दलित आत्मकथाएं : जिंदगी के भूगोल की खुरदुरी पटकथाएं

हमारा समय और साहित्य , , रविवार , 29-07-2018


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अभय कुमार अभय

टाटा लोहे से कार, ट्रक और बहुत से सामान बनाते हैं। बाटा चमड़े से जूते बनाते हैं। लेकिन टाटा को कोई लुहार या बाटा को चमार नहीं कहता। जबकि हमें हमारे पेशे से पुकारा ही नहीं बल्कि अपमानित भी किया जाता है। आखिर क्यों? यह सवाल दलित लेखक श्योराज सिंह ‘बेचैन’ ने अपनी आत्मकथा ‘माई चाइल्डहुड ऑन माई शोल्डर्स’ (मेरे कंधों पर मेरा बचपन) में किया है, जिसमें इस प्रश्न से भी अधिक चिंताजनक घटनाएं दर्ज हैं। इस किताब से गुजरने पर मालूम होता है कि दलित सिर्फ सवर्ण जातियों के अत्याचार व भेदभाव का ही शिकार नहीं होते बल्कि उनके अपने भीतर भी जो ‘ऊंच-नीच’ की प्रथा है, वह भी उनके दमन का एक बड़ा कारण है, जिस वजह से वे अपनी बहुसंख्या के बावजूद सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक एकता दिखाने में अकसर विफल रहते हैं।

श्योराज सिंह ‘बेचैन’ ने अपने परिवार के एक प्रसंग को याद करते हुए लिखा है कि एक विशेष रस्म को पूरा करने के लिए दावत की तैयारी चल रही थी कि तभी अपमान का सिलसिला आरम्भ हो गया। क्योंकि खाना बनाने वाले रसोइयों ने दलित होने के बावजूद उनके घर के बर्तन प्रयोग करने से इंकार कर दिया। गौरतलब है कि देश आजाद होने की खुशी में महात्मा गांधी ने हरिजनों (हालांकि अब इस शब्द की जगह ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल चलन में है, लेकिन गांधीजी अपने द्वारा गठित शब्द ‘हरिजन’ को ही प्राथमिकता देते थे, और कल्लेन पोक्कुदान ने अपनी आत्मकथा ‘माई लाइफ इन द मैनग्रोव्स’ में ‘हरिजन’ शब्द को ही वरीयता दी है व एक बार भी ‘दलित’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। पोक्कुदान, पूमणि की तरह, अपने को किसी कीमत पर भी दलित लेखक के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहते हैं।) के लिए एक सार्वजनिक भोज का प्रबंध किया था कि तभी पंगत में से एक व्यक्ति भयंकर गुस्से के साथ खड़ा हुआ और बोला, “मैं इसके साथ भोजन नहीं करूंगा, यह नीची जाति का हरिजन है और मैं ऊंची जाति का हरिजन हूं।” 

इस पृष्ठभूमि को याद करते हुए कोई आश्चर्य नहीं होता कि अलीगढ़ व अन्य जगहों पर बीजेपी नेताओं ने होटल से खाना व मिनरल वाटर मंगाकर दलितों के घर पर उनके साथ ‘भोजन’ किया। उत्तर प्रदेश में आज भी चमड़े का काम करने वाले और न करने वाले दलित अपने को क्रमशः ‘चमार’ व ‘जाटव’ में विभाजित किये हुए हैं और आपस में रोटी व बेटी का रिश्ता रखना पसंद नहीं करते हैं। इसी स्थिति की व्याख्या डा. भीमराव अम्बेडकर ने ‘वर्गीकृत असमता’ के रूप में की थी। दलित समाज में यह ‘वर्गीकृत असमता’ आज भी व्याप्त है। इसका विरोध करने और दलितों की हीनभावना दूर करने के लिए ही भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर आजाद (जो फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत जेल में हैं) ने ‘द ग्रेट चमार’ मुहिम आरम्भ की थी। इन प्रयासों के बावजूद, दलितों के लिए सिर्फ जिंदा रहने का संघर्ष और आत्म-सम्मान बचाए रखना दैनिक संघर्ष है, जैसा कि गुजरात में घुड़सवारी के शौक में एक दलित युवक की हत्या से स्पष्ट है। 

भोजन करते दलित।

दलितों का शोषण अपने समुदाय के सदस्यों द्वारा भी किया जाता है। गरीबों व शक्तिहीनों का दमन व शोषण संसार में हर जगह होता है, लेकिन जन्म के आधार पर भेदभाव जाति-ग्रस्त भारत के लिए विशेष है। यह असमता, जो शुद्धता/अशुद्धता और नस्लीय श्रेष्ठता/तुच्छता की पूर्णतः गलत धारणा पर आधारित है, अपवित्रता के भय के कारण अब इतनी गहरी हो चुकी है कि परम्परागत परवरिश पाए अधिकतर भारतीय यह एहसास तक नहीं कर पाते कि जातिप्रथा कितना गंभीर राष्ट्रीय अनर्थ है। जाति की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत में आप धर्म बदल सकते हैं लेकिन जाति कभी नहीं बदलती। इस तथ्य का एहसास सिस्टर बामा फौस्तिना सूसैराज को जम्मू में हुआ जब वह इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि जाति चर्च से शक्तिशाली है। उन्होंने चर्च की सेवा करने के लिए सात वर्ष पहले इसमें प्रवेश किया था, लेकिन जब वह दलित ही रहीं तो उन्होंने कान्वेंट छोड़ने की योजना बनाई। मदुरै में उनकी वापसी से कोई प्रसन्न नहीं हुआ, खासकर उनके टीचर फादर मार्क स्टीफन, जो बहरहाल, एकमात्र व्यक्ति थे फौस्तिना की निराशा व त्रासदी की कहानी सुनने के लिए।          

फादर ने बामा को प्रेरित किया कि वह अपनी कहानी लिखें कि कम से कम उन्हें इससे कुछ राहत तो मिलेगी। बामा ने 30,000 शब्द लिखे ‘करुक्कू’ के शीर्षक से, जिसका अर्थ है पलम्यरा पेड़ की चाकू की धार जैसी तेज पत्ती। इस आत्मकथा को कोई प्रकाशक छापने के लिए तैयार नहीं हुआ, लेकिन आखिरकार जब फादर मार्क ने इसे स्वयं प्रकाशित किया तो यह समकालीन क्लासिक साबित हुई। दलितों में आत्मकथा लेखन का सिलसिला लगभग 100 वर्ष से चला आ रहा है। वह लिख रहे हैं क्योंकि मनोरंजन व्यापारी के शब्दों में ‘मैं लिखता हूं क्योंकि मैं हत्या नहीं कर सकता’। लेकिन यह आत्मकथा लेखन मुख्यतः क्षेत्रीय भाषाओं जैसे मराठी, कन्नड़, तेलगु, मलयालम व तमिल में ही था (हिंदी में सबसे पहले ओम प्रकाश वाल्मिकी की ‘जूठन’ आयी), जिससे दलितों की पीड़ा को उनके सीमित भाषाई व सामुदायिक दायरे के बाहर समझा ही नहीं जा रहा था। 

बहरहाल, जब लक्ष्मी होल्मस्ट्रोम ने बामा की तमिल में आत्मकथा ‘करुक्कू’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया तो बामा की सीधी शैली ने समाज के धार्मिक पाखंड व जाति चेतना में बड़ा व गहरा छेद कर दिया। बिचित्रनंदन नायक के शब्दों में- ‘मेरे पेट में जो आग धधक रही है, उससे मैं नये भूगोल की पटकथा लिखूंगा’। जिस गैर-दलित ने भी ‘करुक्कू’ का अध्ययन किया उसे पीड़ादायक जागृति की दुखद अनुभूति हुई। ‘करुक्कू’ के बाद अन्य दलित आत्मकथाओं के भी अनुवाद सामने आने लगे। अन्याय के बोध से प्रेरित होकर लिखी जा रही ये आत्मकथाएं दलितों के लिए मुक्ति का मार्ग बन गईं हैं। यादों के रूप में लिखा जा रहा यह विरोध साहित्य ऐसा अनुभव प्रदान करता है जिसकी पाठकों ने पहले कल्पना तक नहीं की थी। इसकी भाषा व शैली, लेखन के उन तमाम नियमों व सौन्दर्य आशाओं को ताक पर रख देती है जिन्हें जाति प्रभावित समाज ने अपने लिए गठित किया होता है।

जुलूस निकालते दलित।

आमतौर पर आत्मकथाएं आत्म का ही गुणगान करती हैं, लेकिन दलित आत्मकथाओं के साथ ऐसा नहीं है। वह एक तरह से एक गांव या एक समुदाय का इतिहास हैं। उर्मिला पवार की आत्मकथा ‘आयदान’ (मेरे जीवन का ताना बाना) समर्पण की इस पंक्ति से आरम्भ होती है- ‘वर्षों से मुझपर अपने गांव के मेहनतकश महिलाओं का कर्ज है जो अपने सिरों पर भारी बोझ के बावजूद मुझे पहाड़ी के ऊपर व नीचे ले जाया लाया करती थीं’। चूंकि किसी सरकार ने दलितों के इतिहास लेखन को प्रायोजित नहीं किया है, इसलिए 17 करोड़ लोगों का यह समुदाय अपने लेखकों के जरिये बोलता है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि इन आत्मकथाओं से दलितों का इतिहास, उनके दमन व पीड़ा की कहानियां सामने आयी हैं, लेकिन इनके अनुवादों से संसार में भारत की छवि पर भी अनेक प्रश्न खड़े हुए हैं। देश के बाहर भारतीय समाज की जो छवि प्रचारित है- वह दया, सहिष्णुता व शांति की है। लेकिन जो लोग यहां जातिप्रथा की क्रूरता को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हैं, उनके लिए यह कड़वा झूठ है। आज भी, अधिकतर गांवों में दलित कुछ निश्चित मार्गों का प्रयोग नहीं कर सकते या सवर्ण हिन्दुओं के सामने चप्पल नहीं पहन सकते। 

कुछ वर्ष पहले तक, केरल में, दलितों के बच्चे उसी मार्के का अंडरवियर नहीं पहन सकते थे, जिस मार्के का थिया व नायर पहनते थे। साल 2012 तक पोल्लाची के निकट गोरकनों (कब्र खोदने वालों) को एक रात पहले उन कब्रों में सोना पड़ता था जिनमें किसी सवर्ण हिन्दू को दफनाना होता था। अगर अत्याचारों की यह सूची किसी डरावने सपने की तरह प्रतीत होती है, तो पीड़ितों के लिए तो यह जागता हुआ दुःस्वप्न था। महत्वपूर्ण यह है कि अभी हाल तक अत्याचारियों को यह बोध ही नहीं था कि वह कुछ गलत कर रहे हैं। दलितों को भी विरोध करने का तरीका मालूम नहीं था।

आज ऐसा प्रतीत होता है कि दलितों के खिलाफ दमन व अत्याचार में वृद्धि हुई है तो उसकी वजह यह है कि आज दलित आवाजरहित नहीं रहे और वह अपने अधिकार व सम्मान पाने के लिए प्रयासरत हैं। अब वह अपना गुस्सा व पीड़ा राजनीतिक दृष्टि से अधिक दुरुस्त भाषा में व्यक्त करने में सक्षम हो गये हैं। अपने कलात्मक मिशन के लिए उनमें अधिक चेतना है और साथ ही वह अपनी मूल चिंताओं को भी अनदेखा नहीं कर रहे हैं। दलित आत्मकथाओं पर प्रतिक्रिया मिश्रित रही है। कुछ पाठक दलितों के तुरंत हमदर्द बन जाते हैं, अन्य उनके विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मानकर कि यह आत्मकथाएं विभाजक, अश्लील, प्रोपेगंडा आदि हैं। 

आलोचकों व समाजशास्त्रियों का मानना है कि दलित जीवन-लेखन का अनुवाद ऐसे समय में आया जब बाजार को इनकी जरुरत थी और काउंटर-हिस्ट्री में एकेडेमिक दिलचस्पी बढ़ रही थी। दोनों ही कारण पूंजीवाद प्रभावित प्रकाशन उद्योग के अनुरूप थे। इस बीच, भारत के बाहर दलित बुद्धिजीवी नये नौकरशाह बन गये हैं कि उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि उनका संघर्ष समाप्त हो गया है। नरेंद्र जाधव की आत्मकथा ‘आउटकास्ट’ की मिसाल देते हुए शर्मीला रेगे उन्हें मुक्त, जाति-रहित दलित कहती हैं। दूसरी ओर अपने देश में दलित राजनीति का सांस्कृतिक गुस्सा एकता का कोई राष्ट्रीय नेटवर्क नहीं बना सका है और न ही शिक्षा से दलित लेखकों का कोई अखिल भारतीय ग्रिड बन सका है, यह अलग बात है कि हर दलित लेखक का लक्ष्य अपने समुदाय की राजनीतिक चेतना को जागृत व विकसित करना है, जिसे वह अपनी भाषा में ही कर रहे हैं। 97 वर्ष पहले पोयक्कल अप्पाचन ने गाया था- ‘मेरे समुदाय के बारे में एक अक्षर नहीं है, हमारा इतिहास लिखने के लिए कोई नहीं है’। आज सैंकड़ों आवाजें हैं दलित इतिहास लिखने के लिए।

(लेखक प्रसिद्ध शायर हैं।)

 










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