इंसान की मौत पर जश्न, मानवता की बर्बादी की तरफ बढ़ते कदम

मत-मतांतर , , सोमवार , 02-10-2017


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(उदय चे और उषा शम्मी का संयुक्त आलेख)

आप प्रत्येक साल रावण का पुतला दहन करके "अधर्म पर धर्म की जीत" का नारा देकर खुशियों में डूब जाते हो। आपके प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक रावण को मारने की ख़ुशी बधाई संदेश से भरे मिलते हैं। ये हर साल पिछली साल से ज्यादा ही होता है। क्या किसी इंसान को मारने की ख़ुशी मनानी चाहिए। ये ख़ुशी मनाने की प्रृवत्ति आपको एक अँधेरी गुफा में ले जा रही है जहां मानवता का सिर्फ सर्वनाश के सिवा कुछ नहीं है।

युद्ध से किसे फायदा?

हजारों साल पहले 2 राजाओं की लड़ाई हुई। एक राजा मारा गया। उसके राज्य को जीतने वाले सम्राट ने अपना उपनिवेश बना लिया। इस युद्ध में हजारों सैनिक दोनों तरफ से मारे गए। मांओं की गोद उजड़ गई। पत्नी-बच्चे अनाथ हो गए। उसके पहले भी और बाद में भी आज तक राजाओं के बीच खुद की समस्याओं, खुद की राजनीतिक लालसाओं, खुद की लूट, खुद के स्वार्थ के लिए युद्ध होते रहे हैं। इन लड़ाइयों में दोनों तरफ से लाखों लोग मारे जाते हैं सैनिक भी, आम नागरिक भी बहुत बार सम्राट भी मारा जाता है।

रामायण सीरियल का एक दृश्य। साभार : गूगल

लेकिन इन लड़ाइयों से फायदा किसको हुआ इसका अगर ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाये तो फायदा सिर्फ जीतने वाले सम्राट को और उसके साझीदारों को हुआ है। लेकिन जनता को इन लड़ाइयों से नुकसान के सिवा कभी कुछ मिला ही नहीं।

लेकिन फिर भी जनता युद्ध लड़ने के लिए सेना में शामिल होती है और युद्ध लड़ती है? बहुमत जनता भी युद्ध-युद्ध चिल्लाती है? दूसरे देश के नागरिक या सैनिक जब मरता है तो ख़ुशी मनाती है? ये हाल दोनों तरफ बराबर होता है। हजारों साल पहले जब राजशाही थी तो हम मान सकते हैं कि सम्राट की मुखालफत करना मौत को बुलाना है इसलिए आपको सैनिक बनना ही पड़ेगा, युद्ध लड़ना ही पड़ेगा। लेकिन आज लोकतांत्रिक माहौल होने के बाद भी आप सेना में शामिल होते हो और सम्राट और उसके साझीदारो के फायदे के लिए देश के अंदर भी और बाहर भी युद्ध लड़ते हो। युद्ध का विरोध करने की बजाय आम जनता भी ख़ुशी का इजहार करती है।

इसका कारण क्या है। क्यों आप कभी ये नहीं सोचते की आप जिसको मार रहे हो या मरे हुए पर खुशी मना रहे हो उस इंसान को आप जानते थे। उसने कभी आपको नुकसान पहुंचाया, कभी वो मिला आपसे, वो आपका दुश्मन भी नहीं था।

ये सब नहीं था तो फिर क्यों आप उसके मरने पर खुशी मना रहे हो। क्यों आप चिल्ला रहे हो की मारो मारो मारो?

आपको बनाया जा रहा है वहशी

इसको समझने के लिए आपको सबसे पहले ये समझना पड़ेगा की आपको धीरे-धीरे वहशी दरिंदा बनाया गया है, वहशी दरिंदा आपको बनाया किसने?

आज आप इस जानवरों वाले हालात में जो पहुंचे हो इसके पीछे नफा नुकसान किसका है। वो ये सब क्यों कर रहा है। इसके पीछे जो लूट तंत्र का जो खेल है इसको समझना जरूरी है।

आज तक जितने भी सम्राट हुए हैं उन्होंने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए युद्ध किये हैं। अब साम्राज्य बढ़ेगा तो किसको फायदा होगा। ऐसा तो होगा नहीं की किसान-मजदूरों को वहाँ के किसानों मजदूरों की जमीन छीन कर दे दी जायेगी। वहां के ऐशो आराम की वस्तुएं यहाँ के लोगो को दे दी जायेंगी। ऐसा कभी नहीं होगा। जो होगा, वो ये होगा की सम्राट और उसके लुटेरे साझीदारों को नये गुलाम बनाये गए मुल्क को लूटने का मौका मिल जायेगा। वहाँ से इन लुटेरों की आमदनी बढ़ जायेगी। फिर आपको मतलब सैनिकों या आम नागरिकों को क्या मिलेगा इस युद्ध से, युद्ध से उनको मिलेगी मौत और सिर्फ मौत।

मौत क्यों?

क्योंकि जिस देश को आप गुलाम बनाओगे उस देश के नागरिकों को लूटोगे। वहाँ के जल-जंगल-जमीन को आपके सम्राट और उसकी लुटेरी मंडली लूटेगी। वहाँ के नागरिकों से आप ज्यादा काम लोगे, खाने को कम दोगे। तो क्या वो चुप बैठेंगे? वो वहाँ विद्रोह जारी रखेंगे। वो फ़ोर्स पर हमले करेगे। फ़ोर्स में आपके भाई-बेटे हैं। आप उनकी हार पर खुशी मना रहे थे तो वो आपको अपना दुश्मन समझेंगे तो वो मानव बम बनकर आपके देश में घुसेंगे आपकी भीड़ में शामिल होकर बम फोड़ देंगे। अँधा धुंध फायरिंग भीड़ पर कर देंगे। गाड़ी चढ़ा देंगे भीड़ पर

आप चिल्लाओगे आतंकवाद आतंकवाद आंतकवाद

इस आतंकवाद का ज़िम्मेदार कौन?

अब चिलाते रहो। इस आतंकवाद के जिम्मेदार आप ही तो हो। आप अगर सम्राट का साथ देने से मना कर देते तो ये लोग गुलाम बनते, इनको गुलाम बनाये रखने के लिए आपके बच्चों की सैनिक के तौर पर वहाँ तैनाती होती, तैनाती होती तो वो मरता, इनके जल-जंगल-जमीन-पहाड़ तबाह होते और ये आपको दुश्मन मानते आपको आपके बच्चों को मारते। लेकिन आप लड़ते क्यों है जब आपको कोई फायदा ही नहीं होना इस लड़ाई से तो आप क्यों किसी को मारते हो और क्यों ख़ुशी मनाते हो किसी की मौत पर।

आप लड़ते क्यों हो?

जब दास प्रथा थी, मालिक मनोरंजन करने के लिए अपने-अपने दासों को आपस में लड़ाते थे जैसे आजकल कुश्ती होती है। जनता भी बहुतायत में इकठ्ठा होती मतलब इकठ्ठा की जाती थी, उस खेल को दिखाने के लिए। जनता अपने-अपने मालिक के पक्ष में और दास खिलाड़ी के पक्ष में खूब नारे लगाती।

ये खेल खूनी खेल होता था। ये खेल तब तक चलता रहता, जब तक एक खिलाड़ी मर जाये। अब विजेता खिलाड़ी के पक्ष में उसकी तरफ वाले खूब जय जयकार करते, मालिक की जयकार होती विजेता लोग खूब खुशियां मनाते। खेल में एक इंसान के मरने पर खुशियां मनाना आपको वहशीपन की तरफ ले जाने की पहली सीढ़ी था मालिको के लिए।

आपको लड़ाने के लिए सम्राट और उसकी लुटेरी मंडली धर्म, जात, नस्ल, राष्ट्रवाद का सहारा लेती है। सबसे पहले तो वो आपको जीत के नाम पर ख़ुशी का इजहार करने के लिए प्रेरित करती है। जब आप पहली सीढ़ी चढ़ जाते हो तो फिर वो प्रचार तंत्र से विरोधी टीम को दुश्मन के रूप में आपके आगे पेश करती है। जब विरोधी टीम हारती है तो आपको वो महसूस करवाती है कि एक दुश्मन हारा है इसलिए ख़ुशी दोगुनी, एक ख़ुशी जीत की और दूसरी ख़ुशी दुश्मन के हारने की।

आपको धीरे-धीरे नफरत की इस सीढ़ी पर चढ़ाया जाता है। आप जैसे-जैसे सीढ़ी चढ़ते हो वैसे-वैसे आप इंसान से वहशी जानवर में तब्दील होते जाते हो। आप खुद की बर्बादी, मानवता की बर्बादी की तरफ बढ़ते जाते हो।

डराकर लड़ाने का खेल

ऐसे ही आपके सामने सम्राट अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से पड़ोसी मुल्क को बदनाम करने के लिए नई-नई खूंखार खबरें पेश करेगा ताकि आप डरो और जिस से आप डरोगे तो उसके सामने या तो आप समर्पण कर दोगे या उससे लड़ोगे। आप समर्पण इसलिए नहीं करोगे क्योंकि जिसको आपका दुश्मन बनाया गया है वो आपसे आर्थिक जनसंख्या के तौर पर कमजोर है। सम्राट आपको प्रेरित करेगा की मसल दो इनको जो आपको खत्म करना चाहते हैं। ऐसे ही आप देश के अंदर धार्मिक अल्पसंख्यको, दलितो, आदिवासियों, पूर्वोत्तर, कश्मीरियों के खिलाफ कर दिए जाते हो। आप देश के अंदर भी लड़ते हो देश के नागरिकों से और ख़ुशी मनाते हो उनके मरने पर, पैलेट गन से उनकी आँख फूटने पर, उनके घर जलाए जाने पर, उनकी बर्बादी आपको सुकून देने लगती है।

अब सोचो देश में 20 करोड़ मुस्लिम हैं, बहुसंख्यक हिन्दू हैं लेकिन सम्राट का प्रचार तंत्र आपके दिमाग में रोज ये बैठाता है कि मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ रही है। फलां तारीख तक ये हमसे ज्यादा हो जाएंगे फिर ये हमको मार देंगे। इसलिए खुद को बचाना है तो इनको खत्म करो।

आज जो आप ये ग्रन्थ पढ़ते हो जिनमे राजाओं के वीरता की कहानियां और युद्ध को जायज ठहराने की युक्तियां लिखी हुई हैं। ये सब अपनी लूट, गलतियों, छल कपट को छुपाने के लिए लिखे गए हैं। दूसरा आप अपनी जीत पर गर्व करते रहो। इसी गर्व के लिए आप होली, विजय दशमी मतलब दशहरा मनाते हो।

रावण दहन का दृश्य। साभार : गूगल

हजारों साल पहले राम और असुर सम्राट रावण का युद्ध हुआ। युद्ध में रावण मारा गया। राम ने अपनी जीत को जायज ठहराने के लिए अधर्म पर धर्म की जीत कहा, असुर राजा महिषासुर को देवताओं की तरफ से भेजी गयी दुर्गा ने छल कपट से मार दिया। इसको भी अधर्म पर धर्म की जीत कहा गया। प्रतापी राजा बाली की हत्या भी छल से राम ने की इस छल को छुपाने के लिए भी अधर्म पर धर्म की जीत कहा गया। असुर राजा हिरण्यकश्यप को उसके ही लड़के का सहारा लेकर मार दिया गया। आप जिनको अपना पूर्वज मानते हो अपना महाप्रतापी राजा मानते हो असल में वो महाप्रतापी नहीं थे, उन्होंने छल-कपट से विरोधियो को मारा। छल कपट में साथ देने वाले विरोधी पक्ष के लोगो को इन्होंने गद्दी पर बैठा दिया। जैसे अमेरिका किसी भी देश को बर्बाद करने के बाद उस देश में अपनी कठपुतली सरकार और सम्राट को बैठाता है। ऐसे ही राम ने विभीषण को गद्दी पर बैठा दिया।

साम्राज्यवादी देशों की चाल

आज भी साम्राज्यवादी मुल्क यही तो कर रहे हैं। अफग़ानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया को अमेरिका और उसके साझीदारो ने अधर्म को मिटाने के नाम पर बर्बाद कर दिया। अधर्म तो एक बहाना है आपको अपने साम्राज्य को बढ़ाना है।

लेकिन किसी ने लिखा है कि "झूठ को कितने भी शातिराना तरीके से सच बनाने के लिए लिखो। जिस दिन उसका तार्किक मूल्यांकन किया जायेगा उस दिन झूठ पकड़ा जायेगा।"

अच्छा होता कि आप माफी मांगते

अब कुछ प्रगतिशील, बुद्धिजीवी जब आपके इस झूठ को पकड़ रहे हैं तो आपके पूर्वजों के छल-कपट से पर्दा उठ रहा है। होना तो ये चाहिए कि आप ईमानदारी से अपने पूर्वजों द्वारा की गयी गलतियों, जन संहारों को मान कर पीड़ित आदिवासी, दलितों से माफ़ी मांगते। कहते कि हमारे पूर्वजों ने जो अन्याय किया है हम उसका प्रयाश्चित करते हैं। हम इंसान हैं और आगे से इंसानों की तरह रहेंगे। आपके पूर्वजों से लूटे हुए जल-जंगल-जमीन-पहाड़ को जिन्होंने लूटा है उनसे छीन कर उनको मानवता के लिए सबको बराबरी में बाँट देंगे।

लेकिन आप अपनी गलती मानने की बजाय आज भी असुरों, आदिवासियों के सम्राट के मरने की ख़ुशी हर साल बड़े पैमाने पर मनाते हो। आप धर्म की जीत-जीत चिल्लाते हो।

लेकिन आपका धर्म है क्या?आपकी नजर में आप जिस धर्म में हो वो सर्वोच्च है, फिर उस धर्म में आपकी जाति सर्वोच्च है, जाति में आपका गोत्र फिर आपका परिवार और आखिरी में आप खुद सर्वोच्च हो। ये है आपका धर्म!

आपकी नजर में वो सब अधर्म है जो आपको सर्वोच्च माने आपकी इस सोच का विरोध करे।

अगर खुद को, आने वाली नस्लों को, इस धरती को और मानवता को बचाना है तो इस लुटेरी मण्डली की साजिश का हिस्सा बनने से अपने आपको जितना जल्दी हो बचाइए। लुटेरे सामन्त पूंजीपति के फायदे के लिए आदिवासियों, दलितों, कश्मीरियों, पूर्वांचल और मजदूर-किसानों पर गोलियां चलाना बन्द कीजिये, उनके मरने पर जश्न मनाने की बजाय सम्राट से जवाब मांगिये की ये मौत क्यों हुई।

लोकतांत्रिक जनचेतना की ज़रूरत

सेना गलत काम में सम्राट का साथ ना दे इसके लिए लोकतांत्रिक जनचेतना की आवश्यकता है। इस लोकतांत्रिक ढाँचे में संशोधन इस दिशा में सुधार ला सकता है। निर्दोष, मासूमों की बलि देने की सदियों से चली रही इस परम्परा का अंत एक क्रांति द्वारा ही संभव है जरूरी है एक वैचारिक क्रांति। जिसमें बैठ कर एक बार विचार किया जाए कि क्या ये सम्राट का फैसला, ये आदेश उचित है???

सम्राट से सवाल करना और मेहनतकश को अपना भाई मानना जिस दिन आप शुरू कर दोगे। लुटेरों का लूटतंत्र टूट जाएगा। ये रक्तपिपासु व्यवस्था ढह जायेगी। उस दिन कोई इंसान भूखा, नंगा नहीं रहेगा। ये धरती हरी-भरी होगी, ये धरती इंसानो की होगी की लुटेरों की। इस धरती पर लकीरें नहीं होंगी जो इंसान को बांटती हैं। किसी लकीरों के बीच के टुकड़ों के लिए मानवता की हत्या होगी। 

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

 

 










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