पहले पेट पूजा, फिर उपवास दूजा

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 14-04-2018


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संदीप जोशी

उपवास और उपहास कभी भी किए जा सकते हैं। दोनों ही, खाली पेट भी हो सकते हैं या फिर भरे पेट भी किए जा सकते हैं। उपवास और उपहास से तन भी और मन भी, दोनों चंगे होते हैं। जब मन चंगा हो तो कठौती में भी वास किया जा सकता है। फिर छोले-भटूरे हों तो चंगा ही चंगा है। सोने पर सुहागा भी हो सकता है। लेकिन छोले-भटूरे खाने के बाद उपवास करना, आखिर उपहास का कारण क्यों बनना चाहिए। अपने को पता नहीं। बेरोजगार जनता और बेकार नेता छोले-भटूरे का स्वर्णिम आंनद तो ले ही सकते हैं। छोले-भटूरे का इतिहास तो संसदीय सरोकारों से भी पुराना है। कांग्रेस पार्टी की स्थापना से भी पहले से छोले-भटूरे आनंद में, आनंद से खाए जाते रहे हैं। सत्तादल बेशक देश की संसद और उसके संस्कार बदलने की मुहिम में लगी हो लेकिन छोले-भटूरे का इतिहास तो कालजयी है।

लोकतांत्रिक सत्ता से अलग खान-पान के अपने पौराणिक संस्कार रहे हैं। उत्तर भारत में मुगलों से भी बहुत पहले छोले-भटूरे का आनंद उठाया जाता रहा है। सत्ता तो कुर्सी का मैल होती है जो आती-जाती रहेगी। जीवन है तो आनंद चलता रहना चाहिए। आनंद तो आत्मसुख से ही मिलता है। और छोले-भटूरे तो आत्मा को परमात्मा से मिलाने का सांस्कारिक, सामाजिक जरिया रहा है। उसे सत्ता से या संसद से जोड़ना बनावटी बुद्धि का भी विलोप है। फिर ऐतिहासिक कांग्रेस, और उसके नेताओं का बेशक विलोप क्यों न हो जाए छोले-भटूरे खाने का जब मौका मिले आत्मोद्धार कर लेना चाहिए।

भारतीयों के लिए, खासकर उत्तर भारतीयों के लिए तो छोले-भटूरे ‘स्टेपल फूड’ यानी प्रमुख भोजन है। सत्ता की राजधानी दिल्ली में हर सड़क, हर चैराहे या हर नुक्कड़ पर छोले-भटूरे खाने का आनंद उठाया जा सकता है।

पांच रुपए से पांच सौ रुपए तक के छोले-भटूरे आपको अपनी हैसियत के हिसाब से खाने को मिल जाएंगे। छोले-भटूरे के सामने तो सत्ता का लालच भी फीका पड़ सकता है। सत्ता में गुड़ खाना, गुलगुले से परहेज करना साथ-साथ नहीं चलता।

लेकिन कुछ मानवतावादी, राष्ट्रभक्त नेता भी होते हैं जो सेवा को तो सत्ता के भरोसे छोड़ते हैं मगर छोले-भटूरे समाज के लिए खाते हैं। आखिर एक साथ छोले-भटूरे खाने से ही तो सेवाभाव की स्थापना भी हो सकती है।

राजधानी की राजनीति में ईडली-डोसा, वड़ा-पाव, मोमो-चाॅउमीन या पोहा-जलेबी के अलावा छोले-भटूरे भी अहम भूमिका निभाते हैं। तमिलनाडु में आखिर ‘अम्मा कैंटीन’ की ‘ईडली-डोसा डिप्लोमसी’ ने ही तो जयललिता को जघन्न जनमत दिलाया था। मुंबई में ठाकरों की ‘वड़ा-पाव पालिटिक्स’ सरकारों को ठिकाने लगाने में लगती रही है। ‘मोमो-चाॅउमीन’ कांग्रेस पचा नहीं पायी और माकपा से मार खा कर समझौता ही करती आयी है।

बचा ‘पोहा-जलेबी’ तो वहां तो सब नमोः नर्मदे है। अब अगर दिल्ली में भी कांग्रेस ‘छोले-भटूरे’ लायक नहीं रह गयी है तो उसको ऐतिहासिक उपवास पर चले जाना चाहिए। आखिर उपवास करने का और सत्ता का ठेका किसी एक दल का ही क्यों होना चाहिए। छोले-भटूरे तो दिल्ली की आम जनता रोज खाती है। इसलिए छोले-भटूरा राजनीति भी नेताओं को सत्ता दिला सकती है।

उपवास का मूल अर्थ है उसके पास वास करना या बैठना जिसकी उपमा न की जा सकती हो। गांधीजी तो आज हर उपमा में विराजमान हैं। स्वच्छता से लेकर तो अस्पृश्यता तक उनकी उपमा में वोट मांगने का सिलसिला चलता आ रहा है। इसलिए छोले-भटूरे खाकर उनके पास उपवास में बैठना कैसे गलत हो सकता है। आखिर भूखे पेट भी कभी कोई भजन कर सकता है क्या। देश में चल रहे भाषण और भक्ति के माहौल में कांग्रेस के पास छोले-भटूरे के सहभोजन के अलावा कोई चारा बचता ही कहां है। पहले पेट पूजा, फिर उपवास दूजा।

जिन नेताओं ने राजघाट पर महात्मा गांधी के सामने उपवास की घोषणा की थी उनने छोले-भटूरे न खाने की कोई कसम तो नहीं खायी थी। हां ...... गांधीजी के लिए छोले-भटूरे न ले जाकर जरूर पाप किया। छोले-भटूरे कोई टू-जी, र्थी-जी के अटकलें थोड़ी हैं। पेट और मन भरने पर तो डकार आना भी लाजमी है। आखिर डकार ही वह प्रक्रिया है जो पचा पाने की क्षमता को दर्शाती है। फिर क्या देश और जनता की सेवा में तन-मन से लगे नेता छोले-भटूरे भी खाने लायक भी नहीं बचे हैं। गांधी समाधि पर उपवास अपनी जगह है और छोले-भटूरे का आनंद अपनी जगह। कृपया उपवास पर उपहास न करें। क्योंकि ये छोले हैं तो वे भटूरे।   

 (समाज, राजनीति और खेल पर लगातार लिखने वाले संदीप जोशी रणजी क्रिकेटर रहे हैं।)








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