भारतीय संस्कृति को जानिये और फिर उसे बख्श दीजिए

संस्कृति , , बृहस्पतिवार , 15-02-2018


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उपेंद्र चौधरी

प्रेम भावनाओं के सागर का सबसे बड़ा भावनात्मक उद्वेग है। जब शराब के दो पैग चढ़कर मनुष्य को लड़खड़ाने लगता है, तो भला भावनाओं का पैग चढ़कर हमारे क़दमों की चाप अपनी चाल और लय क्यों न बदल ले। शराब, भांग,गांज़ा तो हम बाहर से स्थूल रूप में लेते हैं, उसका स्थूल प्रभाव दिखता है। पाचन क्रिया में जब तक उसका अस्तित्व रहता है,तब तक वह नशा भी रहता है। जैसे ही वह पाचन क्रिया के चक्र को पूरा कर लेता है, वह प्रभावहीन हो जाता है। मगर प्रेम शरीर की स्थूलता से मन की यात्रा करते हुए सूक्ष्म रूप में मन में उतरते हुए हमारे भीतर प्रवेश कर जाता है।

अक्सर तो हमारे हृदय को छू भर लेता है और हम आंतरिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं की लहर से तरंगित हो उठते हैं। यह हर स्त्री-पुरुष के साथ लगभग हर रोज़ ही घटता है। स्त्री-पुरुष के बीच के प्रेम में उनके शरीर भी शामिल होते हैं। बल्कि कहा जा सकता है कि इस शरीर की भूमिका ही अहम होती है। अगर ऐसा नहीं होता, तो ‘आंखें चार करने’ जैसे मुहावरे बड़े आम नहीं होते। फिर तो प्रेम ऐसे मुहावरों से भाषाई अभिव्यक्ति पाता, जिसमें शरीर का कोई अंग ही शामिल नहीं होता।

विपरीत लिंगियों के बीच पैदा हुए प्रेम का स्रोत ही शरीर है और ऐसा माने जाने का कोई कारण नहीं कि इसकी मंज़िल भी शरीर है।जिस दिन ये मंज़िल मिल जाती है, इसकी असलियत या भ्रम समझ में आने लगते हैं। जिन्हें असलियत समझ में आती है, वो भ्रम में नहीं पड़ते और जो भ्रम में रहते हैं, असलियत की तलाश में कई भ्रमों की श्रृंखला से ताज़िंदगी गुज़रते रहते हैं।

इस मायने में भारतीय दर्शन की परंपरा दुनिया की बनाई लीक से अलग हटकर चली है। यहां ‘कामशास्त्र’ को यौन शिक्षा का आनंद देने वाली किताब भर नहीं माना गया है, बल्कि रतिक्रिया को चरम तक ले जाने का सूत्र देने वाला एक ऐसा ग्रन्थ माना गया है, जिसे ऋचा का दर्जा हासिल है और जिस वात्स्यायन ने इस ‘कामशास्त्र’ की रचना की है, उन्हें ऋषि का स्तर हासिल है।

इस अर्थ में भारतीय संस्कृति बहुत हद तक यथार्थवादी है। दर्शन का यह यथार्थवाद इस समय के भ्रमित ‘आदर्शवाद’ की खिल्ली उड़ाता दिखता है। इस मायने में आधुनिक भारतीय समाज अपने प्राचीन समाज के मुक़ाबले बेहद पश्चगामी है यानी समझ-बूझ के स्तर पर बिल्कुल उल्टी दिशा में चलने वाला और ज़्यादातर नाकारात्मक दिशा अख़्तियार कर लेने की हद तक चलने वाला है। जो समाज रति के स्तर पर संतुष्ट होता है, उसमें विरत होकर नया समाज रचने-गढ़ने का माद्दा होता है।

ठीक इसके विपरीत जिस समाज में रति की वास्तविकता को स्वीकार करने की शक्ति नहीं होती, वह कुंठित होकर दूसरों के किये धरे पर जीने को अभिषप्त होता है। मगर रति से संतुष्ट होने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति उसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानकर उसी में रत रहे। बल्कि इसका प्राथमिक मतलब यही है कि व्यक्ति पहले उसके अस्तित्व को बिना लाग-लपेट स्वीकार करे। फिर इसके अर्थ का दूसरा सफ़र वही है, जिसे लेकर ऋषि वात्स्यायन ने ‘कामशास्त्र’ की रचना की होगी।

ऋषि वात्स्यायन का कामशास्त्र सड़क पर बिछती-बिकती ‘सेक्स का मज़ा देने वाली किताब’ नहीं है, वह सेक्स की ‘शास्त्रीयता’ सिखाता ‘शास्त्रीय’ यानी ‘क्लासिक’ ग्रन्थ है। यह शरीर से शरीर के लिए और शरीर द्वारा दो विपरीतलिंगयों के बीच के सेक्स की व्यवस्था देता ग्रन्थ है। इस व्यवस्था में सहमति है, सहजता है, अहंकार का त्याग है और समागम का चरम है। शायद इसलिए दो लोगों को एक दूसरे को समान रूप से भोग लेने की तरफ़ चरमोत्कर्ष की यात्रा है। जहां सहमति का आधार खिसकता है, वह सेक्स या संभोग नहीं होकर कुछ और हो जाता है। क्योंकि SEX दो शब्दों का युग्म है-Same existence (अस्तित्व के समान स्तर पर) और संभोग भी दो शब्दों के युग्म से ही बना है, संभोग यानी सम्+भोग यानी एक दूसरे का समान स्तर पर भोग।

भोग प्रकृति का नहीं होता। प्रकृति की कोई ठोस काया नहीं है। वह अपने दिखने और उससे भी कहीं ज़्यादा नहीं दिखने वाली अनंत-असीमित घटकों के प्रतीकों से निर्मित है। हम सबकी अपनी-अपनी प्रकृति है, जो व्यापक प्रकृति के इशारे हैं। हम जब विपरीतलिंगियों के बीच के प्रेम की बात करते हैं और प्रकृति से प्रेम की बात करते हैं, तो दोनों के बीच कहीं तालमेल नहीं होता। दोनों को मिलाकर बात करने से हम फिर एक भ्रम पैदा कर रहे होते हैं। यह भ्रम दो सक्रिय शरीर और शरीर के स्तर पर एक शरीर के सक्रिय अ-शरीरी तथा निष्क्रिय पिंड के बीच के आकर्षण के मध्य पैदा होने वाले अंतर जैसा होता है।

प्रेम या यौन अभिप्सा की तुलना प्रकृति के प्रति प्रेम से नहीं हो सकती है। चांद और तारों के निहारने में अपने पार्टनर के शरीर और अहसास को सहलाने का सुख नहीं मिल सकता है। प्रेम या यौन अभिप्सा की पूर्ति बिना दो विपरीत लिंगियों के आपसी सहयोग के संभव नहीं है। मगर प्रकृति से प्रेम के लिए किसी के सहयोग की आवश्यकता बिल्कुल नहीं पड़ती। प्रकृति प्रेमी बनने की शर्त ही यही है कि शरीर से ऊपर उठना होगा, मगर विपरीत लिंगियों के बीच के प्रेम की पनप से लेकर प्रेम पाने तक में दो शरीर ही शामिल होते हैं।

दो शरीरों के बीच का अहसास कहीं न कहीं अपनी अभिव्यक्ति पाने की पुरज़ोर कोशिश करेगा। वेलेंटाइन जैसे मौक़े पर प्रेमी जोड़ियों के अहसास सड़कों, गलियों, पार्कों और किसी सार्वजनिक स्थलों पर भी खिलने को आतुर होने लगते हैं। मगर हमारे भीतर का ‘झूठा आदर्शवाद’ उसी डिग्री में उबलना भी शुरू हो जाता है। वेलेंटाइन डे को जो लोग भारतीय संस्कृति में अपसंस्कृति फ़ैलाने का आधार मानते हैं, वो या तो भारतीय संस्कृति के इतिहास से ही अपरिचित हैं या अगर परिचित हैं, तो फिर उन पर और भी बड़ा सवाल खड़ा होता है कि शायद उनकी मंशा इस संस्कृति के ख़िलाफ़ ही खड़ी है,जहां सदियों से सजी-संवरी भारतीय संस्कृति को बचाने की छद्म आड़ में एक नयी अपसंस्कृति गढ़ी जा सके। क्योंकि हम जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं, वह बड़ी ही व्यापक सोच वाली संस्कृति है; वह संस्कृति का ऐसा सागर है, जहां संस्कृतियों के नाले-पनाले-तालाब-नदियां विभिन्न दिशाओं से आकर ऐसे मिल हुए हैं, जिसका अपना एक समेकित रंग है और जिस समेकित रंग वाले महासागर से भी उनके अपने-अपने रंग अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं। अहसास को अभिव्यक्त होने दीजिए, क्योंकि अहसास बिना अभिव्यक्त हुए नहीं मानता। बहुत पहले ही रहिमन ने कह दिया है:

खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान

रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान। 

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)










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Ravi Shankar Ram :: - 02-17-2018
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