पूर्वांचल की पथरीली जमीन पर बुद्ध से कबीर तक की यात्रा ने सजाया उम्मीदों का नया बागबां

हमारा समाज , , सोमवार , 04-03-2019


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यशस्विनी पाण्डेय

हमारे देश की संस्कृति हमेशा समन्वयकारी रही है इसलिए यह प्रवाहमान रही और इसीलिए यह संस्कृति एक महान संस्कृति का गौरव पा सकी l जब कभी हमारी संस्कृति की धारा अवरुद्ध हुई, या अपनी गति और दिशा से भटकी, तब-तब भारत की इस उर्वरा मिट्टी से ऐसी प्रतिभाओं ने जन्म लिया है; जिन्होंने मानवीयता की रक्षा की l बुद्ध और कबीर ऐसे ही मानवीय महापुरुष थे l उनकी चेतना अपने समय के सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण के प्रति पूरी सजग थी l वो चाहते थे कि भारत में विविधता के बावजूद सम्पूर्ण मानव व भारत अपने को एक अनुभव करे l

लम्बे समय तक हमारे देश पर विभिन्न आक्रमण होते रहे फिर भी भारतीय समाज और भारतीय संस्कृति अपना स्वरूप व एकता बचाए रखे हैं इसमें ऐसे ही महापुरुषों का अथक योगदान है l कभी-कभी संस्कृति व समानता को बचाए रखने के लिए महापुरुष की ही नहीं ‘इंसान’ जो तमाम बुराइयों-अच्छाइयों से युक्त होता है के प्रयासों की उतनी ही जरूरत और महत्ता होती है l गुजरात के डीजीपी डॉ विनोद मल्ल एक ऐसे ही इंसान हैं जो अपनी ‘बुद्ध से कबीर तक’ यात्रा और एकता के विचार चिंतन द्वारा भारत के लोगों में एकत्व की भावना जगाने व भरने की कोशिश कर रहे हैं l

भारत की महान, धर्मनिरपेक्ष और विविधता पूर्ण संस्कृति के प्रचार प्रसार व रक्षा के लिए हम बार-बार इतिहास की तरफ लौटते हैं और ऐसे महापुरुषों के जीवन ,विचार और आदर्शों को याद करते हैं ,पढ़ते हैं और उसे अपने व्यवहारिक जीवन में लागू करते हैं l हमारे समय में इनकी जरूरत और बढ़ गयी है l इस जरुरत को डॉ विनोद मल्ल ने समझा पहचाना और इस पर काम भी किया l प्रश्न ये है कि क्या है हमारा समय? कैसे हम अपने समय को परिभाषित करें ? इस समय को पहचानते हुए विनोद मल्ल का कहना है ‘हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जिसमे हर व्यक्ति किसी न किसी कारण असुरक्षित और दिग्भ्रमित महसूस करता है l किसी भी तरह के वैचारिक संवाद की संभावना ख़त्म हुई है l हिंसा के प्रति सहज स्वीकृति का भाव उत्पन्न हुआ है l जाति-धर्म ने विकृत रूप ले लिया है l तमाम तरह की असमानताएं व असंतुलन पसर गया है समाज में मन में l

किसी भी व्यक्ति से पहली मुलाकात में ये सवाल कि आपका सरनेम क्या है? आपका मज़हब क्या है ? ये क्या है ? किसी भी व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर व्यक्तित्व के आधार पर नहीं आंका जा रहा l उसकी किसी न किसी पहचान के आधार पर आकलन किया जाता है l वो पहचान धर्म ,राजनीति,जाति, पुरुष-स्त्री ,दलित, अल्पसंख्यक, संभ्रांत, कुलीन जैसे वर्गीकरण हो गए हैं l सबका अपना-अपना खेमा हो गया है’ l इसी खेमे को एक करने की प्रतिबद्धता से उन्होंने पिछले साल भी यह यात्रा निकाली और इस साल भी l  इस यात्रा का उद्देश्य अपनी ऐतिहासिक विरासत के साथ परम्परा को सहेजना इसके साथ ही बुद्ध ,महावीर, दादू, नानक, कबीर और गांधी के जीवन दर्शन के माध्यम से अपने विविधतापूर्ण और बहु-संस्कृतिवादी राष्ट्र की संरचना को मिलकर मजबूत करना है जिससे हमारी साझी संस्कृति एवं संवैधानिक राष्ट्रवाद को मजबूती मिल सके |

आयोजन का एक दृश्य।

डॉ मल्ल कहते हैं कि-‘धर्म’ का अर्थ है मानव जाति को समाज के हित में उच्चता की ओर प्रेरित करना न कि मनुष्य को बन्धनों में जकड कर उसके विकास को रोकना’ l बुद्ध और कबीर ही क्यों ? इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं ‘हजारों वर्षों पूर्व इनका जन्म हुआ था लेकिन आज भी इनके विचारों की प्रासंगिकता है, ताजगी है, यथार्थ है l इनके चिंतन हमारी सांस्कृतिक निधि की अमूल्य धरोहर है’’ l  सच यही है कि 21वीं सदी मनुष्य के इतिहास में एक ऐसा समय है जिसमे अपनें पीछे छूटते जा रहे इन सब पहचान के चक्कर में इंसान इंसान से दूर जा रहा l हर तरह के मूल्यों को लेकर मान्यताओं को लेकर हमारे मन में संदेह है l मानवता को उसके पूरी समग्रता के रूप में देखने की आवश्यकता है l हम भले एक स्वतंत्र देश में रह रहे जिसमे हमे तमाम तरह की समानता ,स्वतंत्रता प्राप्त है पर समन्वयवादिता का कहीं लोप होते जा रहा l 

विनोद मल्ल का मानना है कि ‘सम्पूर्ण भारत का वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक दृश्य आज भ्रमित है’ । चूँकि डॉ विनोद मल्ल पूर्वांचल के हैं तो उस क्षेत्र के लोगों, वहां की असमानताओं व समस्याओं को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं l उनका कहना है -यह क्षेत्र जो कि संस्कृति और इतिहास के दृष्टिकोण से अत्यंत समृद्ध रहा है, आज अपना सामाजिक पटल गहन राजनीतिक चर्चा को दे चुका है। इस इलाके के लोग राजनीतिक रूप से बहुत जानकार हैं और इसलिए किसी भी विषय पर मजबूत राजनैतिक रवैया लेते हैं। पर विडंबना ये है कि ये लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत में गौरव अनुभव करना छोड़ चुके हैं। सामाजिक विमर्श के नाम पर अब सिर्फ नकारात्मक राजनीतिक चर्चाएं होती हैं। राजनैतिक ध्रुवीकरण के कारण चर्चा-विमर्श की प्रखरता में तेजी आई है। एक दूसरे के विचारों के प्रति सहनशीलता कम हुई है। इतिहास का सेलेक्टिव प्रयोग और उसके सामान्यीकरण ने सामाजिक और सांस्कृतिक चर्चा के लिए जगह अत्यंत कम कर दी है ।

एक स्वस्थ, सकारात्मक व संतुलित जीवन के लिए किसी भी समाज में सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विचार के बीच समन्वय और सामंजस्य होना आवश्यक है। इस सामंजस्य को पुनर्स्थापित करने के लिए और एक बहु-सांस्कृतिक, विस्तृत सामाजिक पटल का निर्माण करने के लिए गोरखपुर स्थित एस एम आर ट्रस्ट द्वारा बुद्ध से कबीर तक यात्रा का आयोजन 2 साल से किया जा रहा । इस यात्रा के नाम "बुद्ध से कबीर तक" का चयन करने के पीछे एक महत्वपूर्ण तर्क है। किसी भी यात्रा का शुरुआती और अंतिम बिंदु निश्चित होना चाहिए। कुशीनगर और मगहर ‘गोरखपुर’ शहर के दो तरफ स्थित हैं। एक बुद्ध से जुड़ा हुआ है, दूसरा कबीर से जुड़ा हुआ है और यह दूरी करीब 80 किलोमीटर है जो इस यात्रा के लिए अत्यंत उपयुक्त पाई गई।  इसलिए इस यात्रा का नाम "बुद्ध से कबीर तक" चुना गया। इस साल उसे अंतर्राष्ट्रीय रूप देते हुए नेपाल के लुम्बिनी ,भैरहवा ,सोनौली ,नौतनवा से भी जोड़ा गया l

यह यात्रा सिर्फ बुद्ध और कबीर को पूर्वांचल के दो महान सांस्कृतिक,दार्शनिक और ऐतिहासिक महापुरूषों के रूप में ही नहीं प्रदर्शित करती है बल्कि यह बुद्ध और कबीर के बीच के 2000 वर्ष के इतिहास को भी प्रदर्शित करती है। यह इस इलाके की इंक्लूसिव सोच को, भारतीय संस्कृत के विकास को जिसने सदियों से अलग-अलग जातियों, धर्मों, नस्लों और भाषाओं को अपने अंदर समाहित किया है और समाहित करने के बाद एक बहु विविधतावादी, बहु-संस्कृतिवादी समाज का निर्माण किया है, को भी प्रदर्शित करती है।

पिछले हजारों वर्षों में इस इलाके में अनेक महापुरुष, शासक,.कवि,  सामाजिक क्रांति करने वाले लोग हुए और उन्होंने एक विशेष प्रकार का विविधतावाद भारतवर्ष को दिया। इस प्रक्रिया में सारे धर्मों और संस्कृतियों के लोग एक दूसरे से मिल जुल कर रहते हुए, एक दूसरे से सीखते हुए अपने आप को सुधारते हुए आगे बढ़ते रहे। हांलाकि बीच-बीच में कई ऐसे प्रयास हुए जिसमें इस एकता को तोड़ने की कोशिश की गई लेकिन हर ऐसे प्रयास के बाद भारत और विशेष कर पूर्वांचल ज्यादा मजबूत होकर उभरे क्योंकि इसमें एक अंतर्निहित शक्ति है अपने आप को मजबूत बनाने की, अपने आप से सीखने की और अपने आप को सुधारने की।

आयोजन का एक दृश्य।

पूर्वांचल का एक गौरवशाली सांस्कृतिक दार्शनिक और धार्मिक इतिहास रहा है, यह क्षेत्र आजादी के बाद एक लघुता ग्रंथि से पीड़ित रहा है। सरकारों द्वारा होने वाली उपेक्षा और एक सामंतवादी सोच के कारण समाज मे लगातार नकारात्मकता व असमानता रही है। समाज अभी तक एक प्रजातांत्रिक तरीके से विकेंद्रीकृत सरकार की अभाव मे विकास नहीं कर पाया है। इस परिस्थिति में आवश्यकता है कि एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान किया जाए और पूर्वांचल को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ा जाए। लोगों में इस परंपरा पर गौरव की भावना खड़ी की जाए जिसमें बुद्ध,कबीर,महावीर और तुलसी जैसे महान महापुरुष शामिल हों। समाज को अपने अंदर के जाति और धर्म पर आधारित भेदभाव को दूर करना होगा और साथ रहने की भावना और बहुसंस्कृतिवाद के मूल्यों को एक खूबसूरत समाज की स्थापना में शामिल करना होगा। यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद में समाज की सारी ऊर्जा विकास का एक बड़ा कदम लेने की तरफ प्रेरित करेगी। इसमें लोगों की भावनाएं, आकांक्षाएं, लोगों की शक्ति अच्छी तरीके से लग सकेगी और समाज में जाति, धर्म, लिंग,और भेदभाव पर आधारित व्यवस्था को नकार सकेगी। अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गौरव लेना ही बुद्ध से कबीर तक यात्रा का प्रमुख उद्देश्य है ;जो कुशीनगर से मगहर गोरखपुर लुम्बिनी होते हुए यात्रा आयोजित की गई।

यात्रा के लिए प्रचार करना डॉ मल्ल के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी l व्यक्तिगत रुप से वो काफी अनिश्चित भी थे, इसे लेकर क्योंकि यह बिल्कुल नया व संघर्ष से भरा चुनौती वाला काम था। उनके सामने प्रश्न थे- क्या इस यात्रा में लोग शामिल होंगे ? क्या इसका जो असर हम चाहते हैं वह असर होगा? हम लोगों को यात्रा के लिए आकर्षित करने के लिए क्या करें? क्या करने से यात्रा का असर होगा? बहुत ही सीमित संसाधनों के होते हुए मीडिया कैंपेन किस तरीके से किया जाए ?बहुत सारी अनिश्चितताएं उनके सामने थीं। सबसे बड़ा सवाल और सबसे पहला सवाल था यात्रा के लिए लोगो डिजाइन करने का। लोगो अत्यंत ही आकर्षक और भावपूर्ण है लोगो के एक तरफ बुद्ध का चेहरा है दूसरी तरफ कबीर का चेहरा और दोनों के बीच में भारत के 2000 वर्ष के वित्त पूर्ण और बहुसंस्कृतिवाद के संदेश से भरा हुआ यात्रा का नाम ‘बुद्ध से कबीर तक’।

बुद्ध का शांति और अहिंसा का संदेश तथा कबीर का भाईचारा और पाखंड के खिलाफ विचारधारा लोगों तक ले जाना है। आज धार्मिक और जातिवादी कारणों से समाज में बटवारा हो रहा है। संस्कृति को अपनी खोई हुई जगह फिर से प्राप्त करनी है। समाज को बांटने वाले दुष्प्रचार को हमें नकारना है । यात्रा के लिये लोगों का प्रतिभाव बहुत ही उत्साहवर्धक था। लोग समाज में एक शांतिपूर्ण वार्तालाप चाहते हैं।  इस देश के लोग प्रजातंत्र में जरूर यकीन करते हैं लेकिन अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं का मसलों का गैर राजनीतिक तरीके से हल ढूंढना चाहते हैं। इस प्रकार का प्रयास आजकल समाज को बांटने वाली राजनीति का सामना करने के लिए एक सक्षम प्रयास है। यह यात्रा भविष्य में होती रहेगी ।  

इस पद यात्रा की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें हर वर्ग-जाति उम्र,मजहब के लोग शामिल होते हैं l सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, व्यापारी, विद्यार्थी ,शिक्षक, नेता सामाजिक कार्यकर्ता बल्कि कोई भी राह चलते इस यात्रा की सकारात्मकता से खिंचाव महसूस करते हुए कुछ कदम चल कर इसका हिस्सा बन जाता है l ये सभी लोग यात्रा में न सिर्फ शरीक हुए बल्कि एक सक्रिय भागीदारी अदा की। उन सबका कहना था कि यात्रा का थीम उन्हें अत्यंत पसंद आया । कबीर को बुद्ध से जोड़ने की बात पहली दफा की जा रही थी। यह पहला प्रयास था । इससे पहले लोगों ने बुद्ध को जाना था, बुद्ध को माना था,  कबीर को जाना था, कबीर को माना था। लेकिन कभी किसी ने कबीर और बुद्ध को साथ लेकर यात्रा के रुप में या किसी और रूप में समाज के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया था।

यह प्रयोग उन को आकर्षित करने में सफल रहा। कई और लोगों ने बताया कि शहर में यात्रा के पोस्टर देखकर वह ठहर जाते थे। रुक जाते थे,पोस्टर पर नजर करते थे और उनको यह लगता था कि यह चीज कुछ नई है। इसमें मन को शांति मिलती है। यह कहीं से आध्यात्मिकता से जोड़ता है, अपनी संस्कृति से जोड़ता है, संवेदना व समानता के भाव जगाता है और एक नयापन लिए हुए सामाजिक समरसता का संदेश देता है । लोगों में इस यात्रा के लिए उत्सुकता थी वह जानना चाह रहे थे कि इस यात्रा का उद्देश्य क्या है और किस लिए निकाली जा रही है। 

यात्रा के उद्घाटन कार्यक्रम से लेकर यात्रा के समाप्ति तक डॉ मल्ल ने यात्रा के उद्देश्यों को बताने की कोशिश की जिसने जिज्ञासा जाहिर की उससे भी जिसने जिज्ञासा रहते हुए पूछ न सके उन्हें भी l यात्रा का मकसद ही समाज के अलग-अलग वर्गों को, अलग-अलग संप्रदाय को,अलग-अलग जातियों को जोड़ना था और सबकी बराबरी और भाईचारे की बात करनी थी जो कि यात्रा की शुरुआत में ही दिखने लगा। कई लोग आपस में विरोधी विचारधारा होने के बावजूद एक दूसरे के साथ बातें करते हुए बुद्ध और कबीर के आध्यात्मिक प्रभाव में उनकी विचारधारा को लोगों तक ले जाते हुए साथ-साथ चल रहे थे। यह जुड़ाव ही उनकी यात्रा की सफलता का लक्ष्य था l मीडिया और शहर जनों में यात्रा के प्रति उत्साह और जानने की इच्छा थी। लोग सड़क के किनारे खड़े होकर यात्रा का स्वागत कर रहे थे। लोगों के चेहरे पर एक सकारात्मकता और एक उम्मीद की झलक स्पष्ट दिख रही थी । इसके साथ ही लोगों में जो उत्साह देखा गया ,जो लालसा देखी गयी वह बहुत ही सकारात्मक थी। लोगों को लग रहा था कि- ‘यात्रा कुछ अच्छे के लिए है, समाज के हित में है, समाज में भाईचारा और प्रेम बढ़ाने के लिए एक पहल है। विनोद यात्रा के इस पद यात्रा के लिए ये पंक्ति प्रासंगिक है -

पथिक ही है पथ की गरिमा / निज गौरव की पहचान है                                       

पथ ही उनकी जीवन ज्योति/ जो पथिक अविराम हैं

ये यात्रा पूर्ण रूप से गैर राजनैतिक थी पर फिर भी यात्रा के मार्ग में कई राजनीतिक व्यक्तियों ने भी यात्रा का स्वागत किया पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यात्रा से जुड़ते समय राजनीतिक लोगों ने भी राजनीति को पीछे छोड़ दिया सिर्फ बुद्ध और कबीर की भावनाओं और विचारों को साथ लेकर यात्रा के साथ जुड़े। यही यात्रा की भावना थी, यह यात्रा के विचार थे और यही यात्रा का मकसद था। भारत की महान साझी संस्कृति और बहुसंस्कृतिवादी , धर्मनिरपेक्ष परंपरा को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए 100 क़दम चलिए बुद्ध से कबीर तक यात्रा के साथ l अब ये यात्रा शुरू हो चुकी है पूर्वांचल से सीमा पार तक, सड़क से घर-घर तक ,मन से अध्यात्म तक ,असंतुलन से संतुलन तक , जड़ता से गतिशीलता की ओर ,नकारात्मकता से सकारात्मकता और अंतस की अपूर्णता से पूर्णता की ओर l  










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