चरण सिंह की जंयती पर विशेष: एक नेता जो बन गया था किसान राजनीति की धुरी

जयंती पर विशेष , , रविवार , 23-12-2018


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चरण सिंह

नई दिल्ली। बहुत लंबे संघर्ष के बाद देश की राजनीति के केंद्र में किसान आये हैं। भले दिखावे के लिए ही सही पर सभी राजनीतिक दल किसानों के लिए चिंतित दिखाई दे रहे हैं। पर जमीनी हकीकत यह है कि किसानों के लिए यदि किसी ने सच्चे नेता के रूप में पैरवी की है तो वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह थे। देश के विकास का रास्ता खेत और खलियान से होकर जाता है के नारे के साथ उन्होंने सड़क से लेकर संसद तक किसानों के हक की लड़ाई लड़ी। किसानों की पैरोकारी कर उन्होंने किसान नेता के रूप में प्रख्यात समाजवादी की छवि बनाई।

समाजवादी सत्ता की नींव में जहां डॉ. राममनोहर लोहिया का खाद-पानी स्मरणीय है वहीं चौधरी चरण सिंह का जाति तोड़ो सिद्धांत व उनकी स्वीकार्यता भी बेहद अहम रही है। समाजवादी सरोकारों वाले नेताओं का कभी नाम लिया जाएगा तो उनका नाम सबसे ऊपर होगा। आज भले ही समाजवादियों की लड़ाई संघियों से हो पर उस दौर में समाजवादी कांग्रेस की अराजक नीतियों के खिलाफ लामबंद हुए थे। उस समय देश की सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस के विरुद्ध सशक्त समाजवादी विचारधारा की स्थापना का श्रेय भले ही डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण को जाता हो पर लेकिन उसको जमीनी आधार देने का काम चौधरी चरण सिंह ने ही किया था।

और आज की पीढ़ी में सांप्रदायिक ताकतों से मोर्चा लेने वाले समाजवादी नेता चौधरी चरण सिंह की उसी पौध के अंश हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में विपक्ष के नेता के रूप में विराजमान पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव, बिहार में लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे तेजस्वी यादव के पिता लालू प्रसाद और चिराग पासवान के पिता रामविलास पासवान जिस पाठशाला में राजनीति का ककहरा सीख कर आए, उसके प्रिंसिपल चरण सिंह ही थे। 

यहां तक कि शरद यादव, केसी त्यागी के साथ ही हरियाणा के समाजवादियों को भी चरण सिंह ने ही राजनीतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया। वह बात दूसरी है कि यदि केसी त्यागी को छोड़ दें तो उनके अपने क्षेत्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश से कोई युवा उनके सानिध्य में आकर बड़ा नेता न बन सका। खुद उनके बेटे अजित सिंह और पौत्र जयंत चौधरी ने उनकी राजनीतिक विरासत दो तीन जिलों तक सीमित कर दी।

किसानों को लामबंद करने के लिए चौधरी चरण सिंह ने अजगर शक्ति अहीर, जाट, गूजर और राजपूत का शंखनाद किया। उनका कहना था कि अजगर समूह किसान तबका है। उन्होंने अजगर जातियों से रोटी-बेटी का रिश्ता जोड़ने का भी आह्वान किया तथा अपनी एक बेटी को छोड़ कर सभी बेटियों की अंतरजातीय शादी की।

आज भले ही उनके शिष्यों पर परिवाद और पूंजीवाद को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हों पर चौधरी चरण सिंह पूंजीवाद और परिवारवाद के घोर विरोधी थे तथा गांव, गरीब तथा किसान उनकी नीति में सर्वोपरि स्थान रखते थे। हां अजित सिंह को विदेश से बुलाकर पार्टी की बागडोर सौंपने पर उन पर पुत्रमोह का आरोप जरूर लगा। तबके कम्युनिस्ट नेता चौ. चरण सिंह को कुलक नेता और जमींदार कहते थे जबकि सच्चाई यह है कि चौ. चरण सिंह के पास भदौरा (गाजियाबाद) गांव में मात्र 27 बीघा जमीन थी जो जरूरत पड़ने पर उन्होंने बेच दी थी। उनकी ईमानदारी का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि निधन के समय उनके नाम कोई जमीन और मकान नहीं था।

चरण सिंह ने अपने करियर की शुरुआत मेरठ से वकालत के रूप में की। देश के इस किसान नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व विलक्षण था तथा वो गांव और किसानों के मुद्दे पर बेहद भावुक हो जाते थे। आर्य समाज के कट्टर अनुयायी रहे चरण सिंह पर महर्षि दयानंद का अमिट प्रभाव था। चरण सिंह मूर्ति पूजा, पाखंड और आडम्बर में कतई विश्वास नहीं करते थे । यहां तक कि उन्होंने जीवन में न किसी मजार पर जाकर चादर चढ़ाई और न ही मूर्ति पूजा की। चौधरी चरण सिंह की नस-नस में सादगी और सरलता थी।

उन्होंने कांग्रेस के गढ़ को ध्वस्त करने का जो संकल्प लिया, उसे पूरा भी किया। शून्य से शिखर पर पहुंचकर भी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। आज भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में हायतौबा मची हुई है। चरण सिंह ने उस दौर में ही कह दिया था कि भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे, चाहे कोई भी लीडर आ जाये, चाहे कितना ही अच्छा कार्यक्रम चलाओ, वह देश तरक्की नहीं कर सकता।

वैसे तो चौधरी चरण सिंह छात्र जीवन से ही विभिन्न  सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया था। पर उनकी राजनीतिक पहचान 1951 में उस समय बनी जब उन्हें उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री की कुर्सी मिली। उन्होंने न्याय एवं सूचना विभाग संभाला।

चरण सिंह स्वभाव से ही किसान थे। और देश की मिट्टी से अपने लगाव के चलते वो अनवरत किसानों के लिए प्रयास करते रहे। 1960 में चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में उन्हें गृह तथा कृषि मंत्रालय दिया गया। उस समय तक वह उत्तर प्रदेश की जनता के मध्य बेहद लोकप्रिय हो चुके थे। और उत्तर प्रदेश के किसान चरण सिंह को अपना मसीहा मानने लगे थे। किसानों से उनके प्यार का ही नतीजा था कि चरण सिंह को किसी भी चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा। उनकी ईमानदाराना कोशिशों की हमेशा सराहना हुई। वो एक राजनीतिज्ञ से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता थे। 1969 में कांग्रेस का विघटन हुआ तो चौधरी चरण सिंह कांग्रेस (ओ) के साथ जुड़ गए। उनकी निष्ठा कांग्रेस सिंडिकेट के प्रति रही। वह कांग्रेस (ओ) के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो बने पर बहुत समय तक इस पद पर न रह सके।

कांग्रेस विभाजन का प्रभाव यूपी की कांग्रेस इकाई पर भी पड़ा था। केंद्रीय स्तर पर हुआ विभाजन राज्य स्तर पर भी लागू हुआ। चरण सिंह इंदिरा गांधी के सहज विरोधी थे। इस कारण वह कांग्रेस (ओ) के कृपापात्र बने रहे। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते भी उत्तर प्रदेश संसदीय सीटों के लिहाज से बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य था। इंदिरा गांधी का गृह प्रदेश होने का कारण भी इसका बड़ा महत्व था। इसके चलते उन्हें यह स्वीकार न था कि कांग्रेस (ओ) का कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहे।

इंदिरा गांधी ने दो अक्तूबर 1970 को उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। चौधरी चरण सिंह का मुख्यमंत्रित्व जाता रहा। इससे इंदिरा के प्रति चौधरी चरण सिंह का रोष और बढ़ गया। हालांकि उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति से चरण सिंह को बेदखल करना संभव न था। चरण सिंह प्रदेश में भूमि सुधार के लिए अग्रणी नेता माने जाते हैं। क्योंकि 1960 में उन्होंने भूमि हदबंदी कानून लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इमरजेंसी लगने के बाद 1977 में हुए चुनाव में जब जनता पार्टी जीती तो आंदोलन के अगुआ जयप्रकाश नारायण के सहयोग से मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और चरण सिंह को गृहमंत्री बनाया गया। सरकार बनने के साथ ही मोरारजी देसाई और चरण सिंह के मतभेद सामने आने लगे थे। 28 जुलाई, 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने में सफल हो गए। कांग्रेस और सीपीआई ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया। प्रधानमंत्री बनने में इंदिरा गांधी का समर्थन लेना राजनीतिक पंडित चरण सिंह की पहली और आखिरी गलती मानते हैं।

दरअसल इंदिरा गांधी जानती थीं कि मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के रिश्ते खराब हो चुके हैं। यदि चरण सिंह को समर्थन देने की बात कहकर बगावत के लिए मना लिया जाए तो जनता पार्टी में बिखराव शुरू हो जाएगा। इंदिरा गांधी ने ही चौधरी चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की भावना को हवा दी थी। चरण सिंह ने इंदिरा गांधी की बात मान ली और प्रधानमंत्री बन गए। हालांकि तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 20 अगस्त 1979 तक लोकसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए  कहा। इस तरह से विश्वास मत प्राप्त करने के लिए उन्हें मात्र 13 दिन का समय मिला ।

इसे चरण सिंह का दुर्भाग्य कहें या फिर समय की नजाकत कि इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त, 1979 को बिना बताए समर्थन वापस लिए जाने की घोषणा कर दी। चरण सिंह जानते थे कि विश्वास मत प्राप्त करना असंभव ही है। यहां पर यह बताना जरूरी होगा कि इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए शर्त लगा दी थी। उसके अनुसार जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध जो मुकदमे कायम किए हैं, उन्हें वापस ले लिया जाए, चौधरी साहब इसके लिए तैयार नहीं थे। इसलिए उनकी प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई। वह जानते थे कि जो उन्होंने ईमानदार और सिद्धांतवादी नेता की छवि बना रखी। वह सदैव के लिए खंडित हो जाएगी। अत: संसद का एक बार भी सामना किए बिना चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।

प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देने के साथ-साथ चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी से मध्यावधि चुनाव की सिफारिश भी की ताकि कोई दूसरा सरकार बनाने का दावा न कर सके। राष्ट्रपति ने उनकी अनुशंसा पर लोकसभा भंग कर दी। चौधरी चरण सिंह को लगता था कि इंदिरा गांधी की तरह जनता पार्टी भी अलोकप्रिय हो चुकी है। ऐसे में वो अपनी पार्टी लोकदल और समाजवादियों से यह उम्मीद लगा बैठे कि मध्यावधि चुनाव में उन्हें बहुमत हासिल हो जाएगा।

इसके अलावा चरण सिंह को यह आशा भी थी कि उनके द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के कारण उन्हें जनता की सहानुभूति मिलेगी। किसानों में उनकी जो लोकप्रियता थी वह असंदिग्ध थी। वह मध्यावधि चुनाव में 'किसान राजा’ के चुनावी नारे के साथ उतरे। मध्यावधि चुनाव के समय कार्यवाहक प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ही थे। वह 14 जनवरी 1980 तक ही भारत के प्रधानमंत्री रहे। इस प्रकार उनका कार्यकाल लगभग नौ माह का रहा।

चौधरी चरण सिंह की व्यक्तिगत छवि एक ऐसे देहाती पुरुष की थी जो सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखता था। इस कारण इनका पहनावा एक किसान की सादगी को प्रतिबिम्बत करता था। एक प्रशासक के तौर पर उन्हें बेहद सिद्धांतवादी आरै अनुशासनप्रिय माना जाता था। वह सरकारी अधिकारियों की लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार के प्रबल विरोधी थे। प्रत्येक राजनीतिज्ञ की यह स्वभाविक इच्छा होती है कि वह राजनीति के शीर्ष पद पर पहुंचे। इसमें कुछ भी अनैतिक नहीं है। 

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि चरण सिंह एक कुशल लेखक थे। उनका अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था। उन्होंने 'आबॉलिशन ऑफ जमींदारी, लिजेंड प्रोपराटरशिप और इंडियाज पॉवर्टी एंड सोल्यूशंस नामक कई पुस्तकों का लेखन भी किया। जनवरी 1980 में इंदिरा गांधी का पुरागमन चरण सिंह की राजनीतिक विदाई का महत्वपूर्ण कारण बना।








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