दलित भोज की भगवा नौटंकी का एंटी क्लाइमैक्स

आड़ा-तिरछा , , शनिवार , 12-05-2018


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वीना

बड़ी जात का रौब मारते हुए भगवा-सफ़ेद कुर्ते पेट पर हाथ फेरते हुए उठे। शूद्र पर एहसान भरी नज़र फेंकते हुए सफ़ेद कुर्ता बोला - ‘‘ये पत्तल उठा कर फेंक देना। और इस मुंह की लार को संभाल कर रख। इस जनम में शूद्र धर्म बराबर निभाएगा तो अगले जनम में हमारी तरह सवर्ण बनकर मौज उड़ाएगा। जो पकवान आज देखने को मिले हैं अगले जनम में खाने को भी मिल जाएंगे... समझा कि नहीं..?”

जिस शूद्र की झोपड़ी में इन भगवा-सफ़ेद महानुभावों ने पकवान उड़ाए हैं वो और उसका परिवार कई दिनों से भोजन के नाम पर चंद चावल के दानों को पानी में उबाल कर बने मांड को पीकर गुज़ारा कर रहे हैं। आज ये घूंट भी अब तक नसीब न हुआ था जब ये मोटे पेट अपनी समानता पिकनिक का सामान लेकर झोपड़ी पर धावा बोलने आ धमके। 

चावल-दाल, कई तरह की सब्ज़ियां, चटनियां, अचार, पूड़ी-पकौड़ी, मिठाईयां..! इतना खाना! इतना तो आज तक अपने समाज में किसी की ब्याह शादी में भी नहीं देखा था अब तक! भोजन जब एक-एक कर सजाया गया तो खुशबू ने झोपड़ी के मालिक सहित पड़ोसियों के पेट की भूख को भी बेकाबू कर दिया।  जब पहले चटाई बिछाई गई और फिर उस पर नई चादर डालकर भगवा-सफ़ेद कुर्ते पसर गए तो शूद्रों ने सोचा उन्हें भी आज समानता पिकनिक में धरती पर ही सही पर आमने-सामने इन व्यंजनों को जीमने बैठाया जाएगा। जीवन में एक बार ही सही पर आज स्वादिष्ट-अनोखे व्यंजनों से उनका पेट भी मालामाल हो लेगा।

प्यार से परोसेंगे और साथ-साथ खाएंगे। बेसब्र शूद्र टोला बैठने के लिए आगे बढ़ने को जैसे ही हुआ, अरे! ये क्या..?  भगवा-सफ़ेद कुर्ते तो परोसने वाले भी साथ लाए हैं। शूद्र खड़े रह गए और देखते ही देखते परोसने वाले परोसने में और भगवा-सफ़ेद बग़ैर इधर-उधर देखे दनादन ठूसने में मगन हो गए..! नंग-धड़ंग हड़्डियों के ढांचे बन चुके झोपड़ी के बालकों को भी न पूछा..!

भगवा-सफ़ेद कुर्तों में अटे पेट व्यंजन ठूस कर अपना आकार बढ़ाते रहे और शूद्र परिवारों के मुंह लार पर काबू करने की जद्दोजहद में लगे रहे। और कैमरे के क्लिक, समानता का राग अलापते रहे।

मैले- कुचैले गमछे के नीचे खुद को संभालने की कोशिश करते झोपड़ी के मालिक के झुके कंधे तो कलफ़दार भगवा-सफ़ेद वस्त्रों की सेवा में मौजूद दिखाई दे रहे हैं पर आत्मा, समानता कहां हैं..? समानता कहां हैं..?  का विलाप कर रही है। कंधों को मस्तिष्क से जोड़ती गर्दन तन गई है। आज इस शूद्र की आंखों को इसके दिमाग़ ने महाभारत के संजय की आंखें बना दिया है। वो सामने खड़े भगवा-सफ़ेद कुर्तों के पार देख-सुन रहा है।

जवाब न पाकर भगवा चिल्लाया - “अबे जनम जात मूरख... देख क्या रहा है..! चल पांव छू और ये आरती गा...

ओम जय सवर्ण उद्धारक

बलिहारी जाऊं...शीश नवाऊं... 

मुझ नीच के घर प्रभू आए हैं 

अगले जनम में सवर्ण बनाने का वादा भी साथ लाए हैं

भगवा-सफ़ेद की अदा, हमें भाई है

दरिद्र झोपड़ी की रोती दीवारों पर पुताई भी करवाई है

झोपड़ी के भीतर की शूद्र धरती माता पर 

नई-चटाई-चादर बिछाकर तशरीफ़ सजाई है

लोटा-कटोरी, गिलास-थाली, पत्तल

सेवकों की बारात भी साथ आई है”

सफ़ेद कुर्ते ने आस-पास खड़े बाक़ी दलितों को इशारा कर कहा - “तुम सब भी गाना इसके साथ। और बाद में हमारे लाए चादर-चटाई, बर्तन आपस में बांट लेना। तुम भी क्या याद रखोगे, हम जैसे उद्धारक स्वयं आए थे चलकर तुम नीचों के अगले जनम का उद्धार करने। इस जनम में हमारा ये उपकार भूल मत जाना।“

इधर भगवा अपना गौरव गान रटा रहा है और उधर शूद्र की आंखों में सवर्णों का छल-कपट नाच रहा है। वो देख रहा है कि बेकसूर चंद्रशेखर आज़ाद रावण जेल की सलाखों के पीछे छटपटा रहा है। कहीं फूलन देवी का हत्यारा भगवा-ख़ाक़ी सुरक्षा से लैस भीम आर्मी के होनहार नौजवान सचिन वालिया पर गोली दाग़ रहा है। कहीं कोई शूद्र बालक घोड़ा ख़रीदने की सज़ा मौत पा रहा है।

कहीं शूद्र बालिका एक मूली की क़ीमत अपनी अस्मत से चुका रही है। कहीं बेटी के बलात्कार पर सवाल करने वाले शूद्र बाप की आंखें निकाल ली गई हैं। कहीं कोई शूद्र बेटी बार-बार बलात्कार से बचने के लिए ख़ुद अपना सिर मुंडा रही है। कहीं किसी शूद्र लड़की के पढ़ाई में तेज होने की सज़ा उसका बलात्कार कर दी जा रही है। कहीं गाय के नाम पर शूद्रों की खाल उधेड़ी जा रही है..! कहीं घोड़ी पर चढ़े दूल्हे को घसीट कर उसकी मूछ नोची जा रही है। कहीं शूद्रों के घरों में आग लगाई जा रही है। कौन हैं ये अत्याचारी?

झोपड़ी के इस संजय ने आज पहचान लिया इन्हें, और बता दिया सबको। हां, वो यही भगवा-सफ़ेद कुर्ते हैं जो सब आदेश देकर यहां, उसकी झोपड़ी में पकवान उड़ाने पहुंचे हैं। 

वो व्यंजन जिनके लालच ने उसके मुंह में लार भर दी थी, अब जानकर उसे महसूस हुआ कि ये पकवान शूद्रों के जिस्मों से नोचे गए मांस के लोथड़े हैं। ये चटनियां शूद्र नौजवानों की चमड़ी से टपकते लहू से तैयार की गई हैं। भगवा-सफ़ेद ने जो मीठा मजे ले लेकर चट किया है, उसे शूद्र बालिकाओं की योनि से चीखते-रिसते लहू से सजाया गया है। 

उफ़्फ़! क्या वो इस भोजन के लिए ललचाया था..? जैसे ही उसके ज़हन में ये ख़्याल आया उसे ज़ोर से उबकाई आई और लार से भरा उसका मुंह पिचकारी की तरह सामने खड़े भगवे कुर्ते की टांट पर फट पड़ा। सवर्ण भगवा कुर्ते को सिर से खड़ाऊ तक शूद्र की लार ने अपने कब्ज़े में ले लिया।

सफ़ेद कुर्ते ने भगवे का हश्र देखकर चिल्लाने को मुंह खोला ही था कि आस-पास खड़े बाक़ी शूद्रों ने आगे बढ़कर भगवा-सफ़ेद कुर्तों पर अपनी उबकाईयों को दे मारा। और फिर दीवारों से पुताई खरोंच कर, चटाई-चादर, बर्तन समेट कर भगवा-सफ़ेद पर पटक दिए। 

झोपड़ी के मालिक ने कैमरे तोड़ते हुए लार में जमें भगवा-सफ़ेद कुर्तों को चेतावनी दी - ‘‘सुनो, अपना उद्धार हम ख़ुद कर लेंगे। आप जनाब हमारी झोपड़ी इस्तेमाल करने का किराया चुका जाइयेगा। फोटो का रेट एक शूद्र, दो शूद्र, पूरी बस्ती के आधार पर अलग-अलग होगा। फोटो का कॉपी राइट हमारे पास रहेगा। जितनी बार इस्तेमाल करेंगे, उतनी बार पैसा देना होगा। हर फोटो, ख़बर, वीडियो में लिखा होगा कि ये ‘‘प्रायोजित नौटंकी है।’’  इस्तेमाल के बाद झोपड़ी को मूल रूप में वापस करना होगा। धूर्तता की कोई निशानी छूटनी नहीं चाहिये। और हां, अगली बार समय लेकर आना। इमरजेंसी का रेट अलग होगा।“ 

सभी भूखे पेट शूद्र एक-दूसरे को आंखों ही आंखों में बता रहे हैं कि आज सम्मान का पकवान छक कर खाया है।

(वीना फिल्मकार, व्यंग्यकार और पत्रकार हैं।)








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???? ???? :: - 05-17-2018
ये लेखिका पता नहीं कौन सी किताब पढी हैं इसने शायद ये जो फोटो दिखा रहा है उसमें पश्चिम यूपी के नेता हैं और इसे ये पता होना चाहिए के जाटों को भी शूद्र ही कहा जाता था लेकिन फिर लोगो को मुसलमानों के अत्याचार से बचाने वाले जाट ही थे ये जो सफदरजंग के नाम से मकबरा बना है वो खुद अबदाली को डर से भाग कर दिल्ली से भरतपुर चला गया था तो तुम कामरेडी लोग कभी चाहते ही नहीं के दलित मुख्य धारा में आये हमेशा उनहे कमतर दिखाने की कोशिश करते रहते हैं तुम लोग कभी. समाज को जुडने मत देना हर बात में अपनी मनघंडत राजनिती घुसेड देना बस ये ही औकात है तुमहारी 27साल बंगाल में लेफट पार्टी की सरकार रही सबसे गरीब प्रदेशों में से एक हैै बंगाल कया है तुमहारी सोच बक बक और झूठ बोलना बस और समाज को बांटना इस लिये ही खत्म होने की कगार पर हो चंद जिले के छोड कर पूरा भारत तुमहे नकार चुका है एक आतंकवादी को समर्थन करने वाली विचारधारा केनाटकेसाबितकरनाचाहते हो के तुम ये बडा गरीबो का मसीहा कोई नहीं हैं और बंगाल को तुमने बरबाद कर के रख दिया

KK Singh :: - 05-13-2018
दोस्तों, सच्चाई से मुंह मोड़ना मतलब है दुःख, शोषण, प्रतारणा को हमेशा के लिए बरकरार रखना! सच्चाई यह है कि पूंजीवाद ना केवल अपने मालों को बेचकर पूंजी वापस लेता है और फिर से पुनरुत्पादन करता है, सतत मुनाफे के लिए, बल्कि सामाजिक और राजनितिक बंधनों और अन्ध्विश्वासों का भी पुनरुत्पादन करता है, बढ़ते हुए स्तर पर करता है! ऐसा क्यों? ताकि मजदूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आपस में लड़ता रहे, कभी भी एक ना हो, क्रन्तिकारी विचारधारा से दूर रहे! आज इसको ख़त्म करने का एक ही रास्ता है. पूंजीवाद को दफ़न करो, जो बेरोजगारी, महंगाई, भुखमरी, गरीबी, मुर्खता, अंधविश्वास की जननी है! इसके साथ ही जातिवाद, धर्म आदि का भी खात्मा होगा. और यह रास्ता केवल मार्क्सवाद लेनिनवाद के पास है!