुत दिलचस्प हैं। उन दिनों सिखों को आतंकवादी बता कर उनके नौजवान लड़कों को मारा जा रहा था। उत्तर प्रदेश में भी ऐसी घटनाएँ हुईं। सो कुछ नव सिख दलितों ने बढ़ाये हुए सर के बाल कटा लिए थे और छुप कर सिख बने रहे। लेकिन कुछ दलित परिवारों में इस बात को लेकर तनाव पैदा हो गया, जिनके भाई बंद सरकारी नौकरी में थे। उन्होंने सिख धर्म कबूल करने वालों पर प्रेशर डाला कि अनुसूचित जाति-जन जाति के नाम पर मिलने वाली सुविधाएँ सिख बनने के बाद नहीं मिलेंगी। कांग्रेस और आर्य समाज ने अपने तरीके से इन नव सिखों की घर वापसी के अभियान चलाये और बाकायदा 'शुद्धीकरण शिविर' लगा कर तीन दिन का समारोह भी किया गया।

इस मुद्दे पर प्रोफ़ेसर जगपाल सिंह का रिसर्च पेपर 'Ambedkarisation and Assertion of Dalit Identity,Socio-Cultural Protest in Meerut District of Western Uttar Pradesh’ Ecomonic and Political Weekly Oct 3,1998 में प्रकाशित हुआ है। उसमें धर्म परिवर्तन और फिर घर वापसी करने वाले दलित लोगों के साक्षात्कार भी हैं। उसमें दलितों की संस्कृति पर जिक्र करते हुए लिखा गया है कि दलित बस्तियों में रविदास मंदिर, या डाक्टर आंबेडकर की प्रतिमा, उनके जन्मदिन पर होने वाले समारोह, दैनिक रहन सहन, देवी-देवता, धार्मिक मेले, दलितों में होने वाली शादियों, तीज-त्यौहारों में हिन्दुओं की भांति ही व्यवहार किया जाता है। 

दरअसल दलितों को सबसे अधिक समस्या हिन्दू रूढ़िवादिता से है, यदि हिन्दू धर्म और समाज अपनी रुढ़ियों में परिवर्तन कर ले और उन्हें समाज का सहज अंग बना ले तो उन्हें हिन्दू रहने में कोई समस्या नहीं। दलितों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करना इतना आध्यात्मिक कर्म नहीं था जितना कि वह एक राजनैतिक पैंतरा था ताकि उन्हें खो देने वाला समाज एक झटका खाकर सुधर जाए। और नतीजतन दलितों के जीवन में कुछ मूलभूत सुधार हों। नंगला हरेरू के दलितों द्वारा सिख धर्म कबूल करना डाक्टर आंबेडकर द्वारा किये गए 14 अक्टूबर 1956 में बौध धर्म परिवर्तन का ही दूसरा अध्याय था।

नंगला हरेरू के दलित समाज द्वारा डाक्टर आंबेडकर को सिरहाने रख कर सिख धर्म अपनाना अपने आप में आंबेडकर का खंडन करना था, यदि वह आंबेडकरवादी होते तो 1930 की दहाई में डाक्टर आंबेडकर और सिख नेता मास्टर तारा सिंह के साथ उनकी खतो-किताबत का इल्म होता और उन वजुहात का भी इल्म होता जिसके तहत सिख धर्म उनकी पसंद का पहला धर्म होने के बावजूद वह उसे अपना नहीं सके, खैर यह बहस का एक अलग विषय है।  

इस अध्ययन पत्र को पढ़ने के बाद जो स्वाभाविक प्रश्न उठता है, वह यह है कि जिन लोगों ने डाक्टर आंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था क्या उनके जीवन में कोई सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक बदलाव आया? बौद्ध धर्म की चादर ओढ़ने के बाद क्या उनमें से भी कोई वापस हिन्दू धर्म में आया? आया तो उसके क्या सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक कारण थे? भारतीय राज्य द्वारा दलितों को आरक्षण के नाम पर दी जाने वाली सुविधाएँ उन्हें हिन्दू धर्म की परिधि में बनाये रखने का उपक्रम नहीं है? क्या डॉक्टर आंबेडकर द्वारा दलित समाज के लिए सरकारी सुविधाएँ देने की पुरजोर मुहिम और फिर अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले ही हिन्दू धर्म का दामन छोड़ कर बौद्ध धर्म की शरण में जाना अपने आप में अंतर्विरोधी नहीं है?

क्या धर्म परिवर्तन दलित राजनीति का प्रतिक्रियावादी रूप नहीं है जिसे आज भी तथाकथित अम्बेडकरवादी नेता अक्सर धमकी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। ध्यान रहे भीमा-कोरेगांव की घटना के बाद मायावती ने भारत के हिन्दू खलीफाओं को धमकी भरे अंदाज़ में कहा था कि यदि हिन्दू समाज सुधर नहीं जाता तो वह अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध हो जायेंगी।

1956 के बाद से वोल्गा से गंगा तक बदलाव का कितना पानी गुजर चुका है, हमें मालूम है। डाक्टर आंबेडकर यदि विज्ञान के इस युगांतकारी युग के खुद गवाह होते तो यकीनन धर्म के बारे में उनके वह विचार नहीं होते जो 1956 में थे। विज्ञान, सूचना और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जितनी प्रगति पिछले 20-30 सालों में हुयी वैसी प्रगति मानवजाति के इतिहास में पहले दर्ज नहीं हुई। लिहाजा धर्म के बारे में डाक्टर अम्बेडकर के 1950 की दहाई के उपदेशों को मान लेना किसी भक्त का काम ही हो सकता है। बुद्धिवादी का नहीं।

इंसान को धर्म के आडंबर से बचाना ही किसी बुद्धिवादी की प्रथम प्राथमिकता हो सकती है। लेकिन व्यक्ति पूजक, विज्ञान रहित सोच वाले नेतृत्व का भक्त बनना और भक्त बनाने में जो स्वाद मिलता है उसके फायदे मायावती जैसी नेत्री से अधिक और कौन जान सकता है? दुनिया के किसी दार्शनिक के अनुयायी को क्या आपने कभी जय सुकरात, जय प्लोटो, जय अरस्तु, जय अरबिंदो या जय मार्क्स कहते सुना है? लेकिन जय भीम वालों की बीन  लगातार सुनाई देती है, ठीक जय हनुमान, जय श्रीराम वालों की तरह। जय भीम का उद्घोष अपने आप में हिन्दू उद्घोषों की तरह की ही पुनरावृति है, अपनी अंतर्वस्तु में, गुणों में जय भीम, जय श्रीराम से किसी भी तरह से अलग नहीं है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। 'जनचौक' का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

(शमशाद इलाही शम्स वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। यूपी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े शम्स आजकल कनाडा में रहते हैं।)










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