देश और समाज के अवचेतन मन से खिलवाड़ खतरनाक

विशेष , , रविवार , 21-01-2018


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डॉ. राजू पांडेय

पिछले गणतंत्र दिवस के बाद के इस एक साल के वक्फे को भारतीय जनमानस के अवचेतन मन के साथ सुनियोजित छेड़छाड़ के लिए याद किया जाना चाहिए। यह अवचेतन मन ग्रे शेड्स को स्वयं में समेटे है और हिंसा, नफ़रत, अतिश्योक्ति और दम्भ इस अवचेतन संसार में आम विचरण करते देखे जा सकते हैं। आम जनता की अभिव्यक्ति और उसकी चिंतन प्रक्रिया को मर्यादित और नियंत्रित करने का उत्तरदायित्व जिन-जिन पर होता है – बुद्धिजीवी, राजनेता, मीडिया मालिक, सेलेब्रिटीज़, और जनता के अन्य रोल मॉडल्स- सभी के सभी इस उत्तरदायित्व से विमुख हो रहे हैं। कुछ जानबूझ कर एक रणनीति के तहत ऐसा कर रहे हैं और कुछ इस रणनीति के शिकार बन कर ऐसा कर रहे हैं। राजनेताओं की सुनियोजित अमर्यादित और अनियंत्रित अभिव्यक्तियों को प्रचारित और प्रसारित करने का कार्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा किया जा रहा है और जो बातें बिल्कुल अशोभनीय और आधारहीन होती हैं उनके लिए सोशल मीडिया के मंच का उपयोग किया जा रहा है। 

इस प्रक्रिया का नवीनतम उदाहरण चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस और उसके बाद का घटनाक्रम है। प्रेस कांफ्रेंस के बाद भाजपा ने अधिकृत रूप से यह स्टैंड लिया कि यह सुप्रीम कोर्ट का आंतरिक मामला है और इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। कांग्रेस ने जजों के स्वर में जनता की ओर से अपना स्वर मिलाया। इसके बाद सोशल मीडिया में भाजपा के प्रति सहानुभूति रखने वाले ऐसे लोगों के ट्वीट्स और पोस्ट्स की बाढ़ आ गई जो प्रत्यक्षतः भाजपा से असंबंधित हैं। जो नैरेटिव बनाया गया उसके अनुसार ये जज कांग्रेस के कार्यकाल के हैं, अवार्ड वापसी गैंग के सदस्य हैं, वामी सेक्युलर गिरोह का हिस्सा हैं, अफजल गुरु से सहानुभूति रखते हैं, ईसाई हैं, आधार विरोधी हैं, कांग्रेसी परिवार के हैं, ये अल्पमत में हैं, सुप्रीम कोर्ट में कार्य कर रहे शेष 21 जज इनका साथ नहीं दे रहे, ये इसलिए असंतुष्ट हैं कि इनकी मनमानी पर अब रोक लग गई है, यदि ये सचमुच असन्तुष्ट हैं तो इन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए, इन पर महाभियोग चलाना चाहिए।

इसके विपरीत चीफ जस्टिस राष्ट्र भक्त हैं, ब्राह्मण हैं, अफजल गुरु को फांसी की सजा देने वाले हैं, राष्ट्रगान को सिनेमा घरों में अनिवार्य करने वाले हैं, 1984 के सिख विरोधी दंगों की दुबारा जांच का आदेश देने वाले हैं इसलिए कांग्रेस और वामपंथी गिरोह के निशाने पर हैं। जब इसका जवाब सोशल मीडिया पर दिया जा रहा है तो उसमें चीफ जस्टिस मनुवादी और भ्रष्ट बताए जा रहे हैं और यह चार जज धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के चैंपियन के रूप में चित्रित किए जा रहे हैं। विमर्श जो समेकित प्रभाव उत्पन्न कर रहा है उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राजनीतिक दलों के एजेंट हैं और जाति, धर्म के आधार पर फैसले लेना इनके लिए आम बात है, भ्रष्ट तो खैर ये हैं ही। यह देश को गॉसिप के द्वारा संचालित किए जाने के प्रयासों का महज एक उदाहरण है।

हाल ही में जब इजरायली प्रधानमंत्री भारत आए तो राहुल गांधी के कार्यालय से एक वीडियो पोस्ट किया गया जिसका उद्देश्य शायद यह बताना था कि राहुल भारतीय राजनीति के अकेले विदूषक नहीं हैं प्रधानमंत्री भी उनसे कोई कम नहीं हैं। यह उसी गलत परिपाटी का निर्वाह था जिसका उपयोग प्रधानमंत्री और उनके साथी राहुल के विरुद्ध पूरी नृशंसता के साथ करते रहे हैं। इस वीडियो में मोदी की कूटनीति को हगोप्लमैसी का नाम दिया गया। भारत अब तक फिलिस्तीन समर्थक रुख के साथ विश्व जनमत के साथ खड़ा नज़र आता था किंतु इजराइल की उग्र मुस्लिम विरोधी आक्रामक सामरिक रणनीति के प्रति भाजपा आरएसएस के आकर्षण के कारण भारत की विदेश नीति में बदलाव दिखता है। हालांकि यह भी सच है कि भारत का प्यार बड़ी हद तक एकतरफा है और इजरायल भारत के इस आकर्षण में अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की संभावनाएं तलाश रहा है।

विदेश नीति के बहुत से तत्व निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का एक भाग होते हैं और इजरायल के साथ हुए समझौतों पर लंबे समय से काम चल रहा था। आवश्यकता नेतन्याहू के भारत दौरे की खास ब्रांडिंग- पैकेजिंग के पीछे निहित इरादे को उजागर करने की थी किन्तु इसे छोड़ कर कांग्रेस विमर्श को दूसरी ओर ले गई और मामला विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की उपस्थिति में प्रधानमंत्री के अपमान का बन गया। इधर कश्मीर के शिया मुसलमानों के इजराइल विरोधी प्रदर्शनों के कारण राष्ट्रवादी-राष्ट्रविरोधी मुद्दे को हवा मिली और हिन्दू- मुस्लिम ध्रुवीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। मीडिया और सोशल मीडिया में इजराइल के घातक हथियारों, मोसाद और उसकी कातिल सुंदरियों का जैसा चित्रण हो रहा है वह कुछ ऐसे रोमांचक रहस्यलोक की रचना कर रहा है मानो आतंकवाद के विरुद्ध भारत की लड़ाई में जेम्स बांड ,मेजर बलवंत और उनके साथियों का प्रवेश हो गया है। काल्पनिक शत्रुओं से काल्पनिक युद्ध लड़ते-लड़ते आपसी सौहार्द को गंवा देने की ओर अग्रसर समाज को यहां देखा जा सकता है।

सेनाध्यक्ष बिपिन रावत के विभिन्न बयान शायद इस बात की बढ़ती आवश्यकता का परिणाम हैं कि अब देशभक्त होना ही काफी नहीं, देशभक्त दिखना भी जरूरी है। सेनाध्यक्ष के बयान युद्ध के मैदान में कितने उपयोगी होंगे यह तो पता नहीं लेकिन सोशल मीडिया में लाइक और कमेंट अर्जित करने में ये जरूर कामयाब रहे हैं। उनके बयान आक्रामक भी होते हैं और कई बार उन क्षेत्रों तक भी पहुंच जाते हैं जो अब तक राजनीतिज्ञों और कूटनीतिज्ञों के लिए सुरक्षित रखे गए थे। यदि इन बयानों के कारण पाकिस्तान और चीन के साथ तनाव बढ़ता है तो मुख्य सेनाध्यक्ष को गैर जिम्मेदार कहना उनके साथ रियायत बरतना होगा। सेना का शौर्य और पराक्रम उसके कार्यकलापों से जाना जाता रहा है न कि शब्दों से। सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान पहली बार सेना की आंतरिक गोपनीय गतिविधियों को सेना के मुख से सार्वजनिक कराया गया। जब इसकी आलोचना हुई तो इसे सैनिकों और उनके पराक्रम पर अविश्वास का रूप दे दिया गया। इसके बाद कई मुद्दे जनचर्चा का विषय बने और सार्वजनिक विमर्श में आए। इनमें सैनिकों की भोजन व अन्य व्यवस्थाओं में कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार, उच्चाधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थों के शोषण और शहीद सैनिकों के प्रति राजनेताओं के असम्मान से जुड़े मुद्दे प्रमुख थे।

सरकार सेना के साथ खड़ी रहे यह स्वाभाविक है किंतु जब यह कहा जाता है कि इस दल विशेष की सरकार सैनिकों की सच्ची हितचिंतक है और दूसरे दलों की सरकारें सैनिकों के साथ भेदभाव करने वाली और सेना के मनोबल को गिराने वाली रही हैं तब इस संवेदनशील मामले के राजनीतिकरण की शुरुआत हो जाती है। स्थिति और खतरनाक हो जाती है जब जाति और धर्म के आधार पर सैनिकों और शहीदों की गिनती होने लगती है। सेना अभी तक राजनीति और सार्वजनिक बयानबाजी से दूर रही है और राष्ट्रीय एकता की बेहतरीन मिसाल मानी जाती है। सैनिकों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा, समृद्धि और सम्मान हमेशा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिन जब अपने कर्त्तव्य पालन को सरकार एक इवेंट में बदल देती है और देश की जनता की भावनाओं की नुमाइश लगा दी जाती है तो यह सैनिकों एवं सैनिक परिवारों की तपस्या को ग्लैमराइज कर भंग करने की कोशिश बन जाती है।

सोशल मीडिया में न्यायपालिका और सेना के विषय में जो नैरेटिव बनाया जा रहा है वह ऑल्ट ट्रुथ की अनेक मिसालों में से एक है। न्यायाधीश और सैनिक, प्रशिक्षण और आत्मनिरीक्षण के द्वारा धर्म, जाति, क्षेत्र और विचारधारा की संकीर्णताओं पर विजय प्राप्त कर अपने पेशे में सफलता के लिए आवश्यक तटस्थता अर्जित करने की जद्दोजहद में निरंतर लगे रहते हैं। इन्हें न केवल इस दलदल में वापस घसीटने की कोशिश हो रही है बल्कि इन्हें जनता की मेलोड्रामैटिक और फिल्मी अपेक्षाओं के अनुसार आचरण करने के लिए प्रेरित भी किया जा रहा है।

संविधान भी इस ह्रासात्मक विमर्श से अछूता नहीं रहा है। पिछले दिनों जब केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने संविधान के सेक्युलर स्वरूप में बदलाव संबंधी बयान दिया था तब से संविधान को लेकर सोशल मीडिया में ऐसे सवाल उठाए जा रहे हैं जो किसी रुग्ण समाज के अवचेतन मन में ही उठ सकते हैं। संविधान को विदेशी विचारधारा पर आश्रित बताया जा रहा है और उसे भारतीय नैतिक मूल्यों के अनुरूप ढालने की चर्चा हो रही है। एक दूसरा विचार जो चर्चा में लाया जा रहा है वह यह है कि संविधान दलितों और अल्पसंख्यकों के अनुकूल है और सवर्णों तथा बहुसंख्यकों के साथ भेद भाव करता है। आरक्षण की समीक्षा का सुझाव भी इसी सोच की उपज है। तीसरा विचार अंबेडकर को भिन्न रूप से व्याख्यायित करने से सम्बंधित है।

इसके अनुसार राष्ट्रवादी अम्बेडकर ने संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्दों का प्रयोग नहीं किया था और आपातकाल के दौरान श्रीमती गांधी ने 42 वें संविधान संशोधन द्वारा इन्हें जुड़वाया था ताकि वे अपने वोट बैंक को पुख्ता कर सकें। जब संविधान और न्यायपालिका के चरित्र को हृदय से धार्मिक बहुसंख्यकों और विशेषकर सवर्णों के प्रतिकूल और कांग्रेसी या वामपंथी विचारधारा का समर्थक मानने वाले लोग इस संविधान का राजनैतिक विवशतावश पालन करते हैं तो वैसी ही स्थितियां उत्पन्न होती हैं जैसी फ़िल्म पद्मावत की रिलीज पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्पन्न हो रही हैं। रणनीति वही है, जिम्मेदार लोग जिम्मेदारी भरे बयान दे रहे हैं, फैसले का अध्ययन कर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार हेतु अपील की बात कही जा रही है, सोशल मीडिया बेलगाम है, सुप्रीम कोर्ट पर वह सारी बुरी टिप्पणियां की जा रही हैं जिनकी कल्पना नहीं की जा सकती है, एक समुदाय विशेष फ़िल्म का उग्र विरोध कर रहा है और हर तरह की धमकियां दे रहा है, राज्य सरकारें इस समुदाय को प्रोत्साहित करने की हद तक मौन हैं। अभिव्यक्ति की आजादी पर आस्था का प्रश्न भारी पड़ रहा है। संविधान और न्यायपालिका के आदर-सम्मान का इस तरह खत्म होना भयानक अराजकता की ओर ले जा सकता है।

संवैधानिक संस्थाओं पर इतने प्रश्न उठ रहे हैं कि आम नागरिक के लिए यह तय कर पाना कठिन है कि क्या इनका अपने राजनीतिक लाभ हेतु दुरुपयोग किया जा रहा है या फिर इन संस्थाओं द्वारा राजनीतिक दलों और धार्मिक-जातीय समुदायों के संकीर्ण हितों के विरुद्ध दिए गए निर्णयों के कारण इन्हें बदनाम करने की साजिश हो रही है। आप पार्टी के 21 संसदीय सचिवों की सदस्यता रद्द करने का चुनाव आयोग का निर्णय क्या इसलिए गलत ठहराया जा सकता है कि उसने अन्य अनेक राज्यों के संसदीय सचिवों पर कोई कार्रवाई नहीं की। पहलाज निहलानी उड़ता पंजाब, लिपस्टिक अंडर माय बुर्का और इंदु सरकार के संबंध में अपने फैसलों के लिए एक वर्ग को चाटुकार और सत्ता समर्थक लगते रहे और अब प्रसून जोशी पद्मावत की रिलीज़ को मंजूरी देकर एक दूसरे वर्ग के निशाने पर हैं। दुविधा यह है कि क्या हम संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ नकारात्मक प्रचार का शिकार हो रहे हैं या संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग को इनकी गरिमा की रक्षा के नाम पर अनदेखा करने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं। निर्णय अत्यंत कठिन बना दिया गया है।

 नकारात्मकता के विमर्श को सकारात्मकता का आभास उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। गुजरात दंगे के विरुद्ध चौरासी के दंगे, सहारनपुर की हिंसा विरुद्ध मुजफ्फरनगर की हिंसा,  पीडीपी के साथ बीजेपी का गठबंधन विरुद्ध केरल में कांग्रेस का मुस्लिम लीग का गठजोड़,  मीडिया पर पाबंदी विरुद्ध आपातकाल, मुस्लिम आतंकवाद विरुद्ध हिन्दू आतंकवाद आदि दो नकारात्मक घटनाओं या प्रवृत्तियों की टक्कर से अपनी नकारात्मकता को सकारात्मकता बदलने की कोशिश के अनगिनत उदाहरणों में से एक है। जब श्री मोदी के अंधानुकरण में लगे श्री राहुल गांधी बहरीन में देश के बारे में विवादित टिप्पणी करते हैं तो वे इसी नकारात्मकता में योगदान दे रहे होते हैं। नकारात्मकता का यह विमर्श निगेटिव रीजनिंग और निगेटिव थिंकिंग को आदत में बदलने का काम कर रहा है।

सोशल मीडिया की हिंसात्मक और अराजक फंतासी जब यथार्थ बनती है तो कितनी भयानक होती है इसका उदाहरण भीमा कोरेगांव की घटनाएं हैं। राजसमन्द की क्रूरतम और बर्बर हत्या और इसके बाद हत्यारे के समर्थन में हुए उग्र प्रदर्शन भी सोशल मीडिया की नफरत को रूपाकार लेते देखने की तरह हैं- अनियंत्रित अवचेतन का वीभत्स चेहरा हमारे सामने है। भीड़ की अराजक और अमूर्त हिंसा को एक मकसद और तरतीब देने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया जा रहा है जो चिंताजनक और खतरनाक है। संगठित अपराधी गिरोह और प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक गुट अपने विरोधियों को नेस्तनाबूद करने के लिए धार्मिक और जातीय हिंसा का खुल कर उपयोग कर रहे हैं और सोशल मीडिया में चर्चित, पुरस्कृत तथा प्रोत्साहित भी हो रहे हैं। 

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने दर्शकों को सोशल मीडिया की ओर जाने से रोक नहीं पा रहा है या जानबूझकर सोशल मीडिया की ओर धकेल रहा है यह भी एक मुश्किल सवाल है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बहुमूल्य घंटे जब किम जोंग की सनकों, नित नूतन बलात्कारी बाबाओं की रास लीलाओं और भारत चीन या भारत पाकिस्तान के काल्पनिक युद्ध मे प्रयुक्त होने वाले पारम्परिक और एटमी हथियारों के विवरण को समर्पित हों तो नई और वैकल्पिक सूचनाओं के लिए दर्शक सहज ही सोशल मीडिया की ओर जाता है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो वह एक पैसिव व्यूअर रहता है किंतु सोशल मीडिया तो इंटरेक्टिव प्लेटफार्म है। यहाँ पाठक, दर्शक श्रोता के लिए उसके अवचेतन में छिपे दैत्यों के लिए कुशलता पूर्वक तैयार भोजन परोसा जाता है। चालाक कंडीशनिंग का यह प्रयोग समाज के सामूहिक अवचेतन मन को अपने ढंग से अपनी जरूरतों के मुताबिक गढ़ रहा है और एक अराजकता का जगत अस्तित्व ले रहा है।

(डॉ. राजू पाण्डेय विभिन्न विषयों पर नियमित तौर पर लिखते हैं और आजकल रायगढ़ में रहते हैं।)










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