“कोलंबस के मानस पुत्रों को भारी पड़ सकती है भारत के मूल निवासियों की अनदेखी”

बदलाव , , शुक्रवार , 10-08-2018


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वीना

हर साल 9 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी (आदिवासी) दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर जहां छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में सरकारी रस्मअदायगी के तौर पर आदिवासी हक़-अधिकार को लेकर लीपा-पोती की गई। वहीं ख़बर ये भी आई कि दिल्ली में आदिवासी बुद्धिजीवियों द्वारा 8 अगस्त को की गई प्रेस कॉफ्रेंस से मुख्य मीडिया नदारद रहा।

क्या सरकारी स्तर पर भारत के मूलनिवासियों-आदिवासियों को हाशिये पर धकेला जा रहा है? उनके वजूद को मिटाने की कोशिश की जा रही है? और क्या सिधो-कानों के वंशज प्रतिकार नहीं करेंगे? दिल्ली में करीब आठ लाख आदिवासी रहते हैं। ये बताने वाले बुद्धिजीवी अपनी उपेक्षा की मायूसी साथ लिए जहां अपने घर लौट जाते हैं। वहीं महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के मूलनिवासी इस उपेक्षा को चुनौती दे रहे हैं।

9 अगस्त अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी (आदिवासी) दिवस के मौके पर महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में आदिवासी एकता परिषद द्वारा पालघर चौरास्ता से आर्यन हाई स्कूल मैदान तक आदिवासी परंपरागत कला का प्रदर्शन करते हुए भव्य रैली निकाली गयी। 

रैली में पालघर ज़िले के कोने-कोने से आए करीब 15,000 आदिवासी-मूलनिवासी महिलाओं- पुरुषों, नौजवान-बुजु़र्गों ने हिस्सा लिया। गुजरात के खेडूत (किसान) समाज ने भी मूलनिवासियों के संघर्ष के समर्थन में अपनी उपस्थिति दर्ज की। 

रैली के बाद कालूराम काका धोदड़े की अध्यक्षता मे जनसभा संपन्न हुयी । सभा को आदिवासी नेताओं शशी सोनवणे, खेडूत समाज गुजरात के अध्यक्ष जयेश पटेल ने संबोधित किया ।

पालघर में पहले ये दिवस नहीं मनाया जाता था। 80 की उम्र पार कर चुके जुझारू आदिवासी नेता कालूराम काका धोदड़े की कोशिशों का नतीजा है कि पिछले साल आदिवासी दिवस पर तलसारी में 80-90 हजार की बड़ी तादात में आदिवासी अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने पहुंचे। और इस साल करीब 15,000 पुरुष-महिलाएं-बच्चे, नौजवान- बुजुर्ग आदिवासी पालघर पहुंचे। अंतर्राष्ट्रीय मूल निवासी (आदिवासी) दिवस पर अपने होने का सबूत देने। 

सभा में जाते हुए लोग।

भूमि सेना आदिवासी एकता परिषद के संस्थापक अध्यक्ष और महाराष्ट्र सरकार की तरफ से आदिवासी सेवक पुरस्कार प्राप्त नेता कालूराम काका धोदड़े ने मंच से बताया कि - ‘‘ भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कहते आई है कि इस देश (भारत) में मूल निवासी है ही नहीं। जबकि इस देश के आठ प्रतिशत आदिवासी यहां के मूलनिवासी हैं।’’ 

काका ने कहा कि पालघर जिला विकास के नाम पर अपनायी जा रही विनाशनीति के केंद्र में है । मुंबई अहमदाबाद बुलेट ट्रेन-मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेसवे तथा सागरी महामार्ग आदि परियोजनाओं के माध्यम से पालघर जिले की आदिवासी जनता को हाशिये पर धकेलने के प्रयास किए जा रहे हैं । 

गत वर्ष इसी दिवस पर तलासरी, महाराष्ट्र  में कालूराम काका धोदड़े के नेतृत्व मे भव्य रैली एवं जनसभा के माध्यम से सारी विनाशकारी परियोजनाओं को श्चले जावंश् (चले जाओ) की चेतावनी दी गयी थी । सरकार के स्तर पर ये सारी परियोजनाएं थोपने के प्रयास किए जा रहे हैं। 

कालूराम काका कहते हैं कि - अनुसूचित क्षेत्र के संदर्भ मे संविधान द्वारा प्राप्त सरंक्षण पेसा कानून की धड़ल्ले से धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। इस अन्याय के खिलाफ आदिवासी स्थानीय भूमि पुत्र किसानों का संघर्ष तेज किया जा रहा है । 

हमारी ज़मीनों पर कब्ज़ा करने के लिए बुलेट ट्रेन का जो प्रोजेक्ट लाया गया है ये आदिवासी जनता को मंजूर नहीं है। काका ने कहा कि हमारी ग्राम सभाओं में ‘‘हमारे गांव में हमारा राज’’ का नारा रहा है। उसको ही अमल में लाते हुए आने वाले समय में हम लोग काम करेंगे। 

1970 के दशक में कालूराम काका के नेतृत्व में ज़मीदारों से आदिवासियों की ज़मीने छुड़वाई गयी थीं। तब संगठन अपना खुद का कोर्ट लगाता था और फै़सला लेकर ज़मीदार के ऊपर धावा बोलता था। काका ने एलान किया कि हम उसी आंदोलन की तरह बुलेट ट्रेन के विरोध में आंदोलन छेड़े हुए हैं और उसको बरक़रार रखेंगे।

राजनीतिक पार्टियों की मौक़ापरस्ती का नकाब हटाते हुए काका ने बताया कि एक आंदोलन के दौरान अभी दो महीने पहले जून में शिव सेना ने बुलेट ट्रेन के विरोध में हमारे संघर्ष में साथ खड़े होने की बात कही थी। हमने कहा कि आप यहां संघर्ष करने की बजाय हाउस में बुलेट ट्रेन के विरोध में आवाज़ उठाइये। और जुलाई में नागपुर विधान सभा के भीतर शिव सेना ने बुलेट ट्रेन को अपना समर्थन दे दिया। किसी पार्टी पर विश्वास रखने की बजाय हम लोगों को सड़क और कोर्ट की लड़ाई का संघर्ष ज़ारी रखना चाहिये। 

संबोधित करते नेता।

भूमि सेना आदिवासी एकता परिषद के नेता शशी सोनवणे ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘आदिवासी इस देश के मूलनिवासी हैं। इस नाते वो मालिक होते हैं। लेकिन भारत की आज़ादी के 70 सालों के बाद भी आदिवासियों के साथ गुलामों जैसा सलूक किया जा रहा है। 

जिस तरह कोलंबस ने अमरीका ढूंढते वक़्त ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए वहां के हज़ारों मूल निवासियों को मौत के घाट उतार दिया। उसी तर्ज पर मोदी और अमित शाह अपने नए भारत के निर्माण के लिए आदिवासी-मूलनिवासियों का कत़्ल करने में जुटे हुए हैं। लेकिन यहां की आदिवासी जनता उसके खि़लाफ़ संघर्ष करेगी। अब तक पिछले दो साल से हम आंदोलन और कोर्ट के माध्यम से संघर्ष छेड़े हुए हैं। अगर ये सरकार झंडे की भाषा नहीं समझती तो झंडे के बीच जो डंडा लगा है उसकी भाषा में हमें समझाना पड़ेगा।

गुजरात का खेडूत (किसान) समाज भी पालघर के अंतर्राष्ट्रीय मूलनिवासी-आदिवासी दिवस रैली में शामिल हुआ।

सूरत-अहमदाबाद कॉरिडोर में गुजरात के खेडूत (किसान)  समाज की ज़मीनें भी शामिल हैं। दक्षिण गुजरात का खेडूत समाज भी अपनी ज़मीन बचाने के लिए सड़क और अदालतों में आंदोलन छेड़े हुए है। 

राष्ट्रपति को भेजा गया ज्ञापन।

खेडूत समाज के जयेश पटेल ने सभा में ऐलान किया कि ‘‘गुजरात के जो किसान-खेडूत हैं वो आदिवासी जनता के संघर्ष में उनके साथ डटे हुए हैं। पटेल ने कहा कि अगर इसी तरह से आदिवासियों का विस्थापन ज़ारी रहा तो हमें सोचना पड़ेगा कि भविष्य में हम इस तरह का आदिवासी दिवस मना पाएंगे कि नहीं। ज़रूरत है कि खेडूत समाज और आदिवासी एकता परिषद एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले। और दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के साथ-साथ जितने भी कॉरिडोर देश में प्रस्तावित हैं उनके विरोध में हम एक देशव्यापी मोर्चा खड़ा करने की दिशा में कदम बढ़ाएं।’’  सभा में विनाश नीति के खिलाफ संघर्षरत रहने का प्रस्ताव पारित किया गया और भूमि सेना-आदिवासी एकता परिषद की तरफ से राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया गया। 

 








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