बुद्ध से कबीर तक एक यात्रा

विशेष , , शनिवार , 24-03-2018


buddha-to-kabir-journey

जनचौक स्टाफ

आज जब धर्म-जाति का बंटवारा बढ़ रहा है। अंधविश्वास सर उठा रहा है। कट्टरता-सांप्रदायिकता हमारे समाज पर एक बार फिर हावी हो रही है तो ऐसे में तमाम महापुरुषों के साथ हमें बुद्ध और कबीर सबसे ज़्यादा याद आते हैं। हमारे लिए वह आज कल से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं।

 

बुराई से बुराई को कभी ख़त्म नहीं किया जा सकता। बुराई को केवल प्रेम से समाप्त किया जा सकता है।

- महात्मा बुद्ध

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी, मरम न कोउ जाना

- कबीर दास

 

बुद्ध और कबीर, पूर्वांचल के दो ऐसे प्रतीक हैं, जिन्होंने सदियों पहले रूढ़ियों और मान्यताओं के दलदल में जकड़े समाज को उससे निजात दिलाने और सामाजिक सौहार्द और आपसी प्रेम-भावना बढ़ाने के लिए एक मुहिम छेड़ी थी। दो अलग-अलग कालखंडो में शुरू की गए उनकी मुहिम का व्यापक असर सिर्फ पूर्वांचल तक सीमित न होकर देश-विदेश में रहनेवाली अन्य मानव सभ्यताओं पर भी पड़ा और मानव सभ्यता ने एक नयी करवट ली। उनके द्वारा कही गई बातें हमारे लिए आज एक बार फिर पढ़ने, समझने और दोहराने की ज़रूरत है।  

यात्रा का निमंत्रण पत्र।

शायद यही वजह है कि सर्व-समाज के सर्वांगीण विकास का उद्देश्य लेकर चलने का दावा करने वाले एसएमआर (SMR) ट्रस्ट, गोरखपुर ने विनोद कुमार मल्ल (IPS, ADGP, गुजरात पुलिस) के नेतृत्व में मानव सभ्यता के इन दो महान प्रतीकों के वचनों को “बुद्ध-कबीर यात्रा” द्वारा फिर से याद कर समाज की नयी पीढ़ी को उससे अवगत कराने की सोची है।

यह यात्रा 5 अप्रैल को कुशीनगर (बुद्ध महापरिनिर्वाण स्थल) से शुरू हो मगहर (कबीर देहत्याग स्थल) होते हुए 7 अप्रैल को 80 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर गोरखपुर यूनिवर्सिटी में संपन्न होगी। ट्रस्ट ने देश-विदेश और समाज के सभी धर्मो और वर्गों के लोगों को इस यात्रा में शामिल होने का आह्वान किया है।

ट्रस्ट की ओर से साफ तौर पर यह ऐलान किया गया है कि यह यात्रा शुद्ध रूप से गैर-राजनैतिक यात्रा होगी हालांकि इसमे सभी लोग आमंत्रित हैं। यात्रा के किसी भी चरण में राजनैतिक बैनर, पोस्टर, नारे इत्यादि की सख्त मनाही है।










Leave your comment











UdayGuru :: - 03-24-2018
आज भी बुद्ध और कबीर उतने ही प्रासंगिक हैं जितने आज से 2500 व 500 साल पहले थे।