जहां मिलती हैं गंगा-जमुनी तहजीब की धाराएं

संस्कृति , , शुक्रवार , 27-10-2017


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उपेंद्र चौधरी

टाइम मशीन के मशहूर लेखक एच.जी.वेल्स जब कहते हैं, ‘अनुकूल बनें या नष्ट हो जाएं, अभी या कभी भी, यही प्रकृति कि पक्की अनिवार्यता है’, तो इसका मतलब शायद यही है कि अगर हम प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बैठाते, तो मनुष्य के विकास के इतिहास की सारी उपलब्धियों को ख़तरनाक चुनौती मिल सकती है। पलभर में वो सब कुछ नष्ट हो सकता है, जिसे मनुष्य ने अपनी कड़ी मेहनत से संवारा-निखारा है। प्रकृति के लिए सूक्ष्म का भी उतना ही महत्व है, जितना स्थूल की अहमियत है। वास्तविकता तो यही है कि इन्हीं असंख्य सूक्ष्म और स्थूल चीज़ों से मिलकर स्वयं प्रकृति भी बनती है। हम जब प्रकृति के साथ हो लेते हैं, तो इसका मतलब सिर्फ़ इतना होता है कि हमने छोटी-बड़ी एक-एक चीज़ को समान महत्व के साथ स्वीकार कर लिया है। हमारे दर्शन, आविष्कार, खोज सब कुछ प्रकृति में सूक्ष्म रूप से मौजूद हैं, हम अपने वैज्ञानिक नज़रियों से उसे आकार देकर अपनी रचनात्मक कल्पना को साकार कर देते हैं, फिर उस साकार होती कल्पना को ज़िंदगी को सहज बनाने वाले उत्पाद में बदल लेते हैं। फिर हमारे ऊपर निर्भर करता है कि उस उत्पाद का विध्वंसात्मक इस्तेमाल किया जाय या रचनात्मक उपयोग। पहला रास्ता हमारे मनुष्य होने पर सवाल उठाता है और दूसरा हमारे मनुष्य होने के पक्ष को मज़बूत करता है।

छठ पर्व हमें दूसरे रास्ते पर ले जाने को प्रेरित करता है। छठ की पौराणिकता कितनी है, यह इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि पौराणिकता की कसौटी पर कसकर ही कोई त्योहार महान नहीं होता, कोई चलन व्यापक नहीं साबित हो जाता। पौराणिक रूप से अनेक ऐसी प्रथायें रही हैं, जो समय के एक कालखंड में भले ही ज़रूरी बना दी गयी हों, मगर उसकी सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता सवालों के घेरे में रही है। बदलते समय के साथ ऐसे पर्व त्योहार अपनी प्रासंगिकता खोकर स्वयं को बचा नहीं पाते हैं। मगर छठ है कि इसकी लौकिकता लगातार बढ़ रही है, इसे मनाये जाने का दायरा भाषा, नस्ल, क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए लगातार व्यापक हो रहा है।

शास्त्रीयता सीमित लोगों या धार्मिक नेतृत्व के बीच महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन लौकिकता तो लोगों के बीच ही अपना आदर और सम्मान पाती है। छठ पर्व की लौकिकता किसी शास्त्रीयता का मोहताज नहीं है। यही कारण है कि ज़बर्दस्त पवित्रता बरते जाने वाले इस त्योहार को किसी धर्मगुरु की आवश्यकता नहीं है। यहां भूमि है, जल है, आकाश है, हवा है और सबको अपनी ऊर्जा से जीवन्त करता सूर्य का प्रकाश है, हिन्दु-मुसलमान हैं, खाने के स्वादिष्ट पकवान हैं। यहां मनुष्य के बीच जाति और धर्म के नाम पर पैदा होने वाला कोई विभेद नहीं है। छठ के घाट जातियों में बंटे हैं, धर्म में विभाजित हैं, जिसको जहां सहूलियत है, अपने-परायों से मुक्त सबके साझेदार बनते घाट हैं। स्वाभाविक है कि जब यहां किसी धर्मगुरु की ज़रूरत नहीं है, तो फिर कथित रूप से ‘स्वयं ईश्वर के मुख से निकलेकिसी मंत्र की आवश्यकता भी नहीं है। जिसको जिस तरह का जो कुछ आता है, वही उसकी अपनी मंत्रहीन और पंडितविहीन शास्त्रीयता है।

छठ में सिर्फ़ प्रकृति का संगीत ही नहीं, बल्कि लौकिकता के गीत भी हैं। गीतों के बोल हिन्दी के दास नहीं, बल्कि छठ के गीतों के बोल मैथिली, भोजपुरी, अंगिका, वज्जिका, मागधि और अब तो धीरे-धीरे अवधी, ब्रजभाषा, बांग्ला, ओड़िया आदि-आदि जैसी लोकभाषाओं के साथी हैं। पकवान बनाने से लेकर सूर्य की रौशनी को अर्घ्य देने तक संगीत इस पर्व के साथ गूंजता है। गीतों के बोल और उस बोल को मिलती धुन में इतनी सहजता है कि इन्हें गाने के लिए अतिरिक्त मेहनत की बिल्कुल ही दरकार नहीं पड़ती। जिसे जैसा आता है, वह वैसा ही गाता हुआ अपनी भावना को अभिव्यक्त करता है।

इस लौकिक त्योहार की कुछ बड़ी ख़ासियत है, जो इसे बाक़ी त्योहारों से जुदा करती है। इस त्योहार में महिलाओं और पुरुषों के बीच किसी तरह की विभेदकारी लकीर नहीं खींची गयी है। बाक़ी त्योहारों की तरह ज़िम्मेदारियों या कर्तव्यों का बोझ महिलाओं पर नहीं है। यहां पुरुष और महिलायें एक ही तरह से एक ही घाट पर एक ही को अपना अर्घ्य देते देखे जा सकते हैं। लिंगगत भेद के संदर्भ में छठ एक क्रांतिकारी त्योहार है। यहां महिला-पुरुषों को लेकर किसी भी तरह की कोई वर्जना नहीं है। वर्जना सिर्फ़ अपवित्रता को लेकर है, अंकुश केवल मन की पवित्रता को लेकर है।

 

  • हदों को तोड़ने वाला है ये पर्व
  • इस पर्व में किसी गुरू की जरूरत नहीं

 

छठ तो ऐसी हदों को भी तोड़ता है, जो आज की संकीर्ण होते सामाजिक-राजनीतिक परिवेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं और व्यापकता की एक नायाब मिसाल भी रखता है। यहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच की भी हदबंदी नहीं है। मनुष्य बुनियादी तौर पर प्राकृतिक होता है। लिहाज़ा धर्म को भी प्रकृति से कोई गुरेज नहीं है। यहां अजान है, क़लमा है, नमाज़ है। फिर भी मुसलमान इस पर्व में शामिल होते हैं। उसकी वजह वही शास्त्रीयता का नहीं होना है, किसी मंत्र या श्लोक की अनुपस्थिति है, किसी धार्मिक गुरु के हस्तक्षेप की ग़ैरमौजूदगी है। यही कारण है कि छठ की आराधना में हिन्दू के साथ मुसलमान भी शिरक़त करते हैं। इस मायने में छठ एक अनूठा पर्व बन जाता है और सही अर्थों में भारतीयता का प्रतीक भी हो जाता है। 1789 में हुई फ़्रांस की क्रांति ने दुनिया के सामने समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व का पाठ रखा था, छठ उस पाठ या नारे को सहजता के साथ जीने की प्रेरणा ही नहीं देता, उसे व्यवहार के धरातल पर प्राकृतिक रूप से हर साल गांव घरों और क़स्बों, शहरों में उतार देता है। छठ लौकिकता का वह आइना भी है, जिसमें हम अपने आस-पास पसर रही संकीर्णता के चेहरे को आसानी से पहचान सकते हैं और प्रकृति के साथ प्राकृतिक होते हुए व्यापकता और सार्वभौमिकता का एक नया चेहरा भी रच सकते हैं। यह व्यापकता सूर्य की उसी रौशनी की तरह है, जो छठ पूजा का आधार है। आधार सिर्फ़ उगते सूरज की रौशनी ही नहीं है, डूबते सूर्य का घना होता प्रकाश भी है; इस बात का आश्वासन कि अंधेरे में समाते प्रकाश के बाद अंधेरे को चीरती सुबह की बांहों में मुस्कुराती रौशनी भी है।

 

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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