जब आधी रात को कांपते हाथों,रूंधे कंठ और बहते आसुओं के बीच लिखा गया एक पत्र

स्मृतिशेष , , शनिवार , 31-03-2018


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संतोष सहर

।। प्रधानमंत्री के नाम शहीद चन्द्रशेखर की मां का पत्र ।।

(17 अप्रैल 1997 की वह शाम कभी नहीं भूलती जब मैं 'समकालीन लोकयुद्ध' के एक साथी को लेकर दरौली क्षेत्र के विधायक कॉ. अमरनाथ यादव के विधायक आवास पहुंचा था। मां कौशल्या वहीं ठहरी हुई थीं। जब हम पहुंचे, उनको एक चौकी पर बैठा पाया। उन्होंने मुझे अपनी ही बगल में बिठाया। उनके सामने कुछ खाने को रखा हुआ था। लेकिन, वो लगातार रोये जा रही थीं और बोले जा रही थीं। डेढ़- दो घण्टे गुजर गए। इस बीच सूरज भी ढल गया। कमरे में अंधेरा घिरने लगा और बत्ती जलाई गयी। हमें लगा कि अब उन्हें समझा-बुझाकर सुला देना चाहिये। विह्वल व भारी मन लिए पैदल चलते हुए हम वापस मदनधारी भवन (पटना में स्थित सीपीआई (एमएल) कार्यालय) पहुंचे। 

मेरे साथ गये साथी को ही यह 'प्रधानमंत्री के नाम पत्र' लिखना था। यह पत्र अगले दिन होने वाली प्रेस कांफ्रेंस में रखना था। इस बीच रामजी भाई के साथ महासचिव कॉ. विनोद मिश्र भी वहां आ पहुंचे। उन्होंने अम्मा से हमारी मुलाकात और लिखे जाने वाले पत्र की प्रगति के बारे में पूछताछ की। उस साथी ने लगभग रुआंसा होते हुए यह बताया कि वे यह चिट्ठी नहीँ लिख पायेंगे। कॉ. वीएम ने पल भर उन्हें देखा और अपनी नजरें मुझ पर टिका दीं। अब कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी। मैं समझ गया कि उन्होंने अम्मा से मिलने के लिये उस साथी को मेरे ही साथ क्यों भेजा था।

मैंने जीवन में ढेर सारे पत्र लिखे हैं। पार्टी की विभिन्न जिम्मेवारियों में रहते हुए अपनी ओर से और कई हम उम्र व वरिष्ठ साथियों - कॉ. रामनरेश जी, पवन जी, यमुना जी और रामजतन जी के डिक्टेशन पर उनकी ओर से भी। लेकिन, अम्मा की ओर से लिखवाया गया यह पत्र जिसे मैंने आधी रात में, कांपते हुए हाथों, कंठ में अटकी रुलाई और बहते हुए आंसुओं के बीच लिखा, मैं कैसे भूल सकता हूं? उस पत्र को जो अगले दिन राज्य व देश के कई अखबारों में हूबहू छपा था और एक मां की ताकत का नजीर बन गया था।)

प्रधानमंत्री महोदय,

आपका पत्र और बैंक-ड्राफ्ट मिला।

आप शायद जानते हों कि चन्द्रशेखर मेरी इकलौती सन्तान था। उसके सैनिक पिता जब शहीद हुए थे, वह बच्चा ही था। आप जानिए, उस समय मेरे पास मात्र 150 रुपये थे। तब भी मैंने किसी से कुछ नहीं मांगा था। अपनी मेहनत और ईमानदारी की कमाई से मैंने उसे राजकुमारों की तरह पाला था। पाल-पोसकर बड़ा किया था और बढ़िया से बढ़िया स्कूल में पढ़ाया था। मेहनत और ईमानदारी की वह कमाई अभी भी मेरे पास है। कहिए, कितने का चेक काट दूं।

लेकिन महोदय, आपको मेहनत और ईमानदारी से क्या लेना-देना! आपको मेरे बेटे की 'दुखद मृत्यु' के बारे में जानकर गहरा दुख हुआ है - आपका यह कहना तो हद है महोदय! मेरे बेटे की मृत्यु नहीं हुई है। उसे आपके ही दल के गुंडे, माफिया डॉन सांसद शहाबुद्दीन ने, जो दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष, बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का दुलरुआ भी है, खूब सोच-समझकर और योजना बनाकर मरवा डाला है। लगातार खुली धमकी देने के बाद, शहर के भीड़-भाड़ भरे चौराहे पर सभा करते हुए, गोलियों से छलनी कर देने के पीछे कोई ऊंची साज़िश है प्रधानमंत्री महोदय! मेरा बेटा शहीद हुआ है, वह दुर्घटना में नहीं मरा है।

सिवान में लगी चंद्रशेखर की प्रतिमा।

मेरा बेटा कहा करता था कि मेरी मां बहादुर है। वह किसी से भी डरती नहीं, वह किसी भी लोभ-लालच में नहीं पड़ती। वह कहता था - मैं एक बहादुर मां का बहादुर बेटा हूं। शहाबुद्दीन ने लगातार मुझको कहलवाया कि अपने बेटे को मना करो नहीं तो उठवा लूंगा। मैंने जब यह बात उसे बतलायी तब भी उसने यही कहा था। 31 मार्च की शाम जब मैं भागी-भागी अस्पताल पहुंची वह इस दुनिया से जा चुका था। मैंने खूब गौर से उसका चेहरा देखा, उस पर कोई शिकन नहीं था। डर या भय का कोई चिन्ह नहीं था। एकदम से शांत चेहरा था उसका प्रधानमंत्री महोदय! लगता था वह अभी उठेगा और चल देगा। जबकि प्रधानमंत्री महोदय! उसके सिर और सीने में एक-दो नहीं, सात-सात गोलियां मारी गयी थीं। बहादुरी में उसने मुझे भी पीछे छोड़ दिया।

मैंने कहा न कि वह मर कर भी अमर है। उस दिन से ही हजारों छात्र-नौजवान जो उसके संगी-साथी हैं, जो हिन्दू भी हैं, मुसलमान भी, मुझसे मिलने आ रहे हैं। उन सब में मुझे वह दिखाई देता है। हर तरफ, धरती और आकाश तक में, मुझे हजारों-हजार चन्द्रशेखर दिखाई दे रहे हैं। वह मरा नहीं है प्रधानमंत्री महोदय!

इसलिए, इस एवज में कोई भी राशि लेना मेरे लिये अपमानजनक है। आप के कारिंदे पहले भी आकर लौट चुके हैं। मैंने उनसे भी यही सब कहा था। मैंने उनसे कहा था कि तुम्हारे पास चारा घोटाला का, भूमि घोटाला का, अलकतरा घोटाला का जो पैसा है, उसे अपने पास ही रखो। यह उस बेटे की कीमत नहीं है जो मेरे लिये सोना था, रतन था, सोने और रतन से भी बढ़कर था। आज मुझे यह जानकर और भी दुख हुआ कि इसकी सिफारिश आपके गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त ने की थी। वे उस पार्टी के महासचिव रह चुके हैं जहां से मेरे बेटे ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। मुझ अपढ़-गंवार मां के सामने आज यह बात और भी साफ हो गयी कि मेरे बेटे ने बहुत जल्द ही उनकी पार्टी क्यों छोड़ दी। इस पत्र के माध्यम से मैं आपके साथ-साथ उन पर भी लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरी भावनाओं के साथ यह घिनौना मजाक किया है और मेरे बेटे की जान की यह कीमत लगवायी है।

एक ऐसी मां के लिए - जिसका इतना बड़ा और इकलौता बेटा मार दिया गया हो, और जो यह भी जानती हो कि उसका

कातिल कौन है - एकमात्र काम जो हो सकता है, वह यह कि कातिल को सजा मिले। मेरा मन तभी शांत होगा महोदय! उसके पहले कभी नहीं, किसी भी कीमत पर नहीं। मेरी एक ही जरूरत है, मेरी एक ही मांग है- अपने दुलारे शहाबुद्दीन को किले से बाहर करो। या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक दो कि वे उसे गोली से उड़ा दें।

मुझे पक्का विश्वास है प्रधानमंत्री महोदय! आप मेरी मांग पूरी नहीं करेंगे। भरसक यही कोशिश करेंगे कि ऐसा न होने पाये। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप किसके तरफदार हैं। ' मृतक के परिवार को तत्काल राहत पहुंचाने हेतु' स्वीकृत एक लाख रुपये का यह बैंक-ड्राफ्ट आपको ही मुबारक। कोई भी मां अपने बेटे के कातिलों के साथ सुलह नहीं कर सकती।

18 अप्रैल 1997, पटना

कौशल्या देवी

(शहीद चन्द्रशेखर की मां)

बिंदुसार, सिवान

(संतोष सहर संस्कृतिकर्मी और आजकल पटना में रहते हैं।)

 










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Sandhu hoshiarpuriyasatt :: - 03-31-2018
Satta ke bhukhe bhediye kya Jane ek maa ka card bahut hi dukhad or sharm nak ghatna in neta ki kartuton se pata nahi kitne gharon ke chirag bujh gaye