बीजेपी विरोधी एकता में दलित और अतिपिछड़ा पेंच

धर्म-सियासत , , बुधवार , 04-04-2018


dalit-muslim-bjp-unity-bandh-backward

उपेंद्र चौधरी

रामविलास पासवान, रामदास अठावले, उदितराज और मायावती, ये सब अपनी-अपनी राजनीतिक और सामाजिक ठसक की बदौलत दलितों के छद्म प्रतीक प्रतिनिधि हो चुके हैं। नेतृत्व की यह पंक्ति एक तरह से दलितों के भीतर उबल रहे सामाजिक-राजनीतिक लावा के सेफ़्टी वॉल्व साबित होने लगे हैं। लालू प्रसाद यादव, मुलायम-अखिलेश यादव, यादवों सहित पिछड़ों के एक बड़े वर्ग को नवसवर्ण की श्रेणी में लाने में कामयाब रहे हैं। लेकिन अतिपिछड़ों और दलितों की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति उनके प्रतीकों को मज़बूत करने से आगे नहीं बढ़ पायी है।

अतिपिछड़ी जातियों और दलितों के लिए अब भी हालात कमोवेश नहीं बदले हैं। समय आ गया है कि अतिपिछड़ों और दलितों के हक़ में ये नवसवर्ण बने कथित 'पिछड़े' भी आरक्षण से अपने दावे को दरकिनार करें। अगर ये नवसवर्ण सोच रहे हैं कि दलितों का एकदिनी बंद सिर्फ़ सवर्णों के ख़िलाफ़ शंखनाद था, तो यह एक बड़ी ग़लतफ़हमी होगी। सोशल मीडिया पर आयी टिप्पणियों का अगर अध्ययन किया जाय, तो साफ़-साफ़ दिखता है कि नवसवर्णों के भीतर भी अब उस धर्म और संस्कृति के लिए अगाध आस्था है, जिसे उनके नेता कल तक सवर्णों द्वारा बुना हुआ जाल बताते थे और आज ऐसा दलित और अतिपिछड़े मानते हैं। यही कारण है कि बीजेपी को लेकर (राजनीतिक वर्चस्ववाद के कारण बहुत हद तक यादवों को छोड़कर) नवसवर्णों मंट उन्माद है और दलितों में ग़ुस्सा है।

अगर राष्ट्रीय या प्रांतीय राजनीति को लेकर मुसलमान इस दलित उभार को एक अवसर की तरह देखते हैं, तो कुछ देर के लिए तो वो सही हो सकते हैं, लेकिन इसे दीर्घकालिक नज़रिया नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि दलितों और एकीकृत मुसलमानों की सामाजिक स्थिति में बहुत अंतर है। यह अंतर उन्हें सामाजिक रूप से साथ आने में उसी तरह से बाधक है, जैसे आज अन्य पिछड़ी जातियों को लेकर है। इस्लाम में सैद्धांतिक रूप से हर मुसलमान समान है, लेकिन यहां भी व्यावहारिक तौर पर जातीय अंतर है, जो उनके बीच उनके आंतरिक सामाजिक ताने-बाने में स्पष्ट रूप से नज़र आता है।

एक पठान या सैय्यद किसी सक्षम जोलहे के यहां अपनी बेटी या बेटे का ब्याह नहीं रचा सकता। चूंकि मुसलमानों के सामने एक दूसरी तरह की चुनौती है, इसलिए यह विषमता या तो दिख नहीं पाती या अपना आकार नहीं ले पा रही है, क्योंकि उनके सामने की चुनौती का रंग बिल्कुल अलग है और इस चुनौती से निपटना उनकी पहली प्राथमिकता है। यहां भी दलितों सा जीवन है, यहां भी दलितों सा सामाजिक भेदभाव है, लेकिन यह सब समुदाय के खोल के भीतर है। जिस दिन उनकी प्राथमिक चुनौती ख़त्म होगी, उसी दिन से उनके आंतरिक सामाजिक ताने-बाने में उनके भीतर के सवर्णों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा सामने आयेगा।

दलितों का ग़ुस्सा इस मायने में इनसे अलग हैं, क्योंकि यहां धार्मिक सिद्धांत भी उनकी दुस्थिति को सहारा देते हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम को लेकर जो नज़रिया विकसित हुआ है या विकसित कराया गया है, उससे अलग दलितों की धार्मिक स्थिति है। हिन्दू धर्म के भीतर बाक़ी समुदायों की तरह दलितों के भीतर भी बहुस्तरीयता है। उनके अपने-अपने धार्मिक रीति-रिवाज़ हैं, उन रिवाज़ों पर गाये जाने वाले विविध गीत और संगीत हैं। सांस्कृतिक और धार्मिक परिधि में एक हद तक दलित अपनी स्वतंत्रता का आनंद मना सकते हैं। लेकिन इस्लाम के आधार पर संचालित होने वाले मुसलमानों के बीच इस तरह की धार्मिक विविधता न तो ऊपरी स्तर पर है और न ही आंतरिक स्तर पर है। एक ईद, एक बकरीद, एक क़ुरान से बना यह धर्म पूरी तरह एकांगी है।

यही दोनों समुदायों के दलितों के बीच का बड़ा अंतर भी है। धार्मिक रूप से एकांगी सिद्धांतों के बीच भी मुसलमानों के सामाजिक स्तर पर भेद-भाव है, लेकिन दूसरी तरफ़ हिन्दू दलितों पर थोपी गयी धार्मिक मान्यतायें नहीं हैं। लेकिन धार्मिक विविधता के बीच उनके साथ भेदभाव है। यही कारण है कि यहां धार्मिक आधार पर उबाल नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भेदभाव से पैदा हुआ उबाल है, जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से धर्म की भी भूमिका ज़रूर है।

लेकिन यह धर्म किसी शास्त्र के मुताबिक़ चलने वाला नहीं है, मुसलमानों की तरह किसी ग्रंथ विशेष से निर्देशित भी नहीं है। यहां धर्म बहुस्तरीय है और यही कारण है कि धर्म इस अर्थ में दलितों के लिए शोषण का सीधा-सीधा उपकरण नहीं है और इस्लाम की तरह एक नीति का पालन करने का यहां किसी तरह का दावा भी है। इस तरह के दावों के बीच भी इस्लाम के सामाजिक जीवन में गहरा भेदभाव है।

मायावती, रामविलास पासवान या रामनाथ अठावले जैसे नेतृत्व अगर ऐसा सोचते हैं कि दलितों का यह उभार उनकी राजनीतिक हैसियत को आसमान पर पहुंचा देगी, तो यह एक बड़ा भ्रम होगा। ठीक भोला पासवान और कर्पूरी ठाकुर की तरह पिछड़ों के मनोवैज्ञानिक तौर पर मज़बूती देने वाली भूमिका ये नेतृत्व निभा चुके हैं। दलित राजनीति अब इन प्रतीकों से आगे बढ़ने की मांग करने लगी है।

अतिपिछड़ों और दलितों को अब उस राजनीतिक विशेषाधिकार और आरक्षण के ख़िलाफ़ एक मज़बूत मोर्चे और मज़बूत नेतृत्व की दरकार है, जिसके शीर्ष पर पिछड़ों की मलाईदार परत यानी नवसवर्ण आसन जमाये बैठा है और उस सामाजिक विशेषाधिकार के ख़िलाफ़ भी एक नेतृत्व पाने की छटपटाहट है, जिसके शीर्ष पर सवर्ण और अब बहुत हद तक पिछड़ों ने अपनी जकड़ बना ली है।

अगर अतिपिछड़ों या दलितों के लिए शीघ्र ही स्वेच्छा से कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी गयी, तो आने वाले दिनों में अतिपिछड़ों और दलितों की तरफ़ से सवर्णों और पिछड़ों के ख़िलाफ़ और भी आंदोलनों के बवंडर झेलने के लिए तैयार रहना पड़ेगा, तब तक, जब तक कि उन्हें समान हैसियत नहीं मिल जाती। आरक्षण पर अब अतिपिछड़ों और दलितों की दावेदारी तर्कसंगत दिखती है और समय रहते जो भी इस तर्कसंगत दावेदारी को हल कर सकेगा, फिलहाल राजनीति का ऊंट उसी की करवट बैठेगा, मगर दीर्घकालिक राजनीति का यह केवल एक रणनीतिक हिस्सा भर होगा।

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 


 










Leave your comment