बर्बरता की जड़ों की तलाश में

विशेष , , सोमवार , 16-04-2018


crime-scene-bourgeois-politics-modi-shah

जगदीश्वर चतुर्वेदी

आपको कठुआ और उन्नाव के बलात्कार और बलात्कारियों के पक्ष में जुलूस नई बात लग रही होगी,लेकिन उनकी तो यह पुरानी आदत है, याद करें गुजरात और मुंबई के चर्चित जनसंहारों को, वहां अनगिनत औरतों के साथ रेप हुआ, सैंकड़ों मौत के घाट उतारे गए, इसके बाद उन लोगों ने सारे देश में जुलूस निकाले, जश्न मनाया, उनके नायक ने कभी एक वाक्य निंदा का नहीं बोला, उलटा आपको समझा दिया कि देश के रखवाले वही हैं, असल में आप लोग उनके कुकर्मों और बर्बरता को जल्द ही भूल जाते हैं। आज वे केन्द्र में हैं, बीस राज्यों में उनकी सरकारें हैं। ये सरकारें उनको जनता ने सौंपी हैं, सवाल यह है जनता उनके कुकर्मों और बर्बरता को भूल कैसे गयी? जिन नेताओं को गुजरात-मुंबई के दंगों के कारण जेल में या फांसी के फंदे में होना था वे अब देश चला रहे हैं, वे देश में बर्बरता के विकास के लिए जाने जाते हैं, वे बर्बरता का नया पैराडाइम बना रहे हैं।

उल्लेखनीय है भारत में विगत सत्तर साल में लुंपेन बुर्जुआजी, लुंपेन समाज और लुंपेन संस्कृति का जन्म हुआ है। इससे वे तमाम धारणाएं खंडित होती हैं जो राष्ट्रीय बुर्जुआ, जनवादी बुर्जुआ और नागरिक समाज और लोकतांत्रिक समाज के इर्दगिर्द घूमती रही हैं। हमने भारत के बुर्जुआजी की लुंपेन इमेज को केन्द्र में रखकर चर्चा ही नहीं की, सच यह है भारतीय बुर्जुआ लुंपेन है। जनता के संसाधनों, कानून और संविधान की अवहेलना का इसके अंदर प्रबलभाव है। यह रीढ़विहीन लुटेरा बुर्जुआ है। इसके सहयोगी वर्ग के रुप में बड़े पैमाने पर लुंपेन और करप्ट मध्यवर्ग पैदा हुआ।

इस वर्ग के लोग भ्रष्टाचार और सार्वजनिक संपदा की लूट में लुंपेन बुर्जुआजी के सहयोगी हैं। इस वर्ग ने अपनी सत्ता और महत्ता का संस्कृति से लेकर बैंकों तक, राजनीति से लेकर न्यायपालिका तक विस्तार किया है। यह वर्ग मूलत: असंवैधानिक केन्द्रों की तरह काम करता रहा है। आज हमें इस वर्ग पर बातें करनी चाहिए। यही वह वर्ग है जो मोदी शासन की धुरी है। इसी वर्ग ने बैंकों को लूटा है, सिस्टम में भ्रष्टाचार का सामाजिक आधार भी यही वर्ग है।

मौजूदा दौर में लुंपेन बुर्जुआजी का अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति, मासकल्चर आदि से लेकर सामाजिक नीतियों तक में वर्चस्व है। यह फलक बहुत व्यापक है। लेकिन इस रुप में अधिकतर दल या विचारक इसे नहीं देखते। लुंपेन बुर्जुआजी हम सबके जीवन में छोटी छोटी बेईमानी के जरिए दाखिल होता है हमें अपने रंग में रंग लेता है।

हमारे यहां लुंपेन बुर्जुआवर्ग के विकास देश के विभिन्न इलाकों में भिन्न गति से हुआ है। नव्य उदार दौर में नव्य बुर्जुआ,लुंपेनवाद का विकास तेजगति से होता है। समाजवाद और उदारतावाद का पतन होता है। ये दोनों विचारधाराएं लुंपेन बुर्जुआ को पसंद नहीं हैं। फलत: वे इस दौर में हाशिए पर चले गए और देश में साम्प्रदायिकता-पृथकतावाद और आतंकवाद का वर्चस्व बढ़ा है। इन तीनों को लुंपेन बुर्जुआजी ने लंबे समय से पाला पोसा है, इनके जरिए लूट और अव्यवस्था का सिलसिला बनाए रखने में मदद मिली है।

भारतीय बुर्जुआजी शुरू से लोकतंत्र विरोधी और लुंपेन रहा है। उसके विकास के गर्भ से जो मध्यवर्ग जन्मा वह भी लुंपेन और भ्रष्ट है। लुंपेन बुर्जुआजी ने सांस्कृतिक उपनिवेश बनाए हुए हैं, फलत: सांस्कृतिक गुलामी के रुपों ने जनमाध्यमों को घेरा हुआ है। इस घेराबंदी से युवा बड़ी संख्या में प्रभावित हैं।

नव्य पूंजीपति का विदेश पलायन, बैंकों की लूट, करप्ट नौकरशाही, करप्ट न्यायपालिका, करप्ट राजनेता और उनके पीछे गोलबंद जनता में लंपटगिरी-भ्रष्टाचार-आपराधिकता वे साझा तत्व हैं, इनसे लड़ा जाना चाहिए। ये सब वे लोग हैं जो पूंजीपति और मध्यवर्ग से आते हैं। ये सब मिलकर लुंपेन समाज बनाते हैं, यह समाज नागरिक समाज का विलोम है। आज पूंजीपति वर्ग और लुंपेन समाज ही लोकतंत्र, संविधान और स्वतंत्र मीडिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मोदी तो उसके बाई प्रोडक्ट हैं।

(जगदीश्वर चतुर्वेदी साहित्यकार और विचारक हैं। अध्यापकीय कार्य से रिटायर होने के बाद आजकल दिल्ली में रह रहे हैं।) 




Tagcrime politics bourgeois modi shah

Leave your comment