एक टीस का नाम है चंदू

स्मृतिशेष , , रविवार , 31-03-2019


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महेंद्र मिश्र

चंदू....ये नाम सामने आते ही जेहन में एक टीस सी उठ जाती है। चंदू को याद करना जैसे किसी दुख के एक महासागर से होकर गुजरना है। आप जिसके साथ घंटों-घंटा बैठकों में तमाम सवालों पर देश-दुनिया की बहसें किए हों। जेएनयू के विभिन्न छात्रावासों के कमरों से लेकर गंगा ढाबे पर रातें बितायीं हों। अलीगढ़ से लेकर इलाहाबाद तक की ढेर सारी यादें जुड़ी हों। उसे आप कैसे भुला सकते हैं। चंदू यानी हमेशा मुस्कराता हुआ एक सदाबहार चेहरा। उनसे मिलना जीवन के किसी खुशी भरे लम्हे से मिलना होता था। अपनी मौत से ठीक 15 दिन पहले चंदू हम लोगों के साथ इलाहाबाद में थे।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के मेरे चुनाव में प्रचार करने के लिए वो जेएनयू से वहां पहुंचे थे। जहां तक मुझे याद है चार-पांच दिन वहीं रहे। सभाओं को संबोधित किया। सभाओं में सबसे ज्यादा चंदू की मांग थी। डेलीगेसियों से लेकर छात्रावासों तक यही आलम था। शाम की सभाओं के बाद चंदू की हर रात किसी न किसी छात्र के यहां बुक रहती थी। 15 मार्च का चुनाव बीता। 

सर्दी अपने उतार पर थी। फिर 16 मार्च को संगठन के साथियों ने चुनाव की अपनी थकान मिटाने के लिहाज से एक पिकनिक का प्रस्ताव रखा। जिसमें फैसला हुआ कि सब लोग 16 मार्च का पूरा दिन संगम के किनारे गुजारेंगे। जिसमें घूमने-फिरने के साथ ही वहीं खाने और नाश्ते की योजना बनी। तय हुआ कि लोग अपने-अपने घरों से खाना बनवाकर लाएंगे। इसमें किरन सिंह और मनीषा शर्मा ने अगुआई की। इसलिए दूसरों को ज्यादा जिम्मेदारी उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि दूसरे लोग भी कुछ न कुछ लेकर वहां पहुंचे थे। बेहद यादगार थी चंदू के साथ संगम की वो सैर। सालों से इलाहाबाद रहते हुए भी हम लोगों का संगम जाना कम ही हो पाता था। ऐसे ही कुछ मौके आते थे जब दुनिया भर में प्रसिद्ध इस स्थान को दूसरों के जरिये हम लोगों को भी देखने का मौका मिल जाता था।

वहां से लौटने के बाद अगले दिन चंदू को सीवान जाना था। चंदू कृष्ण मोहन (मौजूदा समय में बीएचयू में प्रोफेसर) के कमरे पर शायद रुके थे। फिर वहीं से उनको चले भी जाना था। इसलिए वहां से जाने के समय हमारी चंदू से मुलाकात नहीं हो पायी थी। हालांकि संगम से लौटते वक्त जरूर ये बात हुई थी की जल्द ही हम फिर मिलेंगे। लेकिन ये वादा सिर्फ वादा ही बनकर रह गया।

आगे बढ़ने से पहले एक व्यक्तिगत वाकये का जिक्र करना कुछ गलत नहीं होगा। जेएनयू में आइसा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक रखी गयी थी। उसी से कुछ दिन पहले मैंने एक स्पेशल टाइप का कुर्ता पैजामा सिलवाया था। जिसमें पैजामे की नीचे की मोहड़ी लड़कियों के सलवार जैसी थी और कुर्ता भी हाफ बांह के साथ-साथ कॉलरदार था। जेएनयू में पहुंचने पर उसको पहनने को लेकर साथियों के बीच होड़ मच गयी। इसमें चंदू और प्रणय कृष्ण भाई (इस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक) सबसे आगे थे। और शायद गोपाल प्रधान भाई (दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक) भी उसमें शामिल थे। फिर आखिर में तय हुआ कि लोग बारी-बारी से उसे पहनेंगे। एक दिन प्रणय उसके बाद दूसरे दिन चंदू ने उसे पहना। फिर चंदू ने कहा कि इसे मैं अपने पास ही रख लेता हूं। 

31 मार्च, 1997 की वो मनहूस शाम आज भी मुझे हूबहू याद है। शाम 5 बजे के आस-पास का कोई वक्त रहा होगा जब सूर्य नारायण भाई, जो इस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और तब एसएफआई के नेता हुआ करते थे, आनंद भवन की तरफ से आइसा दफ्तर पहुंचे। उस समय मैं और तब के माले के जिला सचिव का. राधेश्याम मौर्य वहां मौजूद थे। सूर्य नारायण जी ने बताया कि सिवान में चंदू को गोली लग गयी है। हम लोग ये सुनते ही बिल्कुल अवाक रह गए। एकबारगी तो समझ में ही नहीं आया कि सूर्य नारायण जी क्या बोल रहे हैं। उन्हें कैसे पता चला ये पूछे जाने पर उन्होंने किसी के हवाले से खबर आने की बात कही। 

उसके बाद हम लोग जब थोड़ा संभले तब सबसे पहले खबर को कंन्फर्म करने के बारे में सोचा। उस समय आइसा दफ्तर के बगल में एक पीसीओ हुआ करता था। जहां से हम लोग जरूरी फोन किया करते थे। अभी मोबाइल का जमाना आया नहीं था। मैं तुरंत पीसीओ गया और वहां से दिल्ली स्थित पार्टी हेडक्वार्टर को फोन किया। तो पता चला कि सूचना सही है। लेकिन उस समय भी मौत की पुष्टि नहीं हो पायी थी। शुरुआती ब्योरा कुछ इसी तरह से मिला था कि अगले कुछ दिनों बाद होने वाले बिहार या फिर देशव्यापी बंद (ठीक से याद नहीं आ रहा) के प्रचार के लिए चंदू सीवान के जेपी चौराहे पर सभा कर रहे थे।

तभी माफिया शहाबुद्दीन के गुंडों ने उन पर हमला कर दिया। उसके बाद निहत्थे चंदू का सीना बदमाशों के सामने था और उन लोगों ने उसमें सात गोलियां दागी दीं। लेकिन चंदू के चेहरे पर कोई भय या शिकन तक नहीं थी। लाल बहादुर जी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष) ने सीवान में चंदू की अंतिम क्रिया में हिस्सा लेकर लौटने के बाद कुछ ऐसा ही विवरण सुनाया था। उन्होंने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद चंदू के माथे पर टांका लगा था जिससे लग रहा था कि चंदू का माथा सजा दिया गया हो और चंदू हमेशा की तरह अपने आखिरी समय में भी मुस्कराते चेहरे के साथ ही लोगों से विदा हुए।

(यह टिप्पणी मैंने पिछले साल चंदू की शहादत दिवस पर फेसबुक पर लिखी थी। लेकिन जनचौक पर नहीं दे पाया था। आज जब 31 मार्च को एक बार फिर हम लोग उनकी शहादत दिवस मना रहे हैं तब इसे देना किसी भी रूप में अप्रासंगिक नहीं होगा।)

 








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Umesh Chandola :: - 03-31-2019
आइसा के इतिहास के नायाब हीरे शहीद चन्द्र शेखर की हत्या के बाद जेएनयू छात्रो पर गोली मारी गयी। केंद्र की गुजराल सरकार मे सीपीएम ,सीपीआई भी थी। उसी सरकार ने चन्दू की माता को एक लाख का चैक दिया था। उसे कौशल्या देवी ने फर्जी कम्युनिस्टो की सरकार के मुंह पर मारा था। 1970 के नक्सल छात्रों क़ी गैर कानूनी तौर से हत्या मे दोनो सरकारी कम्युनिस्ट पार्टी शामिल रही हैं। फिर नन्दीग्राम सिगुर । सी पी आई(.एम एल ) के 2019 मे सीपीएम सीपीआई गठबंधन को लाल सलाम ।