मदरसों में नहीं अस्पतालों में सीसीटीवी चाहिए योगी जी

कहां आ गए हम... , , शनिवार , 12-08-2017


child-death-yogi-hospital-gorakhpur-baba-raghavdas

राजीव यादव

हिंदूराष्ट्र में आपकी गहरी दिलचस्पी है। है न...अगर नहीं तो जो भीड़ 'देखो-देखो कौन आया हिन्दू राष्ट्र का शेर आया' का नारा लगाती है वो 'देखो-देखो कौन आया हमारे बच्चों का हत्यारा आया' कहते हुए इस राज्य की सत्ता की चोटी पर बैठे शख्स के चेहरे से नकाब उतार देती।

गोरखपुर अस्पताल का दृश्य।

पर नहीं आपको हिन्दू राष्ट्र चाहिए, श्मशान-कब्रिस्तान चाहिए। आपको क्या मतलब कि मेरठ में कक्षा दो की बच्ची के साथ गैंग रेप होता है। आपको तो मतलब है लवजेहाद से! आप कहते हैं कि वो संत है महंत है। जब वही योगी गोरखपुर में एक नई परम्परा की बात करते हुए एक के बदले दस को मारो और एक हिन्दू लड़की के बदले सौ मुस्लिम लड़कियों को उठाने की बात करते हैं और एक नई जाति का निर्माण की बात करते हैं तो आप कहते हैं कि जय योगी जी महाराज। क्योंकि आपको उन मासूमों से कोई मतलब नहीं जो आक्सीजन की कमी से मर गए।

प्रतीकात्मक चित्र।

'हिंदू राष्ट्र के खून  का स्वाद लग गया है' 

आप कहेंगे कि मालूम नहीं था। रोज उन्हीं अखबारों में सिंगल कालम की खबर में रोज मर रहे बच्चों की सूचना होती है। आप उन्हीं अखबारों को पढ़कर उस कातिल भीड़ का हिस्सा तो बन जाते हैं पर अपने बच्चों के कातिल के खिलाफ नहीं खड़े होते। दरअसल आपको भी उस कातिल ने हिन्दू राष्ट्र के खून का स्वाद चखा दिया है। 

आपको पता है बलिया की बेटी रागिनी का हत्यारोपी पंडित प्रिंस तिवारी कौन हैये वही प्रिंस तिवारी है जिसे कट्टर हिंदू होने पर गर्व है और उसके पिता को भी। उसके हर उकसावे के पोस्ट को आप जैसे सैकड़ों लोग लाइक करते हैं। जब संत आता है तो संस्कृति बदल जाती है। आज पूरे देश मे योगी-योगी छाया है। जिस धर्म युद्ध की बात योगी करते हैं उसके लिए उसने हथियार रखे थे और फ़ेसबुक पर ऐलान करते हुए लिखा था कि हम वो भगवा शेर हैं जिसका शिकार करते हैं उसका जिस्म तो क्या रूह भी दम तोड़ देती है। और एक दिन उसकी शिकार हुई रागिनी जिसकी उसने निर्मम हत्या की। क्योंकि शेर तो निर्मम ही होता है न। और जब संत आता है तो संस्कृति तो बदल ही जाती है।

हथियारबंद राजपूत सहारनपुर में।

बनाया जा रहा है दहशत का माहौल

कभी विधानसभा, तो कभी ट्रेन, तो कभी किसी संघी के यहां बम की अफवाह के नाम पर पूरे मुल्क में दहशत का माहौल कायम कर भीड़ को उकसाया जा रहा है एक समुदाय विशेष के खिलाफ। मुस्लिम लड़कों के रेडिकलाइजेशन की बात करने वाली ख़ुफ़िया-सुरक्षा एजेंसियों को और उनको सुधारने का दावा कर फर्जी केसों में फसाने वाले एटीएस अधिकारी असीम अरुण को ये सैफरन टेररिस्ट नहीं दिखते? दिखते हैं पर ये तो हिन्दू राष्ट्र के शेर हैं। जिनका जन्म नहीं अवतार हुआ है और इनका बाल बांका करने की किसकी हिम्मत क्योंकि इनके सरदार के सब चाकर हैं।

ये सब घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं। क्योंकि इसके मूल में मूल सवाल से भटकना है। अगर मुगलसराय का नाम दीन दयाल रखने से उन बच्चों को आक्सीजन मिल जाती तो जनाब आप रख लीजिए। इनकी बम की अफवाह, गोमांस की बातें, वंदेमातरम की फर्जी राजनीति के बंद हुए बिना कुछ नहीं होगा। क्योंकि उन्हें आपकी जेहनियत पर भरोसा है। घटनाओं का क्या? वो तो रोज होती हैं। वे जानते हैं की आपको चंडीगढ़ की वर्णिका कुंडू हो या बलिया की रागिनी हो या फिर आक्सीजन की कमी से मरते बच्चों की बिलखती माताएं, याद नहीं रह जाएंगी। अखलाक, पहलू, जुनैद की बात ही छोड़िए। क्योंकि जिस हिंदू राष्ट्र की चासनी में आप हो वहां ये सब प्रकृति का नियम बताया जाता है। 

कहां से आयी इतनी नफरत?

पर एक बात आपको याद रह जाएगी। मुसलमान गाय खाते हैं। है न...

गाय आपकी माता है। ठीक बात है पर जो मासूम बच्चों की माताएं हैं, उनका क्या? जो समाज का उच्च तबका है उसे सोचना होगा कि पंडित प्रिंस तिवारी जो रागिनी दूबे की निर्मम हत्या करता है, आखिर उसमें इतनी नफ़रत कहां से आई?

जो बराबरी-भागीदारी के सवाल पर सताए गए हैं, उन्हें केशव प्रसाद मौर्या जैसे बजरंगियों से नहीं उन ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्या जैसों से पूछना होगा, यही है भागीदारी? जिसमें हमारे मासूम बच्चों को मौत में भागीदारी मिल रही है।

(लेखक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। और रिहाई मंच संगठन के अगुआ नेताओं में एक हैं।)










Leave your comment